
RO Water Purifier: आरओ लगवाते समय ज्यातर घरों में सबसे पहले पानी का टीडीएस चेक किया जाता है। टीडीएस से पानी में घुले हुए पदार्थों की मात्रा का एक सामान्य अंदाजा मिलता है, लेकिन सिर्फ टीडीएस की रीडिंग से पानी की पूरी गुणवत्ता का पता नहीं चलता। भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards) के पेयजल मानक आईएस 10500:2012 में पानी की गुणवत्ता जांच के लिए कई अलग-अलग मापदंड शामिल किए गए हैं। इनमें रंग, गंदलापन, कुल कठोरता, आयरन, मैग्नीशियम, फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक, सीसा, कीटनाशक और बैक्टीरियोलॉजिकल जांच जैसे मानक शामिल हैं।
इसलिए घर के पानी के लिए आरओ या किसी दूसरे जल शोधन उपकरण का चुनाव करते समय केवल टीडीएस देखने के बजाय पानी की पूरी जांच रिपोर्ट को समझना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।
टीडीएस पानी में मौजूद घुले पदार्थों की कुल मात्रा का एक संकेत देता है, लेकिन यह नहीं बताता कि पानी में कौन कौन से पदार्थ मौजूद हैं। इसलिए केवल टीडीएस मीटर की रीडिंग देखकर पानी को पूरी तरह सुरक्षित या असुरक्षित मान लेना सही नहीं है। पानी की जांच में पीएच भी एक महत्वपूर्ण मापदंड है। आईएस 10500:2012 में पेयजल के लिए पीएच सहित कई गुणवत्ता मानकों को शामिल किया गया है।
कुछ इलाकों में भूजल में फ्लोराइड की मात्रा अधिक हो सकती है। ऐसे क्षेत्रों में पानी की जांच के दौरान फ्लोराइड की मात्रा देखना उपयोगी हो सकता है। इसलिए अगर घर में भूजल यानी बोरवेल या ट्यूबवेल का पानी आता है और इलाके में फ्लोराइड की समस्या की जानकारी है, तो पानी की जांच रिपोर्ट में फ्लोराइड की स्थिति जरूर देखें।
पेयजल की गुणवत्ता जांच में आर्सेनिक और सीसा भी महत्वपूर्ण रासायनिक मापदंड हैं। भारतीय मानक ब्यूरो के पेयजल मानक में इन दोनों के लिए भी गुणवत्ता संबंधी आवश्यकताएं दी गई हैं। इन पदार्थों की जानकारी केवल टीडीएस की रीडिंग से नहीं मिलती। इसलिए यदि पानी की गुणवत्ता को लेकर संदेह है, खासकर ऐसे इलाके में जहां भूजल की समस्या सामने आती रही है, तो प्रयोगशाला जांच रिपोर्ट को देखना उपयोगी है।
पानी की गुणवत्ता जांच में नाइट्रेट भी एक महत्वपूर्ण मापदंड है। खासतौर पर भूजल के मामले में इसकी जांच पर ध्यान दिया जा सकता है। यदि आपके इलाके में भूजल की गुणवत्ता को लेकर पहले से कोई समस्या सामने आई है, तो पानी की जांच कराते समय नाइट्रेट समेत संबंधित रासायनिक मापदंडों की रिपोर्ट देखना बेहतर रहेगा।
पानी में आयरन की मात्रा और पानी की कुल कठोरता भी उसकी गुणवत्ता से जुड़े महत्वपूर्ण मापदंड हैं। भारतीय मानक ब्यूरो के पेयजल मानक में दोनों को शामिल किया गया है। पानी में आयरन अधिक होने पर रंग और स्वाद जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं, जबकि अधिक कठोरता पानी के इस्तेमाल से जुड़ी अलग-अलग परेशानियों का कारण बन सकती है। इसलिए पानी की रिपोर्ट में इन दोनों मापदंडों को भी देखना चाहिए।
पानी की गुणवत्ता का मामला केवल रासायनिक पदार्थों तक सीमित नहीं है। भारतीय मानक ब्यूरो के पेयजल मानक में बैक्टीरियोलॉजिकल आवश्यकताओं के साथ विषाणु और जैविक जांच का भी उल्लेख है। इसमें क्रिप्टोस्पोरिडियम और जिआर्डिया जैसे सूक्ष्मजीवों से जुड़ी जांच भी शामिल है। इसलिए अगर पानी की गुणवत्ता को लेकर संदेह है, तो केवल टीडीएस जांच पर निर्भर रहने के बजाय पानी की सूक्ष्मजीव संबंधी जांच के बारे में भी जानकारी लेना उपयोगी हो सकता है।
हर पानी की समस्या एक जैसी नहीं होती। किसी जगह पानी में घुले पदार्थों की मात्रा अलग हो सकती है, तो किसी जगह फ्लोराइड, आयरन, नाइट्रेट या किसी दूसरे पदार्थ की समस्या हो सकती है। इसलिए सिर्फ टीडीएस की एक रीडिंग के आधार पर यह तय करना सही नहीं होगा कि घर में कौन सा जल शोधन उपकरण लगाना चाहिए। पहले पानी की गुणवत्ता की जानकारी लेना और उसके बाद जरूरत के अनुसार उपकरण का चुनाव करना ज्यादा व्यावहारिक तरीका हो सकता है।
पानी की समस्या और स्रोत के अनुसार इन मापदंडों पर ध्यान दिया जा सकता है
घर में आने वाले पानी का स्रोत भी महत्वपूर्ण है। पानी नगर निकाय की आपूर्ति से आ रहा है, बोरवेल से या किसी दूसरे स्रोत से, इसके आधार पर पानी की गुणवत्ता अलग हो सकती है। जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission) के अनुसार, पेयजल स्रोतों की रासायनिक जांच साल में कम से कम एक बार और बैक्टीरियोलॉजिकल जांच साल में कम से कम दो बार, प्री मानसून और पोस्ट मानसून में करने की सलाह दी गई है। दस्तावेज में घरेलू स्तर, वितरण बिंदुओं, स्कूलों और आंगनवाड़ियों का भी उल्लेख है। हालांकि यह पेयजल गुणवत्ता की निगरानी से जुड़ी सलाह है, इसे हर घर में आरओ लगवाने से पहले अनिवार्य जांच की समय सीमा नहीं माना जाना चाहिए।