Ghaziabad Triple Suicide: आज के दौर में बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन होना आम है, लेकिन परेशानी तब होती है जब वह सिर्फ गेम और वीडियो तक सीमित रह जाता है। ऐसे में पेरेंट्स की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को समझाएं कि स्मार्टफोन सीखने और रचनात्मकता बढ़ाने का भी एक बेहतर जरिया हो सकता है।
Mobile Addiction, Ghaziabad Triple Suicide: यूपी के गाजियाबाद से सामने आई यह घटना हर माता-पिता के लिए गहरी चिंता और चेतावनी लेकर आई है। 12 से 16 साल की उम्र की तीन सगी बहनों द्वारा उठाया गया यह कदम मोबाइल गेम की लत और बच्चों की मानसिक सेहत पर गंभीर सवाल खड़े करता है। बताया जा रहा है कि तीनों बहनें हर समय एक-दूसरे के साथ रहती थीं और मोबाइल गेम में इस कदर डूबी हुई थीं कि उन्होंने स्कूल जाना तक छोड़ दिया था। जब पिता ने उन्हें गेम खेलने से रोका और डांटा, तो मामला बेहद दुखद मोड़ पर पहुंच गया। यह घटना साफ संकेत देती है कि मोबाइल एडिक्शन को हल्के में लेना बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है, और समय रहते पेरेंट्स को सतर्क होने की जरूरत है।
लगातार मोबाइल इस्तेमाल करने से बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ता है। ध्यान भटकता है और सीखने की क्षमता कम होने लगती है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में जलन, मायोपिया, गर्दन दर्द और हाथों में जकड़न जैसी समस्याएं सामने आती हैं।सिर्फ शरीर ही नहीं, मोबाइल की लत बच्चों के मन पर भी असर डालती है। कई बच्चे असल दुनिया से कटने लगते हैं और परिवार या दोस्तों से बात करना कम कर देते हैं, जिससे उनका भावनात्मक विकास प्रभावित होता है।
बच्चे अपने आसपास के माहौल से जल्दी प्रभावित होते हैं। स्कूल या दोस्तों के बीच जब वे सभी को फोन में व्यस्त देखते हैं, तो खुद भी वैसा ही करने लगते हैं। कई बार फोन बच्चों के लिए अकेलेपन से बचने का जरिया बन जाता है, लेकिन यही आदत आगे चलकर चिंता, चिड़चिड़ापन और गुस्से की वजह बन सकती है।
माता-पिता को यह जानना चाहिए कि बच्चा कितना समय और किस तरह की सामग्री देख रहा है।
खाने के समय, पढ़ाई और सोने से पहले फोन न इस्तेमाल करने जैसे नियम बच्चों में अनुशासन लाते हैं।
बच्चों को बताएं कि मोबाइल सिर्फ गेम के लिए नहीं, बल्कि पढ़ाई और क्रिएटिविटी के लिए भी है।
अगर माता-पिता हर समय फोन में रहेंगे, तो बच्चे भी वही करेंगे।
खेल, संगीत, डांस या आर्ट जैसी एक्टिविटीज बच्चों को मोबाइल से दूर रखती हैं।
फोन का सीमित इस्तेमाल परिवार के साथ बिताए समय को बढ़ाता है। बच्चों की आंखें सुरक्षित रहती हैं और वे मानसिक रूप से भी ज्यादा संतुलित रहते हैं। सबसे बड़ी बात, बच्चे असल दुनिया में रिश्तों और खुशियों की अहमियत समझने लगते हैं।