
About MLA Sachin Yadav: उत्तर प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान हंगामे के बीच समाजवादी पार्टी के विधायक सचिन यादव के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की गई। विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने अनुशासनहीनता और सदन की कार्यवाही में व्यवधान डालने के आरोप में उन्हें पूरे मानसून सत्र के लिए सदन से निष्कासित कर दिया। अध्यक्ष ने यह भी चेतावनी दी कि यदि भविष्य में भी सदन की मर्यादा का उल्लंघन किया गया तो सदस्यता रद्द करने जैसी कार्रवाई पर भी विचार किया जा सकता है।
जानकारी के अनुसार, CM योगी आदित्यनाथ सदन में अपना वक्तव्य दे रहे थे। इसी दौरान विपक्ष की ओर से विरोध शुरू हुआ। आरोप है कि सचिन यादव पोस्टर लेकर विरोध प्रदर्शन करने लगे और लगातार नारेबाजी करते रहे। विधानसभा अध्यक्ष ने पहले उन्हें कई बार शांत रहने और अपनी सीट पर लौटने की चेतावनी दी, लेकिन स्थिति सामान्य नहीं होने पर उन्होंने सख्त कदम उठाते हुए सचिन यादव को पूरे सत्र के लिए सदन से बाहर करने का आदेश दे दिया।
अध्यक्ष के आदेश के बाद विधानसभा के मार्शलों ने सचिन यादव को सदन से बाहर ले गए। आदेश के अनुसार अब वह मानसून सत्र की शेष कार्यवाही में भाग नहीं ले सकेंगे। इस कार्रवाई के बाद विपक्षी दलों ने विरोध जताया और सरकार पर विपक्ष की आवाज दबाने का आरोप लगाया। वहीं सत्ता पक्ष ने सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए कार्रवाई को आवश्यक बताया।
सचिन यादव उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले की जसराना विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के विधायक हैं। उनका जन्म वर्ष 1984 में हुआ था और वह जसराना क्षेत्र के निवासी हैं।
सचिन यादव समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता वीरपाल सिंह यादव के पुत्र हैं। शिक्षा की बात करें तो उन्होंने वर्ष 2009 में डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा से एमए की डिग्री प्राप्त की। उनकी पत्नी व्यवसाय से जुड़ी हुई हैं। सचिन यादव ने वर्ष 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर जसराना सीट से चुनाव लड़ा था। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार मानवेंद्र लोधी को 836 मतों के अंतर से हराकर जीत दर्ज की। चुनाव में उन्हें कुल 1,08,289 वोट मिले थे।
चुनावी हलफनामे के अनुसार, सचिन यादव ने करीब 29 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्ति घोषित की थी। इसी कारण वह जसराना विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाले सबसे संपन्न उम्मीदवारों में शामिल रहे।
विधानसभा से पूरे सत्र के लिए निष्कासन के फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति में इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। विपक्ष इस कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बता रहा है, जबकि सत्ता पक्ष का कहना है कि सदन की कार्यवाही और मर्यादा बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है।