
Mandal Commission: भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक न्याय की चर्चा जब भी होती है, मंडल आयोग का उल्लेख स्वाभाविक रूप से सामने आता है। करीब 35 वर्ष पहले लागू हुई मंडल आयोग की प्रमुख सिफारिशों ने देश की राजनीति, शिक्षा व्यवस्था और सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों की भागीदारी को नई दिशा दी। इसके बावजूद आज भी यह बहस जारी है कि क्या मंडल आयोग का उद्देश्य पूरी तरह पूरा हो पाया है या सामाजिक न्याय की लड़ाई अभी अधूरी है। इन्हीं सवालों को लेकर मंडल दिवस के अवसर पर राजधानी लखनऊ के इको गार्डन में 'मंडल चेतना जन आंदोलन' की शुरुआत होने जा रही है। आंदोलन के माध्यम से मंडल आयोग की शेष सिफारिशों को लागू करने, पिछड़े वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने और सामाजिक समानता सुनिश्चित करने की मांग उठाई जाएगी।
राजधानी लखनऊ का इको गार्डन एक बार फिर बड़े सामाजिक आंदोलन का साक्षी बनने जा रहा है। आयोजकों के अनुसार प्रदेश के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में सामाजिक संगठनों, छात्र-युवा समूहों, पिछड़ा वर्ग संगठनों और सामाजिक न्याय के पक्षधर लोगों के पहुंचने की संभावना है। कार्यक्रम के दौरान विशाल धरना-प्रदर्शन, जनसभा और विचार गोष्ठी का आयोजन किया जाएगा।
आंदोलन का मुख्य उद्देश्य केंद्र और राज्य सरकार का ध्यान उन सिफारिशों की ओर आकर्षित करना है, जिन्हें आंदोलनकारी अब भी अधूरा मानते हैं। उनका कहना है कि मंडल आयोग की कई महत्वपूर्ण सिफारिशें वर्षों बाद भी पूरी तरह लागू नहीं हो सकी हैं। इसी कारण आंदोलन का प्रमुख नारा रखा गया है- मंडल कमीशन की बाकी सिफारिशें लागू करो, वरना कुर्सी खाली करो।"
वर्ष 1979 में तत्कालीन जनता पार्टी सरकार ने समाज में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करने तथा उन्हें समान अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया था। आयोग ने व्यापक सर्वेक्षण और अध्ययन के बाद अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, जिसमें देश की बड़ी आबादी को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा बताते हुए उन्हें सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण देने सहित कई अन्य महत्वपूर्ण सिफारिशें की गई थीं।
हालांकि आयोग की रिपोर्ट कई वर्षों तक लागू नहीं हो सकी। वर्ष 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इसकी प्रमुख सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की। इस निर्णय के बाद देशभर में व्यापक राजनीतिक बहस, समर्थन और विरोध देखने को मिला। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी कुछ संवैधानिक शर्तों के साथ पिछड़े वर्गों के आरक्षण को वैध माना। इसके बाद से मंडल आयोग भारतीय राजनीति का स्थायी विमर्श बन गया।
मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद शिक्षा और सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों, प्रशासनिक सेवाओं और विभिन्न सरकारी विभागों में पिछड़े वर्गों के युवाओं की संख्या पहले की तुलना में बढ़ी। जिन परिवारों की पीढ़ियां कभी शिक्षा और सरकारी सेवाओं से दूर थीं, उनके बच्चों को नई संभावनाएं मिलीं।
सामाजिक विशेषज्ञ पंकज चतुर्वेदी का मानना है कि आरक्षण व्यवस्था ने केवल रोजगार के अवसर ही नहीं बढ़ाए, बल्कि सामाजिक सम्मान और आत्म विश्वास भी मजबूत किया। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले अनेक युवाओं ने उच्च शिक्षा प्राप्त कर प्रशासन, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई।
हालांकि आंदोलन से जुड़े संगठन मानते हैं कि सामाजिक न्याय का लक्ष्य अभी अधूरा है। उनका कहना है कि उच्च शिक्षा, न्यायपालिका, निजी क्षेत्र और नीति निर्माण से जुड़े कई महत्वपूर्ण संस्थानों में पिछड़े वर्गों की भागीदारी अभी भी उनकी आबादी के अनुपात में नहीं है। उनका यह भी आरोप है कि मंडल आयोग की कई सिफारिशें आज तक पूरी तरह लागू नहीं की गईं, जिससे सामाजिक और आर्थिक समानता का सपना अधूरा रह गया है। आंदोलनकारी यह भी मांग कर रहे हैं कि पिछड़े वर्गों से जुड़े आंकड़ों, योजनाओं और प्रतिनिधित्व की समय-समय पर समीक्षा की जाए, ताकि नीतियों का वास्तविक लाभ पात्र लोगों तक पहुंच सके।
इस बार के आंदोलन में शिक्षा और रोजगार के साथ-साथ राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया जाएगा। आयोजकों का कहना है कि लोकतंत्र में नीति निर्माण की प्रक्रिया में पिछड़े वर्गों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित किए बिना सामाजिक न्याय की अवधारणा पूरी नहीं हो सकती। उनका मानना है कि पंचायत से लेकर संसद तक प्रतिनिधित्व का दायरा और अधिक मजबूत किया जाना चाहिए। आंदोलन के दौरान राजनीतिक दलों से भी इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की जाएगी। आयोजकों का कहना है कि सामाजिक न्याय केवल चुनावी घोषणा-पत्र का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है।
एक समय मंडल दिवस केवल सामाजिक संगठनों तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब यह पिछड़े वर्गों के अधिकारों, समान अवसर और प्रतिनिधित्व के व्यापक विमर्श का मंच बन चुका है। हर वर्ष इस अवसर पर सामाजिक न्याय, शिक्षा, रोजगार, आर्थिक भागीदारी और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होती है। इस वर्ष भी लखनऊ का आयोजन इन्हीं विषयों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाने का प्रयास करेगा।
मंडल दिवस पर होने वाले इस आंदोलन को राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़े वर्गों की भूमिका हमेशा निर्णायक रही है। ऐसे में आंदोलन के दौरान उठने वाली मांगों पर सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया पर सभी की नजर रहेगी। यह भी देखा जाएगा कि मंडल आयोग की शेष सिफारिशों और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर आगे क्या ठोस पहल होती है।
करीब साढ़े तीन दशक पहले मंडल आयोग ने भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक न्याय की नई दिशा तय की थी। शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में बदलाव जरूर आया, लेकिन समान प्रतिनिधित्व और सामाजिक बराबरी की बहस आज भी जारी है। लखनऊ के इको गार्डन से शुरू हो रहा 'मंडल चेतना जन आंदोलन' इस बहस को एक बार फिर नई गति देने का प्रयास है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह आंदोलन केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाता है या सामाजिक न्याय की दिशा में कोई नई पहल और ठोस नीति निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है।