Gen Z: जेनरेशन जेड को ‘जेन जी’ भी कहते हैं। ये ऐसे बच्चे हैं जो 1998 से 2012 तक पैदा हुए हैं। इनका जीवन जीने का तरीका इनके पहले के जेनरेशन से बिल्कुल अलग है। डिजिटल युग में पैदा हुई और पूरी तरह टैक्नो फ्रेंडली है
आशीष जोशी
Student News: कोचिंग सिटी कोटा जेनरेशन जेड सिटी बन रही है। यहां देशभर के ‘जेन जी’ मेडिकल-इंजीनियरिंग में दाखिले की कोचिंग ले रहे हैं। ज्यादातर अकेले रहते हैं। दोस्त बनाने की बजाय सोशल मीडिया से दोस्ती में ज्यादा यकीन रखते हैं। पढ़ाई के बाद मोबाइल पर घंटों सोशल मीडिया पर बिताते हैं। इस कारण वे एंग्जाइटी और बिहेवियर डिस्आर्डर तक के शिकार हो रहे हैं। इतना ही नहीं, सोशल मीडिया से बेइंतहा दोस्ती की वजह से कई स्टूडेंट्स लोनलीनेस और डिप्रेशन के बाद सुसाइड थॉट तक के खतरनाक मोड़ पर पहुंच रहे हैं। कोटा ही नहीं, प्रदेश भर के साइकोलॉजिस्ट ‘जेन जी’ के डिप्रेशन लेवल को लेकर आश्चर्यचकित हैं। पेरेंट्स 8-10 वर्ष के बच्चे से लेकर 20-22 की आयु वाले युवाओं को लेकर मनोचिकित्सकों के पास पहुंच रहे हैं।
जेनरेशन जेड को ‘जेन जी’ भी कहते हैं। ये ऐसे बच्चे हैं जो 1998 से 2012 तक पैदा हुए हैं। इनका जीवन जीने का तरीका इनके पहले के जेनरेशन से बिल्कुल अलग है। डिजिटल युग में पैदा हुई और पूरी तरह टैक्नो फ्रेंडली है। खुद में खोई रहती है। मोबाइल से बाहर की दुनिया से इन्हें कुछ खास मतलब नहीं होता। वर्चुअल वर्ल्ड में दोस्त और भरोसा तलाशते हैं। सबसे ज्यादा इमेज कॉन्शस हैं। सोशल इमेज बहुत मायने रखती है। इमेज बिल्डिंग के चक्कर में सबसे ज्यादा मानसिक दबाव खुद पर बनाया हुआ है।
मनोचिकित्सकों का कहना है कि कोरोनाकाल के बाद सोशल मीडिया से दोस्ती तेजी से बढ़ी है। पीयू रिसर्च सेंटर के सर्वे के मुताबिक, 35 फीसदी टीन एजर्स सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा समय बिता रहे हैं। यह उनकी मेंटल हेल्थ पर असर डाल रहा है। कई स्टूडेंट्स सिवियर साइकोलॉजिकल डिस्ऑर्डर की चपेट में आ रहे हैं।