उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ, जब मायावती और मुलायम सिंह के समर्थन वापस लेने से कल्याण सिंह सरकार गिरा दी गई। जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन उनकी सरकार सिर्फ 31 घंटे चली।
Kalyan Singh Government Fall: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 1998 का वो दौर बेहद उथल-पुथल भरा था। लोकसभा चुनाव चल रहे थे और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे। अचानक एक साजिश ने सब कुछ बदल दिया। बसपा की मायावती और सपा के मुलायम सिंह यादव ने मिलकर भाजपा की सरकार गिराने की योजना बनाई। मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐलान किया कि कल्याण सिंह की सरकार गिर चुकी है। सिर्फ चार घंटों में कल्याण सिंह को हटा दिया गया और उनके ही कैबिनेट के मंत्री जगदंबिका पाल नए सीएम बन गए। लेकिन ये सरकार सिर्फ 31 घंटे चली। अटल बिहारी वाजपेयी के अनशन और कोर्ट के दखल से कल्याण सिंह की वापसी हुई। ये पूरी घटना यूपी की सियासत का एक बड़ा किस्सा है। आइए, जानते हैं कैसे ये सारी स्क्रिप्ट लिखी गई और सबसे कम समय के लिए मिले सीएम ने क्या किया।
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बात 1995 के गेस्ट हाउस कांड से शुरू होती है। उस समय मायावती और मुलायम सिंह यादव के बीच गहरी दुश्मनी थी। गेस्ट हाउस में हमले के बाद मायावती ने भाजपा से हाथ मिलाया और कल्याण सिंह की सरकार को समर्थन दिया। 1996 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 174 सीटें मिलीं, सपा को 110, बसपा को 67 और अन्य पार्टियों जैसे कांग्रेस, जनता दल, लोकतांत्रिक कांग्रेस को कुल 73 सीटें। मायावती और लोकतांत्रिक कांग्रेस के समर्थन से कल्याण सिंह की सरकार बनी। लेकिन ये गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चला। 1997 में विधानसभा में हुई हिंसा ने राज्यपाल रोमेश भंडारी को नाराज कर दिया। उन्होंने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की, लेकिन केंद्र ने मंजूर नहीं किया। कल्याण सिंह ने अपनी सरकार बचाने के लिए सभी समर्थक विधायकों को मंत्री बना दिया, जिससे कैबिनेट में 94 सदस्य हो गए। ये फैसला भी विवादास्पद रहा।
21 फरवरी 1998 को लखनऊ में मायावती ने दोपहर 12 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। मीडिया का बड़ा जमावड़ा था। मायावती ने ऐलान किया कि कल्याण सिंह की सरकार से बसपा अपना समर्थन वापस ले रही है। अब उनके पास बहुमत नहीं बचा। उन्होंने कल्याण सिंह से इस्तीफा मांगा। ये सुनकर सियासी हलचल मच गई। कुछ देर बाद मुलायम सिंह यादव ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि अगर मायावती भाजपा सरकार गिराने को तैयार हैं, तो सपा भी साथ देगी। दोनों पार्टियां, जो पहले दुश्मन थीं, अब एक हो गईं। ये लोकसभा चुनाव के बीच का समय था। 23 फरवरी को यूपी की कई सीटों पर वोटिंग होनी थी और प्रचार का आखिरी दिन चल रहा था।
उस समय कल्याण सिंह संभल में डीपी यादव के लिए चुनावी सभा कर रहे थे। जैसे ही उन्हें साजिश की खबर मिली, उन्होंने सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए और लखनऊ की ओर रवाना हो गए। वे जानते थे कि ये बड़ा षड्यंत्र है। शाम तक वे राजधानी पहुंचे, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। कल्याण सिंह ने बहुमत साबित करने की मांग की, लेकिन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने उन्हें मौका नहीं दिया। भंडारी पहले से कल्याण सिंह से नाराज थे, क्योंकि 1997 की विधानसभा हिंसा में उन्होंने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की थी, जो लागू नहीं हुई।
दोपहर 2 बजे मायावती अपने विधायकों के साथ राजभवन पहुंचीं। उनके साथ अजीत सिंह की भारतीय किसान कामगार पार्टी, जनता दल और लोकतांत्रिक कांग्रेस के विधायक भी थे। मायावती ने राज्यपाल से कहा कि कल्याण सिंह की सरकार को तुरंत बर्खास्त करें, क्योंकि बहुमत खो चुका है। उन्होंने जगदंबिका पाल को नए विधायक दल नेता के रूप में पेश किया। जगदंबिका पाल तब कल्याण सिंह की कैबिनेट में यातायात मंत्री थे और बस्ती से विधायक। वे लोकतांत्रिक कांग्रेस के नेता थे। राज्यपाल ने मायावती की बात मान ली और शाम 5 बजे कल्याण सिंह की सरकार बर्खास्त कर दी। कल्याण सिंह राजभवन पहुंचे, लेकिन भंडारी ने उन्हें फ्लोर टेस्ट का मौका नहीं दिया।
सरकार गिरते ही जगदंबिका पाल की शपथ की तैयारी शुरू हो गई। रात 10 बजे वे यूपी के 17वें मुख्यमंत्री बने। लोकतांत्रिक कांग्रेस के नरेश अग्रवाल ने डिप्टी सीएम की शपथ ली। शपथ ग्रहण में मायावती समेत सभी विरोधी नेता मौजूद थे। इतनी जल्दबाजी थी कि राष्ट्रगान बजाना ही भूल गए। जगदंबिका पाल ने अगले दिन सुबह कैबिनेट मीटिंग बुलाई, लेकिन ज्यादा कुछ नहीं कर पाए। वे सिर्फ 31 घंटे सीएम रहे। इस दौरान उन्होंने कुछ फैसले लिए, जैसे अधिकारियों से मीटिंग, लेकिन कोई बड़ा काम नहीं हो सका। उनकी सरकार को '31 घंटे की सरकार' कहा जाता है।
सरकार गिरते ही भाजपा ने विरोध शुरू कर दिया। 22 फरवरी को अटल बिहारी वाजपेयी दिल्ली के स्टेट गेस्ट हाउस में अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ गए। कार्यकर्ता नारेबाजी करने लगे। हालात बिगड़ने लगे। इसी बीच भाजपा नेता नरेंद्र सिंह गौड़ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। कोर्ट ने कल्याण सिंह की सरकार बहाल करने का आदेश दिया। जगदंबिका पाल को हटना पड़ा। कोर्ट ने कल्याण सिंह को तीन दिनों में सदन में विश्वास मत हासिल करने को कहा।
26 फरवरी को विधानसभा में फ्लोर टेस्ट हुआ। सुरक्षा कड़ी थी, 16 से ज्यादा वीडियो कैमरे लगे थे। बहुमत के लिए 213 विधायकों की जरूरत थी, लेकिन कल्याण सिंह को 225 मत मिले। जगदंबिका पाल को सिर्फ 196 समर्थन मिला। इसके बाद लोकतांत्रिक कांग्रेस के विधायक (जगदंबिका को छोड़कर) कल्याण सिंह के साथ आ गए। ये फ्लोर टेस्ट यूपी की राजनीति में ऐतिहासिक था।
कोर्ट के फैसले के बाद कल्याण सिंह सीएम ऑफिस पहुंचे, लेकिन जगदंबिका पाल कुर्सी पर बैठे थे। वे बोले, "कोर्ट का लेटर दिखाओ, तब हटूंगा।" ये पहला मौका था जब दो सीएम आमने-सामने थे। अधिकारियों और नेताओं के समझाने पर जगदंबिका हटे। अखबारों में ये खबरें छाई रहीं। पॉलिटिकल एक्सपर्ट अरविंद जय तिलक कहते हैं कि ये यूपी की राजनीति का 'एक्सीडेंट' था। राज्यपाल रोमेश भंडारी की खूब किरकिरी हुई।
ये घटना लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए मुद्दा बनी। 1999 के चुनाव में उन्होंने 'कल्याण वर्सेस जगदंबिका' को प्रचारित किया। जनता को बताया कि विपक्ष लोकतंत्र को कुचलने के लिए साजिश रचता है। कांग्रेस और अन्य पार्टियां कुछ भी कर सकती हैं। नतीजा ये हुआ कि भाजपा को फायदा मिला। ये घटना दिखाती है कि यूपी की सियासत में साजिशें कैसे सरकारें बनाती और गिराती हैं। आज भी ये किस्सा राजनीतिक चर्चाओं में जिंदा है।