दिगम्बर जैन समाज के पर्युषण पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी से चर्तुदशी तक दस दिनों तक चलते हैं।
तीसरा दिन
दिगम्बर जैन आचार्य कुन्दकुन्द ने 'शील पाहुड़' में कहा है कि 'सीलं मोक्खस्स सोवाणं' अर्थात शील ही मोक्ष की सीढ़ी है। शील-परिवार यानी शील के तत्वों की व्याख्या करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द ने 'शील पाहुड़' (19) में कहा है : 'जीवों पर दया करना/ इंद्रियों को वश में करना/ सत्य बोलना/ चोरी न करना/ ब्रह्मचर्य का पालन करना/ संतोष धारण करना/ सम्यक् दर्शन/ सम्यक् ज्ञान/ तप, ये सब शील के परिवार हैं।' उल्लेखनीय है कि शील के उक्त तत्वों का पालन वैसे तो जैन मतावलंबियों में दैनंदिन जीवन की सामान्य प्रक्रिया है किंतु दशलक्षण धर्म अर्थात दिगम्बर जैन के पर्युषण पर्व के दौरान विशेष रूप में किया जाता है।
पर्युषण दरअसल शील की 'आब्जर्वेटरी' भी है और 'लेबोरेटरी' भी। सत्संग-सदाचार अर्थात साधु-मुनियों-आचार्यों के प्रवचन सुनना, संग या सम्पर्क में रहना, उन्हें प्रणाम (नमन) करना और उनकी सीख को ध्यान में रखकर आचरण करना अर्थात सदाचार करना और शील के व्यवहार तथा सत्संग-सदाचार का कभी भी अपने मन में अहंकार नहीं आने देना मोक्ष की मंजिल की ओर बढऩा ही तो है।
तात्पर्य यह है कि शील और सत्संग-सदाचार पर्युषण के अविभाज्य घटक हैं। शील से कुशीलरूपी विघ्न दूर हो जाता है तथा सत्संग-सदाचार से कुसंग-कदाचार का कटघरा टूटता है। पर्युषण इस प्रकार विघ्नहर्ता ही तो हुआ। सनातन हिन्दू धर्म में प्रथम पूज्य देवता श्रीगणेश को अभाव/ अकाल/ अज्ञान/ अविद्या/ अनुद्धि/ अन्याय/ असुरक्षा/ असंतति/ अधर्म रूपी विघ्नों का हर्ता 'अनंत महिमा' के अंतर्गत कहा गया है। सिद्ध हुआ कि श्री गणेश और पर्युषण दोनों ही विघ्न हर्ता है।
चौथा दिन- मुक्त आत्मा बनने की युक्ति सत्य-अहिंसा की शक्ति
'नियमसार' (43) में आचार्य कुन्दकुन्द ने मुक्त आत्मा की विशेषताएं बतलाते हुए कहा है, 'जो मन, वचन, काया के दण्डों से रहित है, हर तरह के द्वन्द्व से, संघर्ष से जो किसी के सहारे नहीं रहता है, जिसमें किसी के प्रति राग नहीं है, द्वेष नहीं है, जिसमें मूढ़ता नहीं है, भय नहीं है, वही है -मुक्त आत्मा।' दिगम्बर जैन आचार्य कुन्दकुन्द ने मुक्त आत्मा की विशेषताओं के वर्णन में यह संकेत भी दे दिया है कि ऐसा बनने की युक्ति क्या हो!
दशलक्षण धर्म यानी पर्युषण पर्व मुक्त आत्मा बनने की युक्ति का पथ प्रशस्त करता है। दरअसल सत्य-अहिंसा की शक्ति, मुक्त आत्मा बनने की युक्ति है। सत्य का निवास जहां होता है स्वत: ही असत्य रूपी विघ्न वहां से दूर हो जाता है। अचौर्य और अपरिग्रह दरअसल अहिंसा के सहचर हैं। इसलिए अहिंसा के साथ अपने आप कदमताल करते हैं।
अहिंसा के आचार के साथ अनेकांतवाद का विचार यानी स्यादवाद भी फलीभूत होता। अहिंसा में ब्रह्मचर्य निहित ही होता है। तात्पर्य यह कि मुक्त आत्मा बनने की युक्ति की यूनिवर्सिटी है दशलक्षण धर्म यानी पर्युषण पर्व। एक वाक्य में यह कि पर्युषण उन विघ्नों जैसे असत्य, हिंसा, चोरी, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ का हरण करता है इसलिए मुक्ति के मार्ग का विघ्नहर्ता हुआ। सनातन हिन्दू धर्म में प्रथम पूज्य देवता गणेश जी को 'ऋग्वेद' के दूसरे मंडल के 23वें सूक्त के पहले मंत्र में आध्यात्मिक ज्ञान का अधिपति निरूपति करके ब्रह्म प्राप्ति के मार्ग में आने वाले विघ्नों का हर्ता कहा गया। प्रमाणित हुआ कि श्रीगणेश और पर्युषण विघ्नहर्ता है।