
Mathura Woman Walks Again: चिकित्सा जगत में जटिल सर्जरी के बाद मरीज की स्थिति में सुधार उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आया है। मथुरा की रहने वाली 27 वर्षीय महिला, जो पैरों में कमजोरी के कारण करीब तीन महीने से चलने में असमर्थ थीं, अब सहारे से चलने लगी हैं। कल्याण सिंह सुपर स्पेशलिटी कैंसर संस्थान, लखनऊ में न्यूरो सर्जरी विभाग की टीम ने दो चरणों में ऑपरेशन कर उनकी रीढ़ से जुड़े पांच ट्यूमर निकाले। इनमें एक ट्यूमर रीढ़ के रास्ते छाती तक पहुंच गया था और फेफड़े पर दबाव डाल रहा था, जबकि चार अन्य ट्यूमर रीढ़ की नसों के भीतर मौजूद थे। सर्जरी के बाद मरीज की हालत में सुधार हो रहा है और उन्हें जल्द अस्पताल से छुट्टी दिए जाने की योजना है।
मथुरा निवासी इस महिला को पैरों में लगातार कमजोरी की समस्या थी। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि वह लगभग तीन महीने से चल नहीं पा रही थीं। इलाज के लिए उन्होंने कई डॉक्टरों से परामर्श लिया। उन्हें सर्जरी की सलाह दी गई, लेकिन पैरों की ताकत वापस आने की संभावना कम बताई गई थी। इससे परिवार के सामने इलाज को लेकर चिंता की स्थिति बनी हुई थी। इसी दौरान मरीज ने कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक और न्यूरोसर्जरी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर विजेन्द्र कुमार से संपर्क किया। उन्होंने मरीज की स्थिति का आकलन करने के बाद उन्हें उपचार के विकल्प समझाए और दो चरणों में सर्जरी करने की योजना बनाई। डॉक्टरों ने जटिलता को देखते हुए सावधानीपूर्वक ऑपरेशन करने का निर्णय लिया।
प्रोफेसर विजेन्द्र कुमार के अनुसार, मरीज एक दुर्लभ बीमारी से पीड़ित थीं, जिसमें शरीर की कई नसों में ट्यूमर विकसित हो जाते हैं। इस मामले में कुल पांच ट्यूमर रीढ़ से संबंधित नसों को दबा रहे थे। इनमें से एक ट्यूमर रीढ़ की हड्डी के क्षेत्र से आगे बढ़कर छाती तक पहुंच गया था और फेफड़े पर दबाव डाल रहा था। शेष चार ट्यूमर रीढ़ के भीतर नसों के पास मौजूद थे। ट्यूमर के दबाव के कारण मरीज के शरीर में कमजोरी बढ़ गई थी और चलने-फिरने की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हुई थी। ऐसे मामलों में ऑपरेशन के दौरान ट्यूमर को निकालने के साथ-साथ आसपास की महत्वपूर्ण नसों और अन्य संरचनाओं को सुरक्षित रखना भी चुनौतीपूर्ण होता है। मरीज की स्थिति और ट्यूमर के स्थान को ध्यान में रखते हुए चिकित्सकों ने दो चरणों में सर्जरी करने की रणनीति अपनाई।
सर्जरी के पहले चरण में रीढ़ और छाती के क्षेत्र में चीरा लगाकर ऑपरेशन किया गया। इस दौरान रीढ़ की नसों से संबंधित ट्यूमर और छाती तक फैले ट्यूमर को निकालने की प्रक्रिया पूरी की गई। यह ऑपरेशन करीब सात घंटे तक चला। ट्यूमर के स्थान और उसके आसपास की महत्वपूर्ण संरचनाओं को देखते हुए यह एक जटिल प्रक्रिया थी। पहले चरण की सर्जरी सफल रहने के बाद मरीज की स्थिति पर निगरानी रखी गई। चिकित्सकों ने आगे के उपचार की तैयारी करते हुए दूसरे ऑपरेशन की योजना को अमल में लाया। इस तरह इलाज को चरणबद्ध तरीके से पूरा किया गया, ताकि शेष ट्यूमर को भी निकाला जा सके।
पहली सर्जरी के कुछ दिनों बाद दूसरे चरण का ऑपरेशन किया गया। इसमें रीढ़ की नसों पर दबाव डाल रहे चार अन्य ट्यूमर सफलतापूर्वक निकाले गए। यह ऑपरेशन करीब छह घंटे तक चला। दोनों सर्जरी में कुल मिलाकर लगभग 13 घंटे का ऑपरेशन समय लगा। न्यूरोसर्जरी टीम में डॉ. अमित कुमार उपाध्याय और डॉ. आशीष मिश्रा शामिल रहे। वहीं, एनेस्थीसिया टीम में डॉ. असीम रशीद और डॉ. अर्चना ने जिम्मेदारी निभाई। जटिल ऑपरेशन के दौरान विभिन्न विशेषज्ञों के बीच समन्वय उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
दोनों सर्जरी के बाद मरीज की हालत में सुधार बताया गया है। जो महिला तीन महीने से चलने में असमर्थ थीं, वह अब थोड़ी मदद से चलने लगी हैं। चिकित्सकों की निगरानी में उनकी रिकवरी जारी है। संस्थान की ओर से जल्द ही उन्हें अस्पताल से छुट्टी देने की योजना है। हालांकि, पैरों की ताकत और चलने की क्षमता में आगे कितना सुधार होगा, यह उनकी रिकवरी और चिकित्सकीय आकलन पर निर्भर करेगा।
संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वरुण विजय के अनुसार, मरीज का इलाज आयुष्मान भारत योजना के तहत किया गया और उनके लिए यह उपचार निःशुल्क रहा। उनके मुताबिक, निजी अस्पतालों में इस तरह की दोनों सर्जरी पर लगभग छह से सात लाख रुपये तक खर्च हो सकता है। योजना के तहत उपचार मिलने से मरीज को जटिल सर्जरी का लाभ बिना इस खर्च का बोझ उठाए मिल सका।
संस्थान के निदेशक प्रोफेसर एम.एल.बी. भट्ट ने जटिल सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम देने वाली न्यूरोसर्जरी टीम को बधाई दी। मरीज की स्थिति में सुधार को चिकित्सकीय टीम के समन्वित प्रयास का परिणाम बताया गया है। यह मामला जटिल न्यूरोसर्जरी, विशेषज्ञों के आपसी तालमेल और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के माध्यम से उपचार उपलब्ध कराने के महत्व को रेखांकित करता है। मरीज की रिकवरी अभी जारी है और आगे की प्रगति पर चिकित्सकों की निगरानी बनी रहेगी।