Passive Euthanasia: सुप्रीम कोर्ट ने 10 साल से कोमा में पड़े युवक के लिए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी। जानिए क्या होती है Passive Euthanasia, एक्टिव यूथेनेशिया से इसका क्या फर्क है और भारत में इसके नियम क्या हैं।
Passive Euthanasia: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है, जिसने मेडिकल एथिक्स और मरीजों के अधिकारों को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। अदालत ने 31 साल के एक युवक की लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी है, जो पिछले 10 साल से ज्यादा समय से कोमा यानी वेजिटेटिव स्टेट में था।
इस युवक का नाम हरिश राणा है। साल 2013 में चौथी मंजिल की बालकनी से गिरने के बाद उन्हें गंभीर सिर की चोट लगी थी। तब से वह कोमा में हैं और उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। ऐसे में कोर्ट ने उनकी लाइफ सपोर्ट हटाने की इजाजत दे दी। इस प्रक्रिया को पैसिव यूथेनेशिया कहा जाता है।
पैसिव यूथेनेशिया का मतलब है जब डॉक्टर ऐसी मेडिकल मशीनों या इलाज को बंद कर देते हैं, जो कृत्रिम रूप से किसी मरीज की जिंदगी को लंबे समय तक बनाए रख रहे हों, जबकि उसके ठीक होने की कोई उम्मीद न हो। इसमें आमतौर पर कुछ लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाए जाते हैं, जैसे वेंटिलेटर, आर्टिफिशियल फीडिंग ट्यूब, डायलिसिस सपोर्ट। कुछ ऐसी दवाएं जो अंगों को काम करते रहने में मदद करती हैं। इसका मतलब यह नहीं होता कि मरीज को जानबूझकर मौत दी जा रही है। बल्कि इसमें सिर्फ वह इलाज बंद किया जाता है जो बीमारी को ठीक नहीं कर पा रहा और केवल मशीनों के सहारे जिंदगी चल रही है।
भारत में पैसिव यूथेनेशिया कानूनी है, लेकिन एक्टिव यूथेनेशिया अभी भी गैरकानूनी है। एक्टिव यूथेनेशिया में किसी व्यक्ति को जानबूझकर ऐसी दवा या इंजेक्शन दिया जाता है जिससे उसकी मौत हो जाए। जबकि पैसिव यूथेनेशिया में सिर्फ इलाज या लाइफ सपोर्ट को हटाया जाता है और बीमारी को अपनी प्राकृतिक प्रक्रिया से आगे बढ़ने दिया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही साफ किया था कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी जीवन के अधिकार का हिस्सा है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आता है। इस फैसले का मतलब है कि अगर कोई व्यक्ति असाध्य बीमारी से जूझ रहा हो या लंबे समय से कोमा में हो, तो कुछ शर्तों के साथ लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी जा सकती है।
कोर्ट ने लिविंग विल की भी व्यवस्था को मान्यता दी है। लिविंग विल एक ऐसा दस्तावेज होता है जिसमें कोई व्यक्ति पहले से लिखकर बता सकता है कि अगर भविष्य में वह गंभीर हालत में हो और फैसला लेने की स्थिति में न हो, तो उसके इलाज के बारे में क्या किया जाए। इससे डॉक्टरों और परिवार को मरीज की इच्छा समझने में मदद मिलती है।
ऐसे मामलों में फैसला लेना आसान नहीं होता। आमतौर पर अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक मेडिकल बोर्ड मरीज की हालत की जांच करती है। इसके बाद परिवार की सहमति ली जाती है और पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड रखा जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि इसका उद्देश्य मौत को जल्दी लाना नहीं होता, बल्कि उस स्थिति में मरीज को अनावश्यक पीड़ा से बचाना होता है जब इलाज से कोई फायदा नहीं हो रहा हो। कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मरीजों के अधिकारों और गरिमा को महत्व देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।