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लखनऊ में बैरिकेडिंग और डायवर्जन से बढ़ी परेशानी, रास्ता खुला मिले तो समझिए किस्मत अच्छी है

Lucknow Traffic Chaos:लखनऊ में बैरिकेडिंग और डायवर्जन से आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। वीआईपी मूवमेंट और निर्माण कार्यों के चलते कई प्रमुख मार्गों पर रोज जाम लग रहा है।
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Oct 08, 2026
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लखनऊ की व्यस्त सड़क पर जाम के बीच निकलने की कोशिश करते वाहन चालक।(फोटो सोर्स :file photo, Ritesh Singh)

Lucknow Road Jam: ‘मुस्कुराइए, आप लखनऊ में हैं’... राजधानी की पहचान से जुड़ी यह लाइन शहर के चौराहों और दीवारों पर भले ही दिखाई देती हो, लेकिन इन दिनों सड़कों पर निकलने वाले लोगों की परेशानी देखकर मुस्कुराने से पहले रास्ता तलाशना जरूरी हो गया है। शहर के कई प्रमुख इलाकों में बैरिकेडिंग, डायवर्जन, निर्माण कार्य और सुरक्षा व्यवस्था के चलते यातायात व्यवस्था प्रभावित हो रही है। हालत यह है कि कई बार लोगों को जिस रास्ते से निकलने की उम्मीद होती है, वहां पहुंचने पर अचानक बैरिकेडिंग मिल जाती है और फिर उन्हें वैकल्पिक रास्ते की तलाश में घूमना पड़ता है।

कहीं सुरक्षा के नाम पर रास्ता बंद, कहीं निर्माण ने छीनी सड़क

राजधानी लखनऊ में वीआईपी और सरकारी कार्यक्रम लगातार होते रहते हैं। सुरक्षा व्यवस्था के तहत कई प्रमुख मार्गों पर अस्थायी बैरिकेडिंग की जाती है और जरूरत के अनुसार यातायात रोका या डायवर्ट किया जाता है। हजरतगंज, कालिदास मार्ग, विधान भवन और आसपास के क्षेत्रों में वीआईपी मूवमेंट के दौरान इसका असर अक्सर दिखाई देता है। कुछ समय के लिए वाहनों की आवाजाही थमने के बाद सड़कों पर कतार बढ़ने लगती है।

वीआईपी मूवमेंट के दौरान बैरिकेडिंग के पीछे रुके वाहन और यातायात संभालते सुरक्षाकर्मी। (फोटो सोर्स :file photo, Ritesh Singh )

सुरक्षा व्यवस्था किसी भी वीआईपी कार्यक्रम का जरूरी हिस्सा है, लेकिन आम वाहन चालकों की परेशानी तब बढ़ जाती है जब उन्हें पहले से रास्ता बंद होने या डायवर्जन की पर्याप्त जानकारी नहीं मिलती। अचानक मार्ग बंद मिलने पर वाहन चालक उसी रास्ते से लौटने या आसपास की गलियों का सहारा लेने को मजबूर हो जाते हैं। इससे मुख्य मार्ग के साथ-साथ वैकल्पिक रास्तों पर भी यातायात का दबाव बढ़ जाता है।

वीआईपी मूवमेंट में थम जाते हैं पहिए

लखनऊ में वीआईपी मूवमेंट का असर केवल मुख्य सड़क तक सीमित नहीं रहता। एक प्रमुख मार्ग पर यातायात रोके जाने के बाद उसका दबाव आसपास की सड़कों पर पहुंच जाता है। देखते ही देखते छोटे-बड़े चौराहों पर वाहनों की कतार लग जाती है। ऑफिस जाने वाले कर्मचारियों, स्कूली बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों को सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। अस्पताल जाने वाले लोगों के लिए स्थिति और गंभीर हो सकती है। जाम में एंबुलेंस के फंसने की आशंका भी चिंता बढ़ाती है। ऐसे में लोगों की मांग है कि सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किए बिना ट्रैफिक प्रबंधन की ऐसी व्यवस्था हो, जिससे वीआईपी मूवमेंट के दौरान आम लोगों को कम से कम समय तक रोका जाए।

निर्माण कार्य ने भी बढ़ाई मुश्किल

लखनऊ में सड़क, फ्लाईओवर, अंडरपास और अन्य विकास कार्यों के चलते कई स्थानों पर बैरिकेडिंग की गई है। विकास कार्य शहर के लिए जरूरी हैं, लेकिन निर्माण के दौरान सड़क का बड़ा हिस्सा घिर जाने से वाहनों के लिए उपलब्ध जगह कम हो जाती है। व्यस्त मार्गों पर इसका असर और अधिक दिखाई देता है। कई जगह लोगों की शिकायत रहती है कि बैरिकेडिंग तो कर दी गई है, लेकिन लंबे समय तक काम की गति दिखाई नहीं देती। सड़क का हिस्सा घिरा रहने से वाहन चालकों को संकरी जगह से गुजरना पड़ता है। पीक ऑवर में यही संकरी सड़क जाम का कारण बन जाती है।

