ललितपुर

ललितपुर के गांव का लड़का आज चीन में है योग गुरू, रह चुके हैं आईटी कंपनी के मालिक

एक वक्त दो जून की रोटी के लिए तरसने वाला यह लड़का अब चीन मे योग गुरू कहलाता है
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ललितपुर के गांव का लड़का आज चीन में है योग गुरू, रह चुके हैं आईटी कंपनी के मालिक

ललितपुर. मन में कुछ करने की चाहत हो तो कुछ भी असंभव नहीं क्योंकि किसी ने सच ही कहा है कि "जहां चाह वहां राह"। मतलब साफ है कि अगर मन में कुछ करने की चाहत हो जज्बा हो, तो राह अपने आप खुल जाती है या फिर दूसरे शब्दों में हम यह कहें कि "करत करत अभ्यास के जड़ मति होत सुजान, रसिरि आवत जात है, सिल पर होत निशान" रहीम ने भले ही यह दोहा दशकों पहले लिखा हो, मगर बुंदेलखंड के 'मौड़ा' (लड़का या छोरा) सोहन सिंह पर एकदम सटीक बैठता है। एक वक्त दो जून की रोटी के लिए तरसने वाला यह लड़का अब चीन मे योग गुरू कहलाता है।

इंदौर और थाईलैंड में की नौकरी

सोहन सिंह मूलरूप से बुंदेलखंड के ललितपुर जिले के थाना जाखलौन के ग्राम बरखेड़ा के रहने वाले है। किसी दौर में उनके लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम आसान नहीं था। उनके घर में उनका मूल व्यवसाय कृषि था जिससे केवल घर की गुजर-बसर चलती थी। बहुत ऊंची और लंबी पढ़ाई के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। पिता नौकरी में जरूर थे मगर वेतन हाथ में आने से पहले व्याज में जमा हो जाती थी। उन्हें पढ़ाई करनी थी इसीलिए उनके पिता ने जैसे तैसे करके उनकी शिक्षा दीक्षा का इंतजाम किया। मगर कुछ करने के जज्बे ने उन्हें बुंदेलखंड के पिछड़े गांव से निकाल कर सीधा चीन पहुंचा दिया। उन्होंने कंप्यूटर की पढ़ाई की और इंदौर फिर थाइलैंड में जाकर नौकरी की।

सोहन सिंह ने बताया कि जब वे सागर के हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे तब एक शिक्षक ने योग को लेकर मार्ग दर्शन किया। तब उन्होंने इस पर ज्यादा ध्यान नही दिया और बाद में यह उनके जीवन का आधार बन गया। उसके बाद उनका योग पर ध्यान गया, पढ़ाई करने के बाद उनके लिए कंप्यूटर की कंपनी में नौकरी करना प्राथमिकता था और योगा दूसरे क्रम पर था। नौकरी से रोटी रोजी का इंतजाम होता था। वे रात में नौकरी करते और दिन में लागों को योग सिखाने का काम करते थे। वक्त गुजरने के साथ वे चीन पहुंच गए, यहां उन्होंने योग को प्राथमिकता बनाया और कंप्यूटर की नौकरी को द्वितीय।

सोहन सिंह का चीन में 'सोहन योगा' के नाम से संस्थान है और उसके विभिन्न स्थानों पर नौ क्लब चलते हैं। अपने जीवन के कठिन दौर को याद करके सोहन सिंह बताते हैं कि पिता रेलवे में नौकरी करते थे, मगर उनका वेतन सूदखोरों के पास चला जाता था।पिता ने परिवार की जरूरतों को पूरा करने जैसे भाई-बहन की शादी के लिए कर्ज लिया था। खेती में कुछ पैदा होता नहीं था, या फिर बहुत कम पैदा होता था यह इलाका सूखाग्रस्त है। मां सभी का पेट भरने के लिए मजदूरी किया करती थी।

आईटी कंपनी के मालिक भी रहे हैं

सिंह कहते हैं कि उनके लिए पहले थाली का पूरा भरना अर्थात सभी के लिए भोजन का इंतजाम करना बड़ी चुनौती थी। यही चुनौती उन्हें इंदौर और फिर थाईलैंड ले गई। इंदौर व थाईलैंड वे कंप्यूटर कंपनी में नौकरी करते मगर योग उनके जीवन का बड़ा हिस्सा रहा। वक्त गुजरने के साथ वे थाईलैंड में एक सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कंपनी के मालिक बन गए, मगर उनके दिल और दिमाग पर तो योग का बसेरा था। थाईलैंड में वे लगभग ढाई साल रहे।

कंप्यूटर में डॉक्टरेट करने के लिए सोहन चीन पहुंचे, जहां उन्होंने नौकरी के साथ योग की कक्षाएं लेना शुरू किया। वे कहते हैं कि योग से इंसान की जिंदगी बदल सकती है, चित्त तो स्थिर होता ही है, व्यक्ति स्वस्थ्य भी रहता है। वे चीन के अलावा भारत में भी आकर लोगों को प्रशिक्षण देते हैं। उनके लिए योग प्राथमिकता है, पैसा कोई मायने नहीं रखता।

Updated on:
26 Oct 2018 12:07 pm
Published on:
26 Oct 2018 12:07 pm