बसपा सुप्रीमो मायावती के जन्मदिन पर दिए गए बयान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। संत स्वामी आनंद स्वरूप ने उनके बयान की सराहना करते हुए ब्राह्मण समाज से अपील की है कि यदि मायावती कुछ अहम मुद्दों पर खुलकर सामने आए, तो समाज को उनका समर्थन करना चाहिए।
Swami Anand Swaroop Backs Mayawati: बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के जन्मदिन पर दिए गए बयान ने प्रदेश की सियासत में एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है। खास तौर पर ब्राह्मण समाज को लेकर दिए गए उनके वक्तव्य पर धार्मिक और सामाजिक हलकों से प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। इसी कड़ी में प्रख्यात संत और सामाजिक विचारक स्वामी आनंद स्वरूप का बयान खासा चर्चा में है, जिसमें उन्होंने मायावती के रुख की सराहना करते हुए ब्राह्मण समाज से उन्हें समर्थन देने की अपील की है।
स्वामी आनंद स्वरूप ने कहा कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में मायावती उन चुनिंदा नेताओं में हैं, जो खुलकर ब्राह्मण समाज की बात कर रही हैं। उन्होंने इसे सकारात्मक पहल बताते हुए कहा कि आज के दौर में जब ज्यादातर राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति में उलझे हुए हैं, ऐसे में किसी नेता का किसी समाज के मुद्दों पर स्पष्ट रूप से बोलना सराहनीय है।
स्वामी आनंद स्वरूप ने अपने बयान में कहा कि मायावती जी का जन्मदिन पर ब्राह्मण समाज को लेकर दिया गया बयान अच्छा लगा। कम से कम कोई तो है, जो ब्राह्मणों की बात खुलकर कर रहा है। आज ब्राह्मण समाज खुद को राजनीतिक रूप से हाशिये पर महसूस कर रहा है और ऐसे में यह बयान उम्मीद जगाता है।”
उन्होंने कहा कि आजादी के बाद से ब्राह्मण समाज ने देश और प्रदेश की राजनीति, प्रशासन, शिक्षा और संस्कृति में अहम भूमिका निभाई है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह समाज खुद को असुरक्षित और उपेक्षित महसूस कर रहा है। ऐसे में मायावती का यह संकेत केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद की शुरुआत भी हो सकता है।
स्वामी आनंद स्वरूप ने अपने समर्थन को कुछ शर्तों से भी जोड़ा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि मायावती SC/ST एक्ट के दुरुपयोग के खिलाफ खुलकर खड़ी होती हैं, आर्थिक आधार पर आरक्षण का समर्थन करती हैं, और जातिगत आरक्षण पर पुनर्विचार की बात करती हैं, तो ब्राह्मण समाज को भी उनके साथ खड़ा होना चाहिए।
उनका कहना था कि किसी भी कानून का उद्देश्य समाज को न्याय देना होना चाहिए, लेकिन यदि किसी कानून का दुरुपयोग हो रहा है, तो उस पर पुनर्विचार आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आरक्षण की मूल भावना सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करना थी, लेकिन समय के साथ इसमें कई विसंगतियां सामने आई हैं।
स्वामी आनंद स्वरूप ने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि मायावती के शासनकाल में ब्राह्मणों पर सबसे कम अत्याचार हुए। उन्होंने कहा कि उस दौर में कानून-व्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत थी और किसी भी समाज के खिलाफ सुनियोजित हिंसा या भेदभाव देखने को नहीं मिला। उन्होंने यह भी जोड़ा कि मायावती ने अपने कार्यकाल में “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” के सिद्धांत पर काम करने की कोशिश की थी। यही कारण था कि उस समय दलित, पिछड़े और ब्राह्मण समाज के बीच संतुलन बना रहा।
अपने बयान के सबसे अहम हिस्से में स्वामी आनंद स्वरूप ने मायावती से सीधा आग्रह करते हुए कहा कि मायावती जी, आप खुलकर आइए। उस दिन ब्राह्मण समाज फिर से आपको सत्ता में लाने की ताकत रखता है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण समाज आज भी एक प्रभावशाली भूमिका निभाता है। यदि कोई नेता उनके सम्मान, सुरक्षा और भविष्य को लेकर गंभीर है, तो समाज उसके साथ खड़ा हो सकता है। उन्होंने इसे केवल सत्ता का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन का विषय बताया।
स्वामी आनंद स्वरूप के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान केवल एक संत का विचार नहीं, बल्कि उस असंतोष की अभिव्यक्ति है, जो ब्राह्मण समाज के एक हिस्से में पनप रहा है। कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि मायावती वास्तव में ब्राह्मण समाज को साधने की रणनीति पर आगे बढ़ती हैं, तो यह 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश की राजनीति में बड़े समीकरण बदल सकता है। वहीं, कुछ लोग इसे केवल बयानबाजी मान रहे हैं और कहते हैं कि ज़मीन पर इसका असर तभी दिखेगा, जब ठोस नीतिगत घोषणाएं होंगी।