रास्ता बंद, तो बढ़ जाता है कई किलोमीटर का सफर

डायवर्जन का सबसे बड़ा असर लोगों के सफर पर पड़ता है। जिस दूरी को सामान्य दिनों में कुछ मिनट में तय किया जा सकता है, बैरिकेडिंग के बाद वही सफर कई गुना लंबा हो जाता है। वैकल्पिक रास्तों पर पहले से यातायात का दबाव होने के कारण वहां भी जाम की स्थिति बनने लगती है। कई वाहन चालक बताते हैं कि वे घर से निकलते समय सामान्य रास्ते पर चलते हैं, लेकिन कुछ दूरी तय करने के बाद अचानक बैरिकेडिंग दिखाई देती है। आगे जाने का रास्ता बंद होने के बाद उन्हें वापस लौटना पड़ता है। इसके बाद गली-मोहल्लों से निकलने की कोशिश में सफर और लंबा हो जाता है।

डायवर्जन के कारण वैकल्पिक मार्ग पर बढ़ा वाहनों का दबाव और लगी कतार। (फोटो सोर्स :file photo, Ritesh Singh )

ई-रिक्शा, ऑटो और पार्किंग भी परेशानी

डायवर्जन वाले रास्तों पर यातायात का दबाव बढ़ने के साथ ई-रिक्शा और ऑटो की अधिक संख्या भी कई स्थानों पर समस्या बढ़ाती है। सड़क किनारे बेतरतीब पार्किंग से पहले से कम उपलब्ध सड़क और संकरी हो जाती है। नतीजा यह होता है कि वाहनों को निकलने में अधिक समय लगता है और कुछ ही देर में लंबी कतार बन जाती है। पुराने लखनऊ और प्रमुख बाजार क्षेत्रों में यह समस्या ज्यादा महसूस की जाती है। संकरी सड़कों पर वाहन, ई-रिक्शा, ऑटो और पैदल यात्रियों की आवाजाही एक साथ होने से यातायात की रफ्तार प्रभावित होती है।

स्कूल और अस्पताल जाने वालों की बढ़ती परेशानी

बैरिकेडिंग और डायवर्जन का सीधा असर रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है। स्कूल जाने वाले बच्चों के अभिभावकों को कई बार सामान्य समय से काफी पहले घर से निकलना पड़ता है। जाम के कारण बच्चों के स्कूल पहुंचने में देरी होने की आशंका रहती है। अस्पताल जाने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए भी समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। अचानक मार्ग बंद मिलने पर उन्हें वैकल्पिक रास्ता तलाशना पड़ता है। बाजारों में आने वाले ग्राहकों और दुकानदारों पर भी इसका असर पड़ता है। हजरतगंज, अमीनाबाद और चौक जैसे व्यस्त इलाकों में यातायात व्यवस्था प्रभावित होने पर कारोबार और आम आवाजाही दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

समय के साथ ईंधन और तनाव की भी कीमत

जाम में फंसे रहने का असर केवल समय पर नहीं पड़ता। वाहन लंबे समय तक धीमी गति से चलने या खड़े रहने पर ईंधन की खपत बढ़ती है। रोजाना सफर करने वाले लोगों के लिए यह अतिरिक्त खर्च बन जाता है। इसके अलावा लगातार जाम में फंसने से लोगों में तनाव और चिड़चिड़ापन भी बढ़ता है। राजधानी जैसे तेजी से बढ़ते शहर में यातायात व्यवस्था का सुचारू रहना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि यहां रोजाना बड़ी संख्या में लोग नौकरी, कारोबार, पढ़ाई और अन्य जरूरी कामों के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते हैं।

लखनऊ की व्यस्त सड़क पर जाम के बीच निकलने की कोशिश करते वाहन चालक।(फोटो सोर्स :file photo, Ritesh Singh )

बैरिकेडिंग हो तो सूचना भी मिले

लोगों की सबसे बड़ी मांग यह है कि जहां भी बैरिकेडिंग या डायवर्जन किया जाए, वहां पर्याप्त दूरी से इसकी सूचना दी जाए। स्पष्ट दिशा-सूचक बोर्ड लगाए जाएं और वैकल्पिक मार्ग की जानकारी भी उपलब्ध कराई जाए। इससे वाहन चालक समय रहते अपना रास्ता बदल सकेंगे और अचानक सड़क बंद मिलने की स्थिति से बचा जा सकेगा। निर्माण कार्य वाली जगहों पर भी बैरिकेडिंग के साथ काम की स्थिति और संभावित समय सीमा की जानकारी देना उपयोगी हो सकता है। जहां संभव हो, बेहद व्यस्त मार्गों पर निर्माण कार्य को चरणबद्ध तरीके से कराया जाए, ताकि एक साथ सड़क का बड़ा हिस्सा प्रभावित न हो।

विकास भी जरूरी, लेकिन राह आसान हो

लखनऊ तेजी से विकसित हो रही राजधानी है। सड़क, फ्लाईओवर, अंडरपास और दूसरी परियोजनाएं शहर के भविष्य के लिए जरूरी हैं। सुरक्षा व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। लेकिन विकास और सुरक्षा के बीच आम आदमी की सुविधा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।शहरवासियों की अपेक्षा है कि बैरिकेडिंग और डायवर्जन जरूरी हों तो उनका बेहतर प्रबंधन किया जाए। रास्ता बंद करने से पहले सूचना, स्पष्ट डायवर्जन, पर्याप्त ट्रैफिक पुलिस और वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था हो। आखिर राजधानी की पहचान केवल बड़े प्रोजेक्ट और चमकती सड़कों से नहीं, बल्कि ऐसी सड़कों से भी होती है जिन पर आम आदमी बिना बार-बार रास्ता बदले अपने गंतव्य तक पहुंच सके।