
कोटा . मां का प्यार निस्वार्थ और अमूल्य है, इनसे मिलने वाली खुशियों कहीं से नहीं खरीदा जा सकता है। मदर्स डे , मां को समर्पित इस दिन पर पास, दूर या बहुत दूर चली जाने वाली मां की किसी ने किसी रूप में याद आ ही जाती है। मां की वात्सल्य भरी छवि सामने याद आते ही बचपन की यादें, मां के हाथों सिकी करारी रोटी और इस पर उढ़ेला मां का प्यार, डाट डपट सब कुछ याद आज ही जाता है, लेकिन शहर में इसके ठीक कुछ मांए भी हैं, जिन्हें याद करने वाला कोई नहीं है और हैं, तो भी न जाने कौनसी मजबूरी में बंधकर मां को अपने हाल पर आश्रम की दहलीज पर छोडे गए।
इनमें से कुछ महिलाएं तो अपने आंखों के तारों का इंतजार करते करते दुनिया से ही रुखसत हो गई, कुछ को आज भी उम्मीद है कि इक दिन वह जरूर आएगा...। कहानियां हैं झालावाड़ रोड स्थित आश्रय भवन में रहने वाली महिलाओं की। यहां अपनो से ठुकराई 19 महिलाएं रह रही है।
नहीं पता था यह दिन देखना पड़ेगा
अपने जीवन के दसवे दशक में चल रही ईजे जैकब की दस्तां भी कुछ ऐसी ही है। जैकब बताती हैं कि वे सिविल लाइन्स स्थित पुश्तैनी मकान में रहते थे। छोटी उम्र में ही सिर से माता-पिता का साया उठ गया। 10वीं पास की और शिक्षक बन गई। भाई-बहनों को पढ़ाया और अपने पैरों पर खड़ा किया।
एक बहन बन गई और भाई शिक्षक बन गया। एक दिन भाई भी दुनिया छोड़ गया तो भतीजे को संभाला और विवाह कराया। उसे मकान खरीदने के लिए 4 लाख रुपए दिए, लेकिन इसका कोई हिसाब नहीं कि कहां है। इसके बाद उसके तेवर भी बदल गए। स्थिति यहां तक हो गई कि उसने रोटी देना भी बंद कर दिया। हालात ये हो गए कि पड़ौसियों को दया आई तो वे मुझे आश्रम में छोड़ गए।अब होली दीवाली, क्रिसमस ईद सभी यहीं मनती है।
बेटे के इंतजार में टूट गई सांस
यह ईजे जैकब नहीं। कहानी कैसर बाई की है। कैसर का जीवन कभी केसर की तरह ही महकता था,लेकिन हालात कुछ ऐसे बदले की अपनों की आस में जीवन की सांसे ही टूट गई। आश्रम के ही सदस्यों ने कैसर के बारे में बताया। कैसर के पति ने साथ छोड़ा तो जैसे खुशियों ने भी दामन छोड़ दिया। वह अपने पिता के पास रहने लगी, एक दिन पिता भी दुनिया छोड़ गए तो सारी जिम्मेदारी कैसर ने संभाली, बीड़ी बांधकर एक-एक पाई जोड़ी। खुद भूखी, प्यासी रही और अपनी खुशियां बच्चों पर न्यौछावर की। बेटे की शादी की, मकान दिलवाया, लेकिन आखिर में बेटे ने ऐसा सिला दिया कि कैसर की तबीयत खराब होने लगी तो दूरियां बनाना शुरू कर दिया। तकदीर से हारी कैसर को पड़ौसी आश्रम छोड़ गए, कुछ साल यहां रही, लेकिन अपनों के दिए दर्द को संजोए दुनिया छोड़ चली गई, इसके बाद भी कोई अपनी मां का हाल पूछने तक नहीं आया।
जाओ ..अभी यहां आने का समय नहीं हुआ
पाटनपोल निवासी धूड़ाराम (परिवर्तित नाम) का दो समृद्ध बेटों में बंटवारा हो गया था। कुछ दिन छोटे लाल के यहां रहकर जीवन गुजारते, कुछ दिन बड़े लाल के घर। बड़े बेटे के घर रहने का समय पूरा हुआ तो वह छोटे बेटे के घर छोड़ आया। वहां पिता के घर आने पर सत्कार तो दूर बहू ने कहा, जरा घड़ी देख लीजिए, अभी एक माह पूरा होने में आधा घंटा शेष है। बड़ा बेटा उल्टे पैर पिता को घर ले गया। बूढ़े पिता के दिल पर बहू के शब्दों की ऐसी चोट लगी कि कि ऑटो से उतरते गिर पड़े और दुनिया से चल बसे।
बेटों ने बैठा दिया कोटा की बस में...
कोलकाता की 72 वर्षीय रुकमणी चार बेटे होने के बावजूद आश्रम में रही। कभी छोटे बेटे ने अपमान किया तो कभी बड़े बेटे के घर अपमान के घूंट पीए।। बेटों ने मां के रुपयों को भी अपने खाते में जमा करा लिए। एक बहू ने उनके गहने उतरवा लिए। दो अन्य बेटों ने अपने पास रखने से मना कर दिया और कोटा आने वाली बस में बैठा दिया। यहां किसी ने आश्रम पहुंचाया। रुकमणी करीब 7-8 माह आश्रम में रही। शायद अहमदाबाद वाले बेटे का मन पसीजा और अपने साथ मां को गत दिनों जयपुर ले गए।
कानून है इनके साथ
एडवोकेट विवेक नन्दवाना के अनुसार न्यायालय में इस तरह के मामले कम ही आते हैं। माता-पिता परिवार की बदनामी समेत कई कारणों से न्यायालय की शरण नहीं लेते। पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007 के तहत ऐसे वरिष्ठ व्यक्ति जो अपने भरण-पोषण में असमर्थ हैं, अपनी व्यस्क संतान के एवं जिनके संतान नहीं है, वह अपने ऐसे नातेदार के जो उत्तराधिकार प्राप्त करेगा के विरुद्ध सक्षम न्यायालय में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करके भरण-पोषण एवं अन्य भत्ते प्राप्त कर सकता है।
तीन साल तक काल कोटरी में बंद रखा मां को
कनवास निवासी पानाबाई के साथ उसके तीन बेटों ने ऐसा सलूक किया कि दुश्मन भी किसी की मां के साथ न करे। पाना के घर घर में सुख समृद्धि थी। नौकर चाकर हुआ करते थे। लेकिन संपत्ति के लालच में बेटों ने मां-बाप की बेकद्री की। पाना ही नहीं, उनके पति को भी दूसरे बेटे ने बाथरूम में बंद करके रखा था। कई दिनों तक पाना बाई कोटरी में बंद होकर सब कुछ सहती रही। फिर एक दिन पड़ौसियों से अभागी मां का दर्द सहा नहीं गया तो उन्होंने एक सामाजिक संस्था को इसकी शिकायत की। आखिर मां को इस संस्था ने बेटों की काल कोटरी से आजाद किया और अपना घर में रखवाया। मामला पत्रिका में उजाकर हुआ तो बेंटों की नींद उड़ी। आखिर वे अपनी मां को अपने साथ ले गए।