
Lucknow Mourns 15 Lives Lost in Fire Tragedy: राजधानी लखनऊ ने शायद ही कभी ऐसा मंजर देखा होगा। सोमवार की शाम जब शहर की सड़कों पर रोज की तरह चहल-पहल थी, लोग अपने कामकाज से घर लौट रहे थे और हजारों परिवार अपने बच्चों के लौटने का इंतजार कर रहे थे, उसी वक्त अलीगंज के पुरनिया क्षेत्र में स्थित एक एनिमेशन ट्रेनिंग सेंटर और लाइब्रेरी में अचानक लगी आग ने सब कुछ बदल दिया। कुछ ही मिनटों में आग की लपटों और जहरीले धुएं ने 15 जिंदगियों को अपने आगोश में ले लिया।
यह सिर्फ एक अग्निकांड नहीं था, बल्कि 15 परिवारों के सपनों, उम्मीदों और भविष्य के जलकर राख हो जाने की कहानी है। मंगलवार को लखनऊ की सुबह सामान्य नहीं थी। शहर की आंखें नम थीं, चेहरों पर दर्द था और हर तरफ एक ही सवाल था-आखिर इन बच्चों का कसूर क्या था?
हादसे के दौरान कई बच्चों ने अपने घर फोन किया। किसी ने अपने पिता को कॉल कर कहा, "पापा आग लग गई है, मुझे बचा लो", तो किसी ने अपनी मां से कहा, "मम्मी, मैं शायद नहीं बच पाऊंगा।"
इन शब्दों ने न केवल उन परिवारों को तोड़ दिया, बल्कि पूरे शहर को भीतर तक झकझोर दिया। कई अभिभावक घटनास्थल की ओर भागे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आग की लपटें तेज हो चुकी थीं और धुएं ने पूरे भवन को अपनी चपेट में ले लिया था। आज भी उन माता-पिता के कानों में अपने बच्चों की आखिरी आवाज गूंज रही है। यह आवाज शायद जिंदगी भर उनका पीछा नहीं छोड़ेगी।
जिन बच्चों ने सुबह घर से निकलते वक्त अपने माता-पिता से कहा था कि वे पढ़ाई करने जा रहे हैं, उन्हें क्या पता था कि यह उनकी जिंदगी का आखिरी दिन होगा। कोई प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था, कोई अपने करियर को बेहतर बनाने के लिए प्रशिक्षण ले रहा था और कोई अपने परिवार के सपनों को पूरा करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन शाम होते-होते उनके घरों में किताबों की जगह अर्थियां पहुंचीं। जिन मोहल्लों में मृतकों के शव पहुंचे, वहां का माहौल दिल दहला देने वाला था। किसी घर से मां की चीखें सुनाई दे रही थीं, कहीं पिता बेसुध पड़े थे तो कहीं भाई-बहन अपने प्रियजन की तस्वीर से लिपटकर रो रहे थे।
इस हादसे के बाद राजधानी लखनऊ शोक में डूब गई। कई लोगों ने बताया कि उन्होंने रात का भोजन नहीं किया। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, हर जगह सिर्फ इस अग्निकांड की चर्चा थी। शहर के लोगों का कहना था कि यह केवल 15 परिवारों का दुख नहीं है, बल्कि पूरे लखनऊ का दर्द है। इन बच्चों के साथ पूरा शहर रो रहा है।
इस हादसे ने कई पुराने सवालों को फिर से जिंदा कर दिया है। बीते 4 जून को दिल्ली के मालवीय नगर स्थित एक लॉज में आग लगने से 21 लोगों की मौत हुई थी। उसके बाद भी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई बैठकों और निर्देशों की बातें हुई थीं।
लखनऊ में भी इससे पहले कई बड़े अग्निकांड हुए हैं। विकास नगर की झुग्गी बस्ती में लगी आग में दो मासूमों की मौत हुई थी। हजरतगंज के होटल लेवाना सूट्स अग्निकांड में कई लोगों की जान गई थी और अवैध निर्माण का मामला सामने आया था। चारबाग क्षेत्र के कई होटलों में भी आग की घटनाएं हो चुकी हैं। हर घटना के बाद जांच बैठी, रिपोर्ट मांगी गई और दोषियों पर कार्रवाई का भरोसा दिया गया। लेकिन हर नई घटना के साथ वही सवाल फिर सामने आ जाता है-क्या पहले की जांचों से कोई सबक लिया गया।
इस दर्दनाक हादसे के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सख्त रुख अपनाते हुए दो सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया है। अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात और एडीजी जोन प्रवीण कुमार को इस जांच दल की जिम्मेदारी सौंपी गई है। मुख्यमंत्री ने सात दिन के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है और स्पष्ट कहा है कि दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। मुख्यमंत्री स्वयं घटनास्थल पहुंचे और बाद में केजीएमयू जाकर घायलों तथा मृतकों के परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने प्रभावित परिवारों को हरसंभव सहायता देने का आश्वासन भी दिया।
प्रदेश सरकार ने मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने का ऐलान किया है। वहीं गंभीर रूप से घायलों को पचास-पचास हजार रुपये देने की घोषणा की गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हादसे पर शोक व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये और घायलों को पचास-पचास हजार रुपये की सहायता देने की घोषणा की है। लेकिन जिन परिवारों ने अपने घर के चिराग खो दिए, उनके लिए किसी भी आर्थिक सहायता से उस खालीपन को भर पाना संभव नहीं है।
केजीएमयू और अन्य अस्पतालों के बाहर पूरी रात दर्द और इंतजार का माहौल रहा। कोई अपने बेटे की सलामती की दुआ कर रहा था, तो कोई बेटी की एक झलक पाने के लिए डॉक्टरों से गुहार लगा रहा था। जो लोग घायल हैं, उनके परिवार भी गहरे सदमे में हैं। कई घायलों की हालत गंभीर बनी हुई है और डॉक्टर लगातार उनके इलाज में जुटे हुए हैं।
लखनऊ के लोग अब केवल संवेदना नहीं, बल्कि जवाब चाहते हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या भवन में पर्याप्त फायर सेफ्टी व्यवस्था थी। क्या आपातकालीन निकास का प्रबंध था? क्या संबंधित विभागों ने समय-समय पर निरीक्षण किया था.अगर सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया था, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है।
लखनऊ ने कई बड़े हादसे देखे हैं, लेकिन यह अग्निकांड लंबे समय तक शहर की स्मृतियों में दर्ज रहेगा। यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उन सपनों का अंत है जो अपने माता-पिता की उम्मीदों को पूरा करने के लिए हर दिन मेहनत कर रहे थे।
आज लखनऊ शोकाकुल है। पंद्रह घरों के चिराग बुझ गए हैं। पंद्रह परिवारों की दुनिया उजड़ गई है। और पूरा शहर एक ही सवाल पूछ रहा है,क्या इन मासूम जिंदगियों को बचाया जा सकता था। इस सवाल का जवाब जांच रिपोर्ट दे सकती है, लेकिन उन माता-पिता की आंखों से बहते आंसू शायद कभी नहीं रुकेंगे, जिनके बच्चे सुबह पढ़ाई करने निकले थे और रात को उनकी जली हुई यादें घर लौटकर आईं।