
Samajwadi Party Controversy:समाजवादी पार्टी की जीत के जश्न के बीच राजधानी लखनऊ में पार्टी की अंदरूनी सियासत एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। शहर के विभिन्न इलाकों में लगाए गए पोस्टरों ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों को हवा दे दी है। इन पोस्टरों में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की तस्वीर नदारद है, जबकि उनके चाचा और पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव को प्रमुखता से जगह दी गई है। पोस्टरों पर लिखे नारे 'चचा है तो सपा है' ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।
राजधानी की सड़कों और प्रमुख स्थानों पर नजर आ रहे इन पोस्टरों में शिवपाल यादव को केंद्र में रखकर संदेश देने की कोशिश की गई है। पोस्टरों में उनकी तस्वीर को प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया है। वहीं, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की तस्वीर का शामिल न होना सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है। राजनीतिक जानकार इसे महज पोस्टर लगाने की सामान्य गतिविधि मानने के बजाय पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं के समर्थकों की सक्रियता और अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
पोस्टरों पर लिखा गया नारा 'चचा है तो सपा है' अपने आप में कई राजनीतिक मायने समेटे हुए है। इस नारे के जरिए शिवपाल यादव के समर्थकों ने उनके राजनीतिक योगदान, संगठन में उनकी भूमिका और पार्टी के प्रति उनकी अहमियत को सामने रखने का प्रयास किया है। पोस्टरों में जिस तरह शिवपाल यादव को पोस्टर बॉय बनाया गया है, उससे यह संदेश देने की कोशिश भी दिखाई देती है कि पार्टी की राजनीति में उनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, इन पोस्टरों को किसने लगवाया है और इसके पीछे क्या आधिकारिक मंशा है, इस संबंध में अभी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।
समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव के बीच राजनीतिक मतभेदों का इतिहास किसी से छिपा नहीं है। एक समय दोनों नेताओं के बीच दूरियां पार्टी की राजनीति का बड़ा मुद्दा बनी थीं। बाद में पारिवारिक और राजनीतिक रिश्तों में सुधार हुआ और दोनों नेता कई मौकों पर एक साथ नजर आए। ऐसे में जीत के जश्न के दौरान शिवपाल समर्थकों की ओर से लगाए गए इन पोस्टरों ने पुराने राजनीतिक घटनाक्रमों की यादें फिर ताजा कर दी हैं। खास बात यह है कि पोस्टरों में अखिलेश यादव की तस्वीर का न होना कई तरह के राजनीतिक संकेतों के रूप में देखा जा रहा है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अरविन्द त्रिपाठी के मुताबिक, किसी भी राजनीतिक दल में पोस्टर और होर्डिंग केवल बधाई या शुभकामना देने का माध्यम नहीं होते, बल्कि इनके जरिए समर्थक अपने नेता की राजनीतिक हैसियत और प्रभाव का प्रदर्शन भी करते हैं। ऐसे में शिवपाल यादव को केंद्र में रखकर लगाए गए पोस्टरों को समर्थकों की ओर से शक्ति प्रदर्शन के तौर पर भी देखा जा रहा है। हालांकि, केवल पोस्टरों के आधार पर पार्टी में किसी बड़े मतभेद या नए राजनीतिक टकराव का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
फिलहाल लखनऊ में इन पोस्टरों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह शिवपाल यादव के समर्थकों का अपने नेता के प्रति उत्साह भर है या इसके पीछे पार्टी के भीतर कोई बड़ा राजनीतिक संदेश छिपा है? अखिलेश यादव की तस्वीर को जगह नहीं मिलने और शिवपाल यादव को प्रमुखता दिए जाने से उठे सवालों के बीच अब सबकी निगाहें समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और दोनों नेताओं की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर इस पोस्टर राजनीति का क्या असर दिखाई देता है, यह देखना दिलचस्प होगा।