टेक्नोलॉजी

स्मार्टफोन का प्राइवेसी ग्लास कहीं छीन न ले आपकी आंखों का चैन… सिरदर्द और धुंधलेपन की ये है असली वजह

Privacy Tempered Glass Disadvantages: क्या आप भी प्राइवेसी टेम्पर्ड ग्लास का इस्तेमाल करते हैं? यह न केवल आपकी आंखों को नुकसान पहुंचा रहा है बल्कि फोन की बैटरी भी खत्म कर रहा है। जानिए इसके चौंकाने वाले सच।

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Jan 13, 2026
Privacy Tempered Glass Disadvantages (Image: Gemini)

Privacy Tempered Glass Disadvantages: आजकल हम सब अपनी प्राइवेसी को लेकर कुछ ज्यादा ही सजग हो गए हैं। मेट्रो में सफर करना हो या ऑफिस की लिफ्ट में, हमें हमेशा यही डर लगा रहता है कि कहीं बगल वाला हमारे वॉट्सऐप चैट्स या बैंक बैलेंस न झांक ले। इसी डर का फायदा उठाने बाजार में आया प्राइवेसी टेम्पर्ड ग्लास। देखने में ये बड़ा कूल लगता है जैसे ही फोन थोड़ा टेढ़ा हुआ, फोन की स्क्रीन काली पड़ जाती है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि अपनी प्राइवेसी बचाने के चक्कर में आप अपने शरीर के सबसे नाजुक हिस्से, यानी अपनी आंखों के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं?

हकीकत ये है कि ये काला दिखने वाला शीशा आपके फोन के साथ-साथ आपकी सेहत के लिए भी एक धीमा जहर साबित हो रहा है।

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आंखों पर पड़ता है जबरदस्त दबाव

प्राइवेसी ग्लास असल में एक गहरा रंग का फिल्टर होता है। इसे लगाने के बाद आपके फोन की स्क्रीन से निकलने वाली असली रोशनी करीब 30 से 40% तक कम हो जाती है। अब होता ये है कि आप फोन देखने के लिए अपनी आंखों को सिकोड़ते हैं और ज्यादा जोर लगाते हैं। काफी देर तक ऐसी कम रोशनी वाली और डल स्क्रीन को देखने से डिजिटल आई स्ट्रेन की समस्या शुरू हो जाती है। कई लोगों को तो लगातार सिरदर्द और आंखों में भारीपन महसूस होने लगता है, जिसकी असली वजह यही काला ग्लास है।

बैटरी का दुश्मन और डिस्प्ले का कत्ल

लोग 50 हजार या 1 लाख रुपये खर्च करके एक अच्छी डिस्प्ले वाला फोन खरीदते हैं। कंपनी करोड़ों रुपये लगाकर उसके कलर्स और ब्राइटनेस को शानदार बनाती है, लेकिन हम उस पर 200 रुपये का प्राइवेसी ग्लास चढ़ाकर उसकी चमक खत्म कर देते हैं।

चूंकि ग्लास की वजह से स्क्रीन धुंधली और काली दिखती है, इसलिए हम मजबूरी में फोन की ब्राइटनेस हमेशा फुल रखते हैं। अब ये तो सीधी सी बात है कि ब्राइटनेस जितनी ज्यादा होगी, बैटरी उतनी ही तेजी से खत्म होगी। यानी आपका शौक आपके फोन की बैटरी लाइफ को समय से पहले खत्म कर रहा है।

सेंसर भी हो जाते हैं कंफ्यूज

आजकल के स्मार्टफोन्स में सेंसर बहुत एडवांस और बारीक जगहों पर होते हैं। ये प्राइवेसी ग्लास इतने मोटे और गहरे होते हैं कि फोन का लाइट सेंसर सही से अंदाजा ही नहीं लगा पाता कि बाहर रोशनी कितनी है। नतीजा? आपकी ऑटो-ब्राइटनेस पागलों की तरह व्यवहार करने लगती है। सबसे ज्यादा चिढ़ तब मचती है जब आपका इन-डिस्प्ले फिंगरप्रिंट सेंसर काम करना बंद कर देता है और आपको बार-बार पिन डालना पड़ता है।

क्या वाकई प्राइवेसी बचती है?

मजे की बात तो ये है कि जिस काम के लिए आप इसे लगाते हैं, ये वो भी पूरी तरह नहीं कर पाता। ये ग्लास सिर्फ एक खास एंगल (साइड व्यू) से स्क्रीन को काला करता है। अगर कोई आपके ठीक पीछे खड़ा है या थोड़े ऊपर से झांक रहा है, तो उसे सब कुछ साफ-साफ दिखेगा। यानी आप सिर्फ एक भ्रम में जी रहे हैं कि कोई आपका फोन नहीं देख रहा।

काम की बात

अगर आपको वाकई लगता है कि आपके चैट्स बहुत सीक्रेट हैं, तो प्राइवेसी ग्लास की जगह फोन की ब्राइटनेस थोड़ी कम रखें या फिर चैटिंग के वक्त अपनी पोजीशन बदल लें। लेकिन एक सस्ते से काले कांच के टुकड़े के लिए अपने महंगे फोन के फीचर्स और अपनी आंखों की रोशनी को दांव पर लगाना कोई समझदारी नहीं है। अगर आज ही इसे उतार फेंकेंगे, तो शायद आपकी आंखों को ज्यादा सुकून मिलेगा।

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Published on:
13 Jan 2026 04:05 pm
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