
कोटा। राजस्थान की बेटी अरुंधति चौधरी ने स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित 2026 कॉमनवेल्थ खेलों की महिला 70 किलोग्राम बॉक्सिंग स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। फाइनल में उन्होंने इंग्लैंड की चैंटेल रीड को एकतरफा अंदाज में हराकर गोल्ड अपने नाम किया। कोटा की इस मुक्केबाज की सफलता केवल रिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे वर्षों की कड़ी मेहनत, संघर्ष और बचपन में देखा गया बड़ा सपना भी है।
करीब दस साल पहले एक पिता अपनी बेटी के भविष्य को लेकर चिंतित थे। उन्होंने प्यार से कहा, ‘बेटा, तू पढ़ाई में इतनी अच्छी है, आइआइटी की तैयारी कर ले।’ बेटी ने मुस्कुराते हुए दो सवाल पूछे ‘हर साल कितने आइआइटीयन बनते हैं?’ पिता ने जवाब दिया, हजारों। फिर बेटी ने पूछा ‘भारत के पास व्यक्तिगत ओलंपिक गोल्ड कितने हैं?’ जवाब मिला एक। तभी 15 साल की उस बच्ची ने पिता की आंखों में आंखें डालकर कहा, ‘आपकी बेटी भारत के लिए ओलंपिक में गोल्ड जीतने वाली पहली लड़की बनेगी।’
आज वही बेटी अरुंधति चौधरी कॉमनवेल्थ गेम्स-2026 के बॉक्सिंग इंग्लैंड को मात देकर गोल्ड भारत के नाम किया। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में खेले गए महिला 70 किलोग्राम वर्ग के सेमीफाइनल में अरुंधति ने 2022 की कॉमनवेल्थ चैंपियन वेल्स की रोसी एकेल्स को 4-0 से हराकर रजत पदक पक्का कर लिया था।
अरुंधति के कोच अशोक गौतम बताते हैं कि अरुंधति बचपन से पढ़ाई और खेल दोनों में अव्वल थी। एक निजी स्कूल में वह बास्केटबॉल टीम की कप्तान थी। जिला और राज्य स्तर तक खेल चुकी अरुंधति ने एक दिन कहा कि उसे कोई व्यक्तिगत खेल खेलना है। पिता ने उसे कुश्ती, वेटलिफ्टिंग और बॉक्सिंग जैसे खेलों के बारे में बताया। ‘बॉक्सिंग’ शब्द सुनते ही अरुंधति की आंखों में चमक आ गई। उसी दिन उसने तय कर लिया कि अब वह बॉक्सर बनेगी।
सपना तो था, लेकिन रास्ता आसान नहीं था। उस समय कोटा में बॉक्सिंग का माहौल नहीं था। पिता सुरेश चौधरी कोटा, जयपुर और भोपाल तक कोच तलाशते रहे, लेकिन सफलता नहीं मिली। आखिरकार उन्होंने ताइक्वांडो कोच अशोक गौतम से संपर्क किया। गौतम ने भी हार नहीं मानी। उन्होंने यू-ट्यूब पर बॉक्सिंग की तकनीकें देखीं और उसी आधार पर अरुंधति को ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया। कोच गौतम बताते हैं कि 2016 में अरुंधति ने उनके साथ अभ्यास शुरू किया। सुबह 4.30 बजे मैदान पहुंचना, तीन घंटे अभ्यास करना और शाम को फिर तीन घंटे रिंग में पसीना बहाना उसकी दिनचर्या बन गई।
कड़ी मेहनत का नतीजा जल्द ही सामने आया। वर्ष 2017 में रोहतक में खेले गए अपने पहले राष्ट्रीय टूर्नामेंट में अरुंधति ने हरियाणा की मजबूत बॉक्सर को पहले ही राउंड में नॉकआउट कर सबको चौंका दिया। इसके बाद भारतीय खेल प्राधिकरण ने उसे यूक्रेन में प्रशिक्षण के लिए चुना।
अरुंधति की कहानी केवल जीत की नहीं, संघर्ष की भी है। बॉक्सिंग के दौरान दोनों कलाइयों में गंभीर चोट लगी। ऑपरेशन कर दोनों हाथों में प्लेट डालनी पड़ी। एड़ी में फ्रैक्चर हुआ। कई बार लगा कि कॅरियर रुक जाएगा, लेकिन उसने हार नहीं मानी। सबसे कठिन दौर तब आया जब पेरिस ओलंपिक क्वालीफाई के दौरान उसकी मां सुनीता चौधरी आइसीयू में भर्ती थीं। एक तरफ मां की जिंदगी की चिंता, दूसरी ओर देश के लिए मुकाबला। मानसिक तनाव के बावजूद अरुंधति रिंग में उतरी और पूरी ताकत से लड़कर जीती।
अरुंधति केवल खेल में ही नहीं, पढ़ाई में भी हमेशा अव्वल रही। स्कूली शिक्षा के समय भी वह जम्प गेम, कॉपी बैलेंस प्रतियोगिता में अव्वल रही। फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में भी वह हिस्सा लेती थी। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उसने चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी से स्नातक किया। दो वर्ष पहले वह भारतीय सेना में हवलदार बनी और अब सेना की जिम्मेदारियों के साथ देश के लिए पदक जीत रही हैं।
पिछले दस महीनों में अरुंधति ने लगातार शानदार प्रदर्शन किया। फेडरेशन कप, यूथ वर्ल्ड कप, राष्ट्रीय चैंपियनशिप, बॉक्सो कप इंटरनेशनल और एशियन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने के बाद अब कॉमनवेल्थ गेम्स में भी गोल्ड से केवल एक जीत दूर हैं।
अरुंधति ने देश के युवाओं के लिए भावुक संदेश दिया। उन्होंने कहा ‘जैसे मैंने अपने सपने को नहीं मारा, आप भी मत मारो। परिवार को मनाना थोड़ा मुश्किल होगा, लेकिन जिंदगी आपकी है। अगर सपना बड़ा है तो उसके लिए पूरी ताकत से मेहनत करो।" उन्होंने कहा कि उनके पास देश को गौरवान्वित करने के दो कारण हैं, एक भारतीय सेना की वर्दी पहनकर सेवा करना और दूसरा बॉक्सिंग रिंग में तिरंगा लहराना।
पिता सुरेश चौधरी ने भी हर मैच में पदक जीतने का संकल्प ले रखा है। अरुंधति की बहन डॉ. चारुलता चौधरी ने बताया कि पिता ने अरुंधति के हर मैच में पदक जीतने का संकल्प ले रखा है। वह मैच के बाद ही अपना व्रत खोलते हैं। अभी बेटी के स्वर्ण पदक जीतने की कामना को लेकर वह जहाजपुर के पास कुराडि़या गांव में कुलदेवता की पूजा अर्चना व नाथद्वारा दर्शन के लिए गए हैं।
अरुंधति के कोच बताते हैं कि अरुंधति की डाइट बेहद हैवी थी। वह रोजाना करीब चार लीटर भैंस का दूध, 150 ग्राम मामरा बादाम और आधा किलो पनीर लेती थी, ताकि शरीर को पर्याप्त ऊर्जा और प्रोटीन मिल सके। हालांकि, बाद में फैटी लीवर की समस्या सामने आने पर डाइट पूरी तरह बदल दी गई। अब भारतीय डाइटिशियन की सलाह पर वह एक गिलास गाय का दूध, 10 से 15 बादाम और संतुलित पौष्टिक आहार लेती हैं। वजन को नियंत्रित रखने के लिए उनकी डाइट पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से तय की जाती है। खाने में अरुंधति को दाल-बाटी-चूरमा बेहद पसंद है।