Mayawati Statement: बसपा सुप्रीमो मायावती ने यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक को उचित ठहराया है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में जातिवादी घटनाएं रोकने के नियम लागू करने से पहले सभी पक्षों को विश्वास में नहीं लिया गया, जिससे सामाजिक तनाव का माहौल बना और विवाद गहरा गया।
Mayawati Backs Supreme Court Stay on UGC Rules: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा देश के सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों में लागू किए गए नए नियमों को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के नए नियमों पर लगाई गई रोक वर्तमान परिस्थितियों में उचित निर्णय है। मायावती ने अपने बयान में कहा कि इन नियमों के लागू होने से सामाजिक तनाव का वातावरण पैदा हुआ है, और यदि आयोग ने इन्हें लागू करने से पहले सभी पक्षों को विश्वास में लिया होता, तो ऐसी स्थिति नहीं बनती।
बसपा प्रमुख ने लिखा कि विश्वविद्यालयों में जातिवादी घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से लाए गए नए नियमों को लागू करने की प्रक्रिया में पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया। उनके अनुसार, आयोग को नियम लागू करने से पहले संबंधित वर्गों और समुदायों से संवाद करना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि जांच समितियों में “नेचुरल जस्टिस” (प्राकृतिक न्याय) के सिद्धांतों के तहत सभी वर्गों, विशेषकर अपरकास्ट समाज को भी उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए था। मायावती के अनुसार, यदि यह प्रक्रिया अपनाई जाती, तो सामाजिक तनाव जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
मायावती ने अपने बयान में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के नए नियमों पर लगाई गई रोक को “उचित” बताया। हालांकि उन्होंने अदालत के आदेश के कानूनी पहलुओं का विस्तार से उल्लेख नहीं किया, लेकिन उन्होंने संकेत दिया कि मौजूदा हालात को देखते हुए यह निर्णय संतुलन बनाने वाला है। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप अक्सर उन मामलों में होता है, जहां नीतिगत फैसलों को लेकर व्यापक बहस या असहमति सामने आती है। ऐसे मामलों में अदालत अस्थायी रोक लगाकर विस्तृत सुनवाई का रास्ता खोलती है।
UGC ने हाल ही में विश्वविद्यालय परिसरों में जातीय भेदभाव और उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से कुछ नए दिशा-निर्देश और नियम लागू किए थे। इनका उद्देश्य शैक्षणिक संस्थानों में सुरक्षित और समान माहौल सुनिश्चित करना बताया गया था। हालांकि, कुछ संगठनों और सामाजिक समूहों ने इन नियमों को लेकर प्रक्रिया और प्रतिनिधित्व के मुद्दों पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि नियमों के मसौदे पर व्यापक विचार-विमर्श और परामर्श की आवश्यकता थी। इसी पृष्ठभूमि में मामला न्यायालय तक पहुंचा, जहां इस पर रोक लगा दी गई।
मायावती ने अपने बयान में “नेचुरल जस्टिस” यानी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लेख किया। यह सिद्धांत कहता है कि किसी भी निर्णय या प्रक्रिया में सभी पक्षों को सुनवाई और निष्पक्ष प्रतिनिधित्व का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि जांच समितियों में विभिन्न वर्गों का संतुलित प्रतिनिधित्व होता, तो नियमों को लेकर आपत्तियां कम हो सकती थीं।
मायावती का यह बयान ऐसे समय आया है, जब शिक्षा संस्थानों में समान अवसर, भेदभाव-रोधी नीतियों और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा चल रही है। बसपा लंबे समय से सामाजिक न्याय, आरक्षण और वंचित वर्गों के अधिकारों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाती रही है। ऐसे में मायावती का यह बयान उनके पारंपरिक राजनीतिक रुख के अनुरूप माना जा रहा है।