कोलकाता. सरस्वती पूजा के नजदीक आते ही ऐतिहासिक शिल्प केंद्र कुम्हारटोली में विद्या की देवी मां सरस्वती की प्रतिमाओं को मूर्त रूप देने का कार्य चरम पर है। यहां इस बार एक नया बदलाव यह भी देखा जा रहा है कि युवा कलाकार, जो आर्ट कॉलेज से पढ़कर आए हैं, वे भी पारंपरिक मूर्तिकारों के […]
कोलकाता. सरस्वती पूजा के नजदीक आते ही ऐतिहासिक शिल्प केंद्र कुम्हारटोली में विद्या की देवी मां सरस्वती की प्रतिमाओं को मूर्त रूप देने का कार्य चरम पर है। यहां इस बार एक नया बदलाव यह भी देखा जा रहा है कि युवा कलाकार, जो आर्ट कॉलेज से पढ़कर आए हैं, वे भी पारंपरिक मूर्तिकारों के साथ मिलकर नए प्रयोग कर रहे हैं।
'थीम' और 'पारंपरिक' कला का संगम
मूर्तिकार नीलांजन पाल के मुताबिक लोग पुराने पारंपरिक और सादे सफेद रंग की 'डाकेर साज' वाली मूर्तियों को पसंद कर रहे हैं। इस वजह से इस साल 'एकचाला' (पारंपरिक ढांचा) शैली की मूर्तियों की मांग में 20% की बढ़ोतरी देखी गई है। कुछ कलाकार पर्यावरण के प्रति जागरूकता दिखाते हुए पूरी तरह से 'इको-फ्रेंडली' (प्राकृतिक रंगों और मिट्टी) का उपयोग कर रहे हैं।
450 कार्यशालाओं में तकरीबन 25,000 सरस्वती मूर्तियां तैयार
स्थानीय शिल्पकारों के प्रारंभिक अनुमानों के अनुसार, इस वर्ष कुम्हारटोली की लगभग 450 कार्यशालाओं में तकरीबन 25,000 सरस्वती मूर्तियां तैयार की जा रही हैं। छोटी मूर्तियों की शुरुआत 800 से 1,500 के बीच है, जबकि शिक्षण संस्थानों और क्लबों के लिए बनने वाली मूर्तियों की कीमत 15,000 से शुरु हो रही है। विक्रेताओं के मुताबिक इस वर्ष कोलकाता से लगभग 100 से अधिक मूर्तियां अमरीका, यूके और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भेजी गई हैं, जिनमें फाइबर ग्लास की मूर्तियों की मांग सबसे अधिक रही। एक अनुमान के मुताबिक, इस सीजन में करीब 1,000 टन गंगा की मिट्टी और 5,000 से अधिक पुआल के बंडल का उपयोग किया गया है।
लघु आयोजकों की पहली पसंद स्वनिर्मित पंडाल
एक तरफ जहां हाईटेक सजावट की प्रतिस्पर्धा के बीच पूजा पंडाल निर्माण में नई अवधारणा को प्राथमिकता दी जा रही है। वहीं दूसरी तरफ आज भी माध्यम और छोटे आयोजक की पहली पसंद स्वनिर्मित पंडाल है जिसे वे सामान्य तौर पर परंपरागत शैली में बनाते हैं। पंडाल निर्माता केतन दास ने बताया कि सरस्वती पूजा के लिए पंडाल निर्माण का ऑर्डर बुक करने वालों में ज्यादातर क्लब अथवा कॉम्प्लेक्स के आयोजक होते हैं। उनका आयोजन बड़े स्तर पर होता है इसलिए वे पंडाल का खर्च वहन करने में सक्षम होते हैं। केतन ने कहा इसका दूसरा कारण है उनकी व्यस्तता, क्योंकि हर आयोजक सदस्य कहीं न कहीं कार्यरत है इस वजह से वे पंडाल निर्माण में समय नहीं दे सकते। जबकि मकानों में होने वाली पूजा के आयोजकों में ज्यादातर विद्यार्थी होते हैं। हालांकि उनके पास ज्यादा बजट नहीं होता लेकिन वे समय पूरा देते है। इसलिए स्वनिर्मित पूजा पंडाल उनकी पहली पसंद रहते हैं।