लखनऊ

यूपी में गठबंधन की नई गांठ, साथ रहना तय; सीटों की हिस्सेदारी पर पेच

UP Politics News: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव साल 2027 से पहले सपा-कांग्रेस गठबंधन को लेकर सहमति है, लेकिन सीट बंटवारे पर पेच बना हुआ है। कांग्रेस 150 सीटों की मांग कर रही है, जबकि सपा जीत की क्षमता के आधार पर सीटें तय करना चाहती है।
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Oct 04, 2026
UP News
सपा प्रमुख अखिलेश यादव और राहुल गांधी (ANI Photo)

SP Congress Alliance:उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की जरूरत पर दोनों दलों का सार्वजनिक रुख साफ है लेकिन उसकी शर्तों पर सहमति अभी बाकी है। कांग्रेस कम से कम 150 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रही है, जबकि सपा ने 403 में से 350 विधानसभा क्षेत्रों में तैयारी आगे बढ़ाने का संकेत दिया है। ऐसे में बातचीत केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है। इसके साथ यह भी तय होना है कि कौनसी सीट किस दल के हिस्से में जाएगी, उम्मीदवार का चयन किस आधार पर होगा और अंतिम फैसला प्रदेश में होगा या केंद्रीय नेतृत्व करेगा।

कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम 150 से कम सीटों पर चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। वहीं सपा की 350 सीटों पर तैयारी को सीट बंटवारे के बीच उसकी संगठनात्मक तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि अभी सीटवार सहमति बनना बाकी है।
यही गठबंधन की मौजूदा स्थिति का सबसे अहम पहलू है। दोनों दल साथ चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं, लेकिन बातचीत की शुरुआत अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत के आधार से कर रहे हैं। इसलिए अभी विवाद गठबंधन रहेगा या नहीं, इस पर नहीं बल्कि गठबंधन किन शर्तों पर रहेगा, इस पर है।

सपा के पास विधानसभा का आधार, कांग्रेस के पास लोकसभा का तर्क

सीट बंटवारे की जटिलता का एक कारण दोनों दलों का अलग चुनावी आधार है। पिछले विधानसभा चुनाव में सपा ने 111 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस को दो सीटें मिली थीं। उस चुनाव में दोनों दल अलग-अलग लड़े थे। इसके दो साल बाद लोकसभा चुनाव में दोनों ने गठबंधन किया और उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में सपा ने 37 तथा कांग्रेस ने 6 सीटें जीतीं।

यहीं से आगामी विस चुनाव के लिए दोनों दलों का तर्क अलग हो जाता है। सपा विधानसभा चुनाव की सीट दर सीट संगठनात्मक ताकत को महत्वपूर्ण मान रही है। कांग्रेस के लिए लोकसभा का परिणाम इस बात का आधार है कि दोनों दलों के बीच वोट का समन्वय भाजपा के खिलाफ प्रभावी रहा। इसलिए कांग्रेस ज्यादा सीटों के जरिए आगामी विस चुनाव में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाना चाहती है, जबकि सपा का जोर इस बात पर है कि सीट केवल संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि वहां जीतने की वास्तविक क्षमता देखकर तय हो।

अखिलेश का विनिबिलिटी फॉर्मूला, कांग्रेस का बड़ा दावा

अखिलेश यादव सीट बंटवारे में विनिबिलिटी यानी जीतने की क्षमता को महत्व दे रहे हैं। इसका अर्थ सीटवार उम्मीदवार, स्थानीय संगठन और क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरण को आधार बनाना है। दिलचस्प यह है कि कांग्रेस की नई प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा भी विधानसभा चुनाव में विनिबिलिटी को महत्वपूर्ण मानती हैं। यानी इस बिंदु पर दोनों दलों के सार्वजनिक रुख में सीधा विरोध नहीं है। असली सवाल यह है कि जीतने की क्षमता का आकलन किस आधार पर होगा और किस दल के सर्वे तथा संगठन को निर्णायक माना जाएगा।

यही वह जगह है जहां 150 सीटों की कांग्रेस की मांग और सपा की 350 सीटों पर तैयारी आमने-सामने है। कांग्रेस के लिए अधिक सीटें संगठन और राजनीतिक विस्तार का अवसर हैं, जबकि सपा के लिए सीट छोड़ने का मतलब अपने स्थानीय दावेदार और संगठन को पीछे छोड़ना होगा।

नई कांग्रेस टीम ने गठबंधन को प्राथमिकता भी दी, अपना आधार भी

सीट बंटवारे की बातचीत के बीच कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में नेतृत्व बदला है। आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष, इमरान मसूद को कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष और चौधरी वीरेंद्र सिंह को कांग्रेस विधायक दल का नेता बनाया गया है। देविंदर निषाद और आलोक प्रसाद को भी प्रदेश संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। आराधना मिश्रा ने पद संभालने के बाद सपा के साथ गठबंधन को प्राथमिकता बताया है। उन्होंने लोकसभा चुनाव में दोनों दलों के प्रदर्शन को गठबंधन के पक्ष में महत्वपूर्ण अनुभव बताया और आगामी विस चुनाव में साथ काम करने की बात कही है।
साथ ही उनका कहना है कि सीटों की संख्या, सीट बंटवारे और गठबंधन की घोषणा का अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व करेगा।

इसका अर्थ यह है कि प्रदेश कांग्रेस सपा के साथ संगठनात्मक समन्वय और बातचीत करेगा लेकिन सीट बंटवारे पर अंतिम राजनीतिक अधिकार शीर्ष नेतृत्व का होगा। नई टीम का सामाजिक और क्षेत्रीय स्वरूप भी ध्यान देने योग्य है। आराधना मिश्रा के साथ इमरान मसूद, देविंदर निषाद और आलोक प्रसाद को जिम्मेदारी देकर कांग्रेस ने संगठन में अलग-अलग सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व दिया है। इससे कांग्रेस गठबंधन के भीतर अपनी स्वतंत्र संगठनात्मक पहचान मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

गठबंधन की सबसे कठिन परीक्षा सीट मिलने के बाद

सीट बंटवारे की असली चुनौती केवल दोनों दलों के शीर्ष नेताओं के बीच संख्या तय करने की नहीं है। विधानसभा चुनाव में हर सीट का अपना संगठन, स्थानीय दावेदार और सामाजिक समीकरण है। लोकसभा चुनाव में एक संसदीय क्षेत्र के लिए दोनों दलों ने एक उम्मीदवार के पक्ष में काम किया था। विधानसभा चुनाव में उसी संसदीय क्षेत्र के भीतर कई अलग-अलग विधानसभा सीटों पर दोनों दलों के स्थानीय नेताओं के हित सामने आएंगे। जिस सीट पर कांग्रेस को टिकट मिलेगा, वहां सपा के टिकट दावेदारों को पीछे हटना होगा।

सपा के खाते में सीट जाने पर कांग्रेस के स्थानीय दावेदारों की भूमिका तय करनी होगी। यही व्यवस्था बूथ स्तर तक लागू करनी होगी। इसलिए सीट बंटवारे का फैसला केवल शीर्ष नेतृत्व का राजनीतिक समझौता नहीं होगा। उसके बाद दोनों दलों को अपने-अपने स्थानीय संगठनों को साथ रखने की चुनौती होगी।

सपा के लिए गठबंधन का लाभ और नुकसान दोनों

सपा के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन का सबसे बड़ा लाभ लोकसभा चुनाव में दिखा। दोनों दलों ने साथ चुनाव लड़कर उत्तर प्रदेश की 43 सीटें जीतीं। इससे भाजपा विरोधी वोटों के समन्वय का आधार बना। आगामी विस चुनाव में भी सपा के लिए कांग्रेस के साथ जाने का लाभ विपक्षी वोटों को एक उम्मीदवार के पीछे रखने में है। इसके साथ सपा को अपनी सीटों और टिकट दावेदारों का समायोजन करना होगा। कांग्रेस को ज्यादा सीट देने पर उन क्षेत्रों में सपा के स्थानीय नेताओं की दावेदारी प्रभावित होगी जहां वे पहले से तैयारी कर रहे हैं। इसी कारण सपा सीट की संख्या के साथ उम्मीदवार के जीतने की क्षमता को जोड़ रही है। उसके लिए गठबंधन का लाभ तभी राजनीतिक रूप से उपयोगी होगा जब सीट छोड़ने से उसके स्थानीय संगठन की चुनावी स्थिति कमजोर न हो।

कांग्रेस के लिए गठबंधन का लाभ, कम सीटों की अपनी कीमत

कांग्रेस के लिए सपा के साथ गठबंधन का लाभ उत्तर प्रदेश में मजबूत क्षेत्रीय संगठन और बड़े वोट आधार के साथ चुनाव लड़ना है। लोकसभा के चुनाव ने दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच चुनावी समन्वय का अनुभव भी दिया। हालांकि कांग्रेस के सामने दूसरी तरफ संगठन विस्तार का सवाल है। यदि विधानसभा चुनाव में उसे बहुत सीमित सीटें मिलती हैं तो उसके स्थानीय नेताओं और संभावित उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में पर्याप्त जगह नहीं मिलेगी। यही कारण है कि पार्टी 150 सीटों का दावा कर रही है। कांग्रेस के लिए गठबंधन इसलिए केवल भाजपा विरोधी वोटों के समन्वय का माध्यम नहीं है। सीटों की संख्या उसके लिए उत्तर प्रदेश में संगठन और राजनीतिक उपस्थिति के विस्तार से भी जुड़ी है।

प्रदेश और दिल्ली के बीच भी है बातचीत का फर्क

गठबंधन की बातचीत में एक महत्वपूर्ण अंतर निर्णय के स्तर को लेकर है। सपा की बातचीत का आधार उत्तर प्रदेश की सीट, स्थानीय संगठन और उम्मीदवार की जीतने की क्षमता है। कांग्रेस ने प्रदेश नेतृत्व को संगठन और समन्वय की जिम्मेदारी देते हुए सीट बंटवारे का अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व के पास रखा है। इसका मतलब यह नहीं कि प्रदेश कांग्रेस और सपा के बीच बातचीत नहीं होगी। बल्कि सीटों की अंतिम संख्या और गठबंधन की औपचारिक शर्तों पर प्रदेश नेतृत्व अकेले फैसला नहीं करेगा। यही वजह है कि गठबंधन की बातचीत का एक हिस्सा लखनऊ में और अंतिम राजनीतिक सहमति का अधिकार दिल्ली में दिखाई देता है।

अब बातचीत संख्या नहीं, सीटवार

150 और 350 के आंकड़े का फैसला सीटवार गणित से होगा। कांग्रेस को अपनी दावेदारी वाली सीटों पर संगठन, उम्मीदवार और स्थानीय स्थिति का आधार रखना होगा। सपा को यह देखना होगा कि किन सीटों पर कांग्रेस को जगह देने से संयुक्त विपक्षी वोट का लाभ मिल सकता है और किन सीटों पर उसके अपने संगठन तथा दावेदारों को नुकसान होगा। इसके बाद एक और अहम सवाल होगा, जिस सीट पर एक दल चुनाव नहीं लड़ेगा, वहां उसका स्थानीय संगठन गठबंधन के उम्मीदवार के लिए कितनी मजबूती से काम करेगा। गत लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने इसका अनुभव किया है। अब वही समन्वय आगामी विस चुनाव की प्रत्येक सीट की राजनीति में उतारना होगा।

फिलहाल सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की राजनीतिक स्थिति यह है कि गठबंधन की जरूरत पर दोनों की सहमति है लेकिन हिस्सेदारी के पैमाने पर पेच है। कांग्रेस ज्यादा राजनीतिक जगह चाहती है और सपा अपनी मौजूदा संगठनात्मक ताकत के आधार पर सीटों का बंटवारा चाहती है। दोनों के बीच सहमति का अगला चरण इसी अंतर को सीटवार समझौते में बदलने का होगा।

जानिए किसने क्या कहा…

  • गठबंधन को जल्द अंतिम रूप देने की जरूरत, सीट बंटवारे में देरी से नुकसान होगा- इमरान मसूद, कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष, कांग्रेस
  • यूपी में भाजपा को अखिलेश ही हरा सकते हैं, कांग्रेस अकेले ऐसा नहीं कर सकती- इकरा हसन, सांसद सपा
  • कांग्रेस की 150 सीटों की मांग उसकी मौजूदा ताकत के मुकाबले ज्यादा; 50 सीटें भी बड़ी संख्या होगी- शिवपाल सिंह पटेल, सांसद सपा
  • “बात सीट की नहीं, जीत की है।” नेताओं को गठबंधन पर सार्वजनिक बयानबाजी से बचने की जरूरत है- अखिलेश यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, सपा
  • कांग्रेस 150 से कम सीटों पर चुनाव नहीं लड़ेगी- राजेंद्र पाल गौतम, प्रदेश प्रभारी, कांग्रेस
Updated on:
04 Oct 2026 01:49 pm
Published on:
04 Oct 2026 12:14 pm