लखनऊ

Makar Sankranti Holiday Cancelled: मकर संक्रांति अवकाश रद्द होने पर बवाल, जानिए किसने दिया आदेश

Holiday Controversy: मकर संक्रांति पर राज्य सरकार द्वारा घोषित अवकाश को एलडीबी बैंक प्रबंधन द्वारा रद्द किए जाने से प्रशासनिक हलकों में विवाद खड़ा हो गया है। सहकारी समितियों के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और एलडीबी बैंक के प्रबंध निदेशक के फैसले ने शासनादेश की अवहेलना और अफसरशाही के बढ़ते वर्चस्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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Jan 15, 2026
मकर संक्रांति पर घोषित अवकाश को सहकारी संस्थाओं ने किया रद्द (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

Holiday Cancelled Despite Govt Order: उत्तर प्रदेश में सहकारी समितियों के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और लैंड डेवलपमेंट बैंक (एलडीबी) के प्रबंध निदेशक के पद को लेकर एक नया प्रशासनिक विवाद खड़ा हो गया है। मकर संक्रांति जैसे प्रमुख पर्व पर राज्य सरकार द्वारा 15 जनवरी को सार्वजनिक अवकाश घोषित किए जाने के बावजूद एलडीबी बैंक के प्रबंध निदेशक कुलश्रेष्ठ द्वारा कर्मचारियों की छुट्टी रद्द किए जाने से शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

राज्य सरकार की ओर से मकर संक्रांति के अवसर पर 15 जनवरी को सभी सरकारी कार्यालयों, निगमों, बोर्डों और सार्वजनिक उपक्रमों में अवकाश घोषित किया गया था। यह आदेश सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से जारी किया गया, जिसे पूरे प्रदेश में लागू माना जाता है। लेकिन इसी दिन एलडीबी बैंक प्रबंधन की ओर से जारी आदेश में कर्मचारियों को स्पष्ट निर्देश दिया गया कि बैंक में सामान्य कार्यदिवस की तरह काम होगा और कोई अवकाश मान्य नहीं होगा।

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इस आदेश के सामने आने के बाद सहकारी विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों में नाराजगी फैल गई। कर्मचारियों का कहना है कि जब प्रदेश सरकार का आदेश स्पष्ट है, तो किसी एक अधिकारी या संस्था को इसे निरस्त करने का अधिकार कैसे मिल सकता है? इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सहकारी समितियों के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और एलडीबी बैंक के प्रबंध निदेशक का ओहदा सरकार के आदेशों से ऊपर हो गया है?

सूत्रों के अनुसार एलडीबी बैंक के प्रबंध निदेशक कुलश्रेष्ठ ने यह निर्णय सहकारी समितियों से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण कार्यों और प्रशासनिक दबाव का हवाला देते हुए लिया। लेकिन कर्मचारियों का तर्क है कि त्योहार के दिन कार्य कराना न केवल संवेदनहीनता को दर्शाता है, बल्कि यह श्रम कानूनों और प्रशासनिक अनुशासन के भी विपरीत है। एलडीबी बैंक प्रदेश की एक महत्वपूर्ण सहकारी वित्तीय संस्था है, जो ग्रामीण और कृषि विकास से जुड़े ऋण कार्यों में अहम भूमिका निभाती है। बैंक के अधिकांश कर्मचारी सहकारी विभाग के अधीन आते हैं और सरकारी सेवक की श्रेणी में माने जाते हैं। ऐसे में सरकार द्वारा घोषित अवकाश को नजरअंदाज करना सीधे तौर पर शासनादेश की अवहेलना माना जा रहा है।

सहकारी विभाग के जानकारों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब सहकारी संस्थाओं के शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारियों के आदेश सरकार के निर्देशों से टकराते नजर आए हों। इससे पहले भी चुनाव, स्थानांतरण और प्रशासनिक फैसलों को लेकर सहकारी समितियों के मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अधिकारों को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं।

तानाशाही फरमान :  कर्मचारी संगठन

मकर संक्रांति को उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में एक महत्वपूर्ण पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह केवल धार्मिक त्योहार ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी बेहद अहम दिन माना जाता है। ऐसे में इस दिन कर्मचारियों को काम पर बुलाना उनके निजी और पारिवारिक जीवन पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। कर्मचारी संगठनों ने इस निर्णय को “तानाशाही फरमान” करार दिया है। सहकारी विभाग के एक कर्मचारी संगठन के पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि यदि सरकार द्वारा घोषित अवकाश भी सुरक्षित नहीं है, तो कर्मचारियों को किस आधार पर राहत मिलेगी? उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ अधिकारी खुद को शासन से ऊपर समझने लगे हैं।

अफसरशाही हावी

इस प्रकरण ने सहकारी समितियों के मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सहकारी चुनावों की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए यह पद अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन यदि इसी पद से जुड़े अधिकारी सरकार के आदेशों को नजरअंदाज करने लगें, तो इससे संस्थागत संतुलन बिगड़ने का खतरा पैदा हो जाता है। राजनीतिक हलकों में भी इस फैसले को लेकर चर्चाएं तेज हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि प्रदेश में “अफसरशाही हावी” होती जा रही है और चुनी हुई सरकार के निर्णयों को भी अधिकारी मनमाने ढंग से चुनौती दे रहे हैं। वहीं सत्तारूढ़ दल के भीतर भी कुछ नेता इस निर्णय से असहज नजर आ रहे हैं।

सूत्र बताते हैं कि इस मामले की जानकारी शासन के उच्च स्तर तक पहुंच चुकी है और सहकारिता विभाग से स्पष्टीकरण मांगे जाने की संभावना है। यदि यह साबित होता है कि अवकाश रद्द करने का आदेश बिना शासन की अनुमति के जारी किया गया है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि सहकारी संस्थाएं कितनी स्वायत्त हैं और उनकी स्वायत्तता की सीमा क्या होनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वायत्तता का मतलब यह नहीं हो सकता कि सरकार के स्पष्ट आदेशों की अनदेखी की जाए।

फिलहाल एलडीबी बैंक के कर्मचारी असमंजस की स्थिति में हैं। एक ओर सरकार का अवकाश आदेश है, तो दूसरी ओर बैंक प्रबंधन का कार्य करने का निर्देश। ऐसे में कर्मचारी यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि किस आदेश का पालन करें।

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