
UP Politics: उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अभी से अपनी संगठनात्मक मशीनरी को पूरी तरह सक्रिय कर दिया है। सरकार और संगठन के शीर्ष स्तर पर बैठे जिम्मेदार नेताओं की नजर अब केवल चुनावी रणनीति पर ही नहीं, बल्कि संगठन के प्रत्येक पदाधिकारी की सक्रियता, अनुशासन और जिम्मेदारियों पर भी है। पार्टी नेतृत्व यह जानने में जुटा है कि पिछले दिनों चले संगठनात्मक अभियानों और प्रवास कार्यक्रमों में किन पदाधिकारियों ने पूरी जिम्मेदारी के साथ योगदान दिया और किन लोगों ने अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाई।
सूत्रों की मानें तो आने वाले दिनों में निष्क्रिय और संगठनात्मक जिम्मेदारियों से दूरी बनाने वाले पदाधिकारियों पर कार्रवाई हो सकती है। भाजपा नेतृत्व का साफ संदेश है कि 2027 की तैयारी में किसी भी स्तर पर ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। संगठन में जिम्मेदारी संभालने वाले नेताओं को अब यह तय करना होगा कि उनकी प्राथमिकता पार्टी का काम है या व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा।
हाल ही में दो दिवसीय प्रवास पर उत्तर प्रदेश आए भाजपा के प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े ने पदाधिकारियों को साफ शब्दों में संदेश दिया कि आने वाले महीनों में संगठनात्मक गतिविधियों से किसी को छुट्टी नहीं मिलने वाली है। चर्चा है कि उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि मार्च तक पार्टी के अभियान और कार्यक्रम लगातार चलते रहेंगे और पदाधिकारियों को अपनी जिम्मेदारियों के प्रति पूरी तरह उपलब्ध रहना होगा।
यहां तक कहा गया कि यदि किसी पदाधिकारी के घर में शादी-विवाह जैसे पारिवारिक कार्यक्रम भी हों, तब भी संगठनात्मक जिम्मेदारियों से पूरी तरह किनारा नहीं किया जा सकेगा। तावड़े का यह कड़ा रुख इस बात का संकेत माना जा रहा है कि भाजपा नेतृत्व अब 2027 के चुनाव को लेकर संगठन को ‘मिशन मोड’ में ले जाना चाहता है।
बैठकों के दौरान जब विनोद तावड़े ने पदाधिकारियों से चुनाव लड़ने की इच्छा के संबंध में जानकारी लेनी चाही तो माहौल अचानक बदल गया। बताया जाता है कि कई ऐसे पदाधिकारी, जिन्हें भविष्य में विधानसभा या विधान परिषद चुनाव का संभावित दावेदार माना जा रहा है, फिलहाल खुलकर सामने आने से बचते दिखाई दिए।
प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की नई टीम में भी कई ऐसे चेहरे शामिल हैं, जिनकी अपनी मजबूत राजनीतिक जमीन है। प्रदेश महामंत्री बनाए गए विधायक राजेश चौधरी मथुरा की मांट विधानसभा सीट से विधायक हैं। वहीं पूर्व मंत्री सुरेश राणा प्रदेश उपाध्यक्ष हैं और शामली जिले की थाना भवन विधानसभा सीट से दो बार विधायक रह चुके हैं। वर्तमान में यह सीट विपक्षी गठबंधन के कब्जे में है।
सपा से भाजपा में आईं विधायक पूजा पाल को भी प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। वह कौशांबी की चायल विधानसभा सीट से विधायक हैं। संगठन में ऐसे अन्य चेहरे भी बताए जा रहे हैं, जिनकी चुनावी दावेदारी मजबूत मानी जाती है, लेकिन तावड़े की सख्ती के कारण फिलहाल वे अपने पत्ते खोलने से बच रहे हैं।
भाजपा नेतृत्व अब उन पदाधिकारियों पर भी विशेष नजर रख रहा है, जो संगठनात्मक पद का उपयोग अपनी व्यक्तिगत चुनावी तैयारी के लिए कर रहे हैं। चर्चा है कि यदि किसी विधानसभा क्षेत्र में किसी पदाधिकारी की चुनावी दावेदारी वाली होर्डिंग या प्रचार सामग्री बिना नेतृत्व की जानकारी और अनुमति के दिखाई देती है तो संबंधित व्यक्ति को तत्काल तलब किया जा सकता है।
पहले इसकी सत्यता की जांच होगी और उसके बाद संगठनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। अवध, काशी और पश्चिम क्षेत्र के कुछ पदाधिकारियों के बारे में चर्चा है कि वे भविष्य की चुनावी दावेदारी मजबूत करने के लिए अभी से राजनीतिक माहौल बनाने में जुटे थे। इनमें कुछ नेता 2017 और 2022 में भाजपा द्वारा हारी गई सीटों पर अपनी दावेदारी पेश करने की तैयारी कर रहे हैं। भाजपा नेतृत्व का संदेश साफ है,संगठन पहले, व्यक्तिगत चुनावी महत्वाकांक्षा बाद में।
प्रदेश महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह को जमीन पