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भाई की मौत से बेखबर रहा अतीक का बड़ा बेटा उमर, सुपुर्द-ए-खाक के लिए पैरोल मांगने की तैयारी में परिवार

Atiq Ahmed's son: झांसी सड़क हादसे में माफिया अतीक अहमद के छोटे बेटे आबान की मौत के बाद परिवार में मातम है। झांसी जेल में बंद भाई अली खबर सुनते ही रो पड़ा, जबकि लखनऊ जेल में बंद उमर बेखबर रहा। जनाजे में शामिल होने के लिए वकीलों ने पैरोल हेतु हाईकोर्ट में अर्जी की तैयारी की है।
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लखनऊ

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Ankit Sai

Aug 07, 2026

Atiq Ahmed

छोटे भाई की मौत से बेखबर रहा उमर अतीक

Aban Ahmed Death: झांसी सड़क हादसे में माफिया अतीक अहमद के सबसे छोटे बेटे आबान अहमद की मौत के बाद परिवार में मातम का माहौल है। एक ओर झांसी जेल में बंद बड़े भाई अली अहमद को जैसे ही हादसे की जानकारी मिली, वह रो पड़े। वहीं दूसरी ओर लखनऊ जेल में बंद उसका बड़ा भाई उमर देर रात तक अनजान रहा। जेल सूत्रों के मुताबिक, प्रशासन की ओर से उसे हादसे की कोई सूचना नहीं दी गई। ऐसे में शुक्रवार सुबह अखबार पढ़ने के बाद ही उसे छोटे भाई की मौत की जानकारी मिलने की संभावना है।

जेल प्रशासन ने बताई वजह

सूत्रों के मुताबिक, जेल अधिकारी ने बताया कि जेल में निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत ही सूचनाएं दी जाती हैं। यही कारण है कि उमर को अभी तक यह जानकारी नहीं दी गई कि उसके छोटे भाई की सड़क हादसे में मौत हो चुकी है।

अली को मिली खबर, सुनते ही रो पड़ा

झांसी जेल में बंद अली अहमद को भाई आबान की मौत की सूचना दे दी गई है। जानकारी मिलते ही वह भावुक हो गया और रोने लगा। कुछ देर बाद वह चुपचाप बैठ गया। परिवार के लोगों के मुताबिक, आबान ही अली से सबसे ज्यादा मिलने जेल जाया करता था। पिछले 10 महीनों में उसने 49 बार जेल जाकर अली से मुलाकात की थी। दोनों भाइयों के बीच गहरा लगाव बताया जाता है।

पैरोल के लिए हाईकोर्ट जाने की तैयारी

आबान के जनाजे में शामिल होने के लिए परिवार ने प्रयागराज जिला अदालत के वकीलों से संपर्क किया है। वकीलों ने परिवार को बताया कि अली और उमर को पैरोल या अंतरिम राहत दिलाने के लिए हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल करनी होगी।

अली और उमर की ओर से दिए गए प्रार्थनापत्र में कहा गया कि उनके छोटे भाई आबान, जिसकी गुरुवार को सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई है। उसके अंतिम संस्कार में शामिल होना उनका मानवीय, पारिवारिक और धार्मिक दायित्व है। प्रार्थनापत्र में यह भी कहा गया कि इस्लाम धर्म में मृतक के अंतिम संस्कार और सुपुर्द-ए-खाक में परिवार के सदस्यों की उपस्थिति का विशेष महत्व है तथा संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार में ऐसे पारिवारिक कर्तव्यों को निभाना भी शामिल है।