
लखनऊ। पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने स्कूल-कॉलेजों में प्रतिस्पर्धा की शिक्षा के बजाय प्रकृति से जुड़े विषयों की शिक्षा पर जोर दिया है। उनका कहना था कि पढ़ाई के माध्यम से मिलने वाला ज्ञान अधिकतर बाहरी है, जबकि प्रकृति ने हमें जो दिया है उसमे स्त्री की विशिष्ट भूमिका से जुड़े विषय शिक्षा से दूर होते जा रहे हैं। इसका असर संवेदनशीलता पर पड़ रहा है।
कोठारी अपने लख़नऊ प्रवास के दौरान गुरुवार को अवध गर्ल्स पीजी कॉलेज में ‘स्त्री : देह से आगे’ विषय पर आयोजित विवेचन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि दिव्यता, वात्सल्य, माधुर्य, पोषण और निर्माण की क्षमता स्त्री के स्वरूप में निहित है। ईश्वर ने स्त्री को ऐसी शक्ति दी है, जो स्थूल के साथ सूक्ष्म में भी जीती है। सूक्ष्म में जीना स्त्री की विशेष क्षमता है और आत्मभाव उसकी मूल ताकत है। मातृत्व का निर्माण महिला के जीवन का पहला स्वप्न होता है। मां को ही सबसे पहले पता चलता है कि घर में नया मेहमान आने वाला है। गर्भस्थ शिशु के शरीर का निर्माण मां के आहार और उसके शरीर से होता है।
उन्होंने कहा कि स्त्री और पुरुष युगल रूप में अर्द्धनारीश्वर हैं। हर पुरुष के भीतर स्त्री भाव और हर स्त्री के भीतर पुरुष भाव मौजूद है। पुरुष को अपने भीतर के स्त्री भाव को कम नहीं होने देना चाहिए।
कोठारी ने कहा कि आज पढ़ाई पेट भरने का साधन बन गई है। वह व्यक्तित्व निर्माण और बच्चों में संस्कार डालने का काम नहीं कर रही। बेटियों को जिस तरह की शिक्षा मिलनी चाहिए थी, वह कहीं पीछे छूट गई है। हमने बेटियों में ईश्वरीय शक्तियों के विकास के बजाय केवल बौद्धिक शक्तियों के विकास पर ध्यान दिया। व्रत और त्योहार भी अब परंपराओं तक सीमित होते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि जहां खानदान की चिंता होती है, वहीं संस्कारों का पालन भी दिखाई देता है। आज स्वच्छंदता बढ़ी है। पुरुष के भीतर संकल्प का भाव कमजोर हुआ है, जबकि महिलाएं परिवार की परंपराओं से जुड़कर उन्हें आगे बढ़ाती हैं।
कोठारी ने कहा कि विवाह दो आत्माओं का मिलन है। केवल दो शरीरों का संबंध एक तरह का अनुबंध बनकर रह जाता है। जब तक दो आत्माओं का मिलन नहीं होगा, तब तक दोनों अपने कर्मों को बांट नहीं सकते। भारतीय परंपरा में मंत्रों के माध्यम से विवाह दो आत्माओं को जोड़ने का संस्कार है। मंत्रों के शब्दों के स्पंदन में मातृत्व और सकारात्मकता का भाव है। इसी भाव से सात जन्मों के रिश्ते की कल्पना की गई है।
उन्होंने कहा कि मंदिर जाना रूढ़िवादिता नहीं है। हमें प्रकृति को समझने की जरूरत है। हमारी भाषा और भाव का असर शरीर पर भी पड़ता है। नकारात्मक भाषा और भाव शरीर में रोग पैदा कर सकते हैं, जबकि सकारात्मकता और आस्था का भाव मन और शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक होता है। शरीर को प्राथमिकता देने के बजाय आत्मा को प्राथमिकता देनी चाहिए।
कोठारी ने कहा कि बेटियां दिव्यता का स्वरूप हैं। ईश्वर ने उनमें मातृत्व का भाव दिया है। पांच-छह साल की बच्ची को देखिए, वह अपने एक-दो साल के छोटे भाई को खिलाती है, खाना खिलाती है, नहलाती और सुलाती है। वह मां की तरह व्यवहार करती है। इतनी छोटी उम्र में उसमें यह मातृत्व भाव कहां से आया? इस पर चिंतन करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बच्ची की इस समझदारी का एक पक्ष मां के साथ उसका जुड़ाव है और दूसरा पक्ष उसका स्वयं भीतर से विकसित होना है। उसके बड़े होने के भी दो स्वरूप हैं-एक शरीर से बड़ा होना और दूसरा मन से बड़ा होना।
कार्यक्रम में कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. बिना राय ने स्वागत उद्बोधन दिया। प्रोफेसर डॉ. प्रीति अवस्थी ने आभार व्यक्त किया। इस दौरान बड़ी संख्या में कॉलेज की छात्राएं, प्रोफेसर और विभिन्न संगठनों से जुड़ी महिलाएं मौजूद रहीं।