
Katni Women Organic Farming: महिलाएं अगर ठान लें तो सबकुछ कर सकती हैं, जी हां कुछ ऐसी ही कहानी है मध्यप्रदेश के कटनी जिले के बंडा गांव की रहने वाली तीन महिलाओं की। इन तीन महिलाओं ने करीब पांच साल पहले खेती को आत्मनिर्भरता का जरिया बनाने का फैसला किया। जैविक खेती का प्रशिक्षण लिया और खेत में उतर गईं। उन्हीं तीन महिलाओं की मेहनत और प्रेरणा से करीब 30 महिलाएं जैविक खेती-उत्पादों से जुड़ चुकी हैं।
मंजूलता हल्दकार, रोशनी हल्दकार, उर्मिला काछी ये उन तीन महिलाओं के नाम हैं जिन्होंने कृषि विभाग की योजना के तहत प्रशिक्षण लेकर परिवार के सदस्यों के साथ खेतों में प्रयोग शुरू किए। शुरुआत सब्जी की खेती से हुई। धीरे-धीरे जैविक तरीके अपनाए, फिर इसका असर खेत की पैदावार से लेकर परिवार की आमदनी तक दिखा। पहले साल में दो बार सब्जियों की फसल ली जाती थी। जैविक खेती अपनाने के बाद अब तीन बार फसल लेने का प्रयास है। महिलाएं जैविक खाद, जैविक कीटनाशक और केंचुआ खाद खुद तैयार करती हैं। यह उत्पाद दूसरे किसानों को भी बेचती हैं। यानी जैविक उत्पाद आय का भी जरिया बन गया है।
इन महिलाओं की कहानी की खास बात यह है कि उन्होंने प्रशिक्षण लेकर प्रमाण-पत्र ही हासिल नहीं किया, बल्कि सीखी हुई तकनीक को खेत में उतारा। खेत में प्रयोग किए। परिणाम देखे और फिर गांव की दूसरी महिलाओं के साथ अनुभव साझा किए। इससे गांव में जैविक खेती को लेकर भरोसा बढ़ा। अब महिलाएं खाद और जैविक कीटनाशक तैयार करने के तरीके सीख रही हैं। रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करने की कोशिश के साथ ही जैविक उत्पाद तैयार करने का काम भी बढ़ रहा है।
जैविक खेती के क्षेत्र में बेहतर काम करने के लिए मंजूलता हल्दकार, रोशनी हल्दकार और उर्मिला काछी को जिला स्तर के अलावा जबलपुर, भोपाल और रीवा में भी सम्मान और सराहना मिल चुकी है। पुरस्कारों से ज्यादा अहम यह है कि उनके साथ गांव की दूसरी महिलाएं भी खेत में उतर आई हैं। तीन महिलाओं की शुरुआत अब सामूहिक प्रयास का रूप ले चुकी है। उन्होंने दूसरे परिवारों की महिलाओं को जैविक खेती के तरीके समझाए, खेतों से जोड़न को प्रोत्साहित किया। 30 में से सात महिलाएं खेती के क्षेत्र में बेहतर काम कर रही हैं, जबकि करीब 20 महिलाओं ने जैविक खाद तैयार करने का काम भी शुरू किया है।