Business In Agriculture: 43 साल तक प्रशासनिक सेवा में रहकर रिटायर्ड हुए एक वरिष्ठ RAS अधिकारी ने यह साबित कर दिया कि नवाचार और मेहनत से खेती भी बड़ा मुनाफा दे सकती है।
Inspiring Story Of Retired RAS Officer Inder Singh: रावतभाटा उपखण्ड के जावदा में खेती में नवाचार से उत्पादित केलों की जयपुर के बाजार में खूब मांग है। जल्द ही यह केले कृषक उत्पादक संघ के जरिए विदेश भी बिकने जाएंगे। फिलहाल 30 हेक्टेयर में लगाए गए केले की हर दिन दो गाड़ी जयपुर जा रही है।
रावतभाटा तहसील के जावदा गांव के इंद्र सिंह सोलंकी 43 वर्ष की सरकारी नौकरी कर अलवर UIT से सेवानिवृत्त होने के बाद गांव लौट आए। सीनियर आरएएस रह चुके इंद्र सिंह 2014 में सेवानिवृत्त हो गए। बाद में उन्होंने खेती की ओर ध्यान देना शुरू कर लिया।
अब इन्होंने केले के 85 हजार पौधे खरीदे। नवाचार के जरिए 30 हेक्टेयर खेत में ये पौधे लगाकर एक साल तक देखरेख की। वर्तमान में गेहूं, बाजरा, सरसों की परंपरागत खेती के साथ ही टिश्यू कल्चर केले की खेती भी कर रहे हैं, जिससे वे सालाना अच्छी कमाई कर रहे हैं।
इंद्र सिंह का मानना है कि अगली पीढ़ी को महत्ता बताने के लिए ही इन्होंने खेती-बाड़ी में हाथ आजमाना शुरू किया। हालांकि, पहले तो इन्हें दिक्कत आई, लेकिन इनके हौसलों के आगे मुश्किलें टिक नहीं पाई। पहले इन्होंने खेत की मिट्टी की टेस्टिंग करवाई।
पीएच लेवल सही करवाने पर फोकस किया, फिर उसके अनुरूप फसलों को चुना। इतना ही नहीं, माइक्रो फार्मिंग पर फोकस कर रहे सोलंकी रोबोटिक खेती की प्लानिंग के साथ ही बैलून बेस्ड ड्रिप सिस्टम की कवायद में भी जुटे हैं, जिससे आधुनिक पीढ़ी भी कुछ सीख ले सके।
जो सुकून गांव की मिट्टी में मिलता है, वह शायद ही कहीं और मिले। यही सोच सेवानिवृत्त हो चुके उच्च अधिकारियों को फिर से अपने गांवों की ओर खींच रही है। इतना ही नहीं यह पीढ़ी फिर से खेत-खलिहानों में जुट गई है। यहां कई ऐसे अधिकारी है जो खेतों में नवाचारों के जरिए नई फसलों को उगा रहे हैं।
सहायक कृषि अधिकारी पवन शर्मा ने बताया कि टिश्यू कल्चर एक अत्याधुनिक और तेज विकास प्रक्रिया है। इसके माध्यम से पौधे के ऊतकों के छोटे हिस्से को लेकर कुछ ही हफ्तों में हजारों नए पौधे तैयार किए जा सकते हैं।
इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे उत्पन्न होने वाले पौधे रोगमुक्त होते हैं और अधिक मजबूत होते हैं। इस तकनीक से पौधों को पूरे साल किसी भी मौसम पर निर्भर हुए बिना विकसित किया जा सकता है। इससे नई किस्मों के उत्पादन को बढ़ावा मिलता है।