मिथिला नववर्ष जुड़ शीतल: आज के इस लेख में आइए जानते हैं जुड़ शीतल मिथिला नववर्ष से जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में विस्तार से।
Jur Sital क्यों मनाया जाता है: गर्मी की शुरुआत में जब सूरज के तेवर बदलने लगते हैं, तब बिहार के मिथिला रीजन और नेपाल के कुछ हिस्सों में एक त्योहार मनाया जाता है, जिसे जुड़ शीतल कहते हैं और नेपाल की थारू कम्युनिटी में इसे सिरुवा कहते हैं। इसे मैथिली न्यू ईयर के तौर पर देखा जाता है। वैसे तो मैथिली कैलेंडर के अनुसार नववर्ष की शुरुआत 14 अप्रैल से ही हो जाती है, लेकिन साल 2026 में यह त्योहार सतुआनी या सत्तुआन के अगले दिन यानी 15 अप्रैल को मनाया जाएगा। आइए आज के इस लेख में जानते हैं जुड़ शीतल से जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में विस्तार से।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम चैनल @qisse.hazaar पर Anamika Kumari द्वारा शेयर वीडियो के अनुसार, जुड़ शीतल की सबसे खास बात है इस दिन पानी से आशीर्वाद देना। इस दिन घर के जो सबसे बड़े बुजुर्ग होते हैं, वो सुबह-सुबह उठकर बच्चों और छोटों के सिर पर बासी पानी यानी रात भर लोटे या कलश में रखे गए पानी को छिड़कते हैं। बड़े-बुजुर्ग जब पानी डालते हैं, तो वो असल में दुआ देते हैं कि जैसे यह पानी ठंडा है, वैसे ही तुम्हारा दिमाग, तुम्हारी लाइफ और तुम्हारी सेहत हमेशा शांत और ठंडी बनी रहे। गर्मी के मौसम में होने वाली बीमारियों और गुस्से से तुम बचे रहो। वहीं गांवों में लोग खेतों, पशुओं और पेड़-पौधों पर भी पानी डालते हैं। जानकारी के लिए बता दें, "जुड़" का मतलब होता है जुड़ना या ठंडा होना और "शीतल" का मतलब है ठंडक।
जुड़ शीतल पर खाने-पीने का भी अपना अलग ही मजा होता है। इसलिए इस दिन होने वाले लोकगीत, पारंपरिक व्यंजन और सांस्कृतिक आयोजन इस दिन की रौनक को बढ़ा देते हैं। इस दिन ताजा खाना बनाने के बजाय बासी भोजन यानी बासी पौआ खाने का रिवाज है। इसमें एक दिन पहले बनी कढ़ी-बरी, भात यानी चावल और सत्तू खाया जाता है। सुनने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन इसके पीछे लॉजिक यह है कि गर्मी की शुरुआत में ठंडा खाना पेट को आराम देता है और शरीर का टेंपरेचर सही रखता है। इसलिए इस दिन आम की चटनी, तरुआ यानी पकौड़े और दही-चूड़ा खासतौर पर बनाए जाते हैं और घरवालों के साथ ही रिश्तेदारों और पड़ोसियों के साथ मिलकर खाया जाता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। हमारा उद्देश्य किसी भी धर्म, आस्था या पारंपरिक मान्यता को ठेस पहुंचाना नहीं है।