
लखनऊ. अभी तक ये माना जाता था कि धान की खेती की शुरुआत लगभग आठ हजार 400 साल पहले चीन में हुई थी लेकिन राजधानी स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के तीन भू-वैज्ञानिकों ने अपनी स्टडी में दावा किया है कि 9250 साल पहले ही भारत में धान की खेती शुरू हो गई थी। इस संस्थान के भू-वैज्ञानिक - बिश्र्वजीत ठाकुर, अंजु सक्सेना और इंदरबीर सिंह ने संतकबीर नगर के लहुरादेवा झील के पास मिट्टी के सैंपल लेकर स्टडी की। इस जगह के बारे में कहा जाता है कि यहां धान की खेती हुआ करती थी।
जानें क्या मिला स्टडी में
भू-वैज्ञानिक बिश्र्वजीत ठाकुर के मुताबिक, चीन का दावा है कि धान की खेती उनके यहां लगभग आठ हजार साल पुरानी है लेकिन हमारी स्टडी में सामने आया कि भारत में उससे पहले ही इस तरह की खेती हुआ करती थी। उन्होंने बताया कि संतकबीर नगर में लहुरादेवा झील के पास उन्होंने एएसआई (पुरातत्व विभाग) की इजजात से गड्डा कर मिट्टी के 28 सैंपल लिए। इन सैंपल में डायटम (जीवाश्म) को लेकर लगभग तीन साल स्टडी की। उन्होंने चार तरह के डायटम (जीवाश्म) की स्टडी की। इनमें प्लांटिक, बेंथिक, पैडी-फील्ड और एंथ्रोपोजेनिक। पैडी-फील्ड डायटम धान की खेती में होते हैं। उन्होंने पैडी-फील्ड डायटम पर रिसर्च की।
यहां से लिए थे सैंपल
जीवाश्म से हुआ पहचान
उन्होंने वहां से मिले डायटम(जीवाश्म) के बारे में पता किया कि वे कितने साल पुराने हैं। फिर सामने आया कि वे जीवाश्म लगभग 9250 साल पुराने हैं जिससे ये अंदाजा लग गया कि वहां पहले धान की खेती होती थी। भू-वैज्ञानिक बिश्र्वजीत ठाकुर के मुताबिक,डॉ. राकेश तिवारी ने 2003-04 में इस साइट को खोजा था। ऐसा कहा जाता था कि सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान वहां गतिविधियां होती थीं। जानकारों के मुताबिक, सिंधु घाटी सभ्यता कम से कम 8000 वर्ष पुरानी है। यह हड़प्पा सभ्यता और 'सिंधु-सरस्वती सभ्यता' के नाम से भी जानी जाती है। इसका विकास सिंधु और घघ्घर/हकड़ा (प्राचीन सरस्वती) के किनारे हुआ। मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा, राखीगढ़ी और हड़प्पा इसके प्रमुख केन्द्र थे।
ये आया सामने
स्टडी में ये भी सामने आया कि पहले प्रदूषण का खेती में कोई चिन्ह नहीं था। इसके अलावा उस दौरान लोग चीन के पैटर्न पर नहीं बल्कि अपने अनुसार धान की खेती करते थे। लहुरादावा झील उत्तर भारत की सबसे आरंभिक नियोलिथिक साइटों में से एक है जो मध्य गंगा क्षेत्र में स्थित है। लहुरादेवा पर पुरात्वविद राकेश तिवारी की 2009 में आई रिपोर्ट से नए सी14 डेटिंग का पता चलता है जो चावल से जुडे 8000 ई.पू. और 9000 ई.पू. के बीच के समय का है जो लहुरादेवा को सम्पूर्ण दक्षिण एशिया का सबसे आरंभिक नियोलिथिक साइट बनाता है।
इस संस्थान में पहले भी हुई हैं रिसर्च
बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान( बीएसआईपी) राजधानी में स्थित है। यह भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है। इसका नाम इसके संस्थापक बीरबल साहनी, प्रसिद्ध परावनस्पति वैज्ञानिक के नाम पर रखा गया है। इससे पहले भी यहां के कई वैज्ञानिक इस तरह की रिसर्च कर चुके हैं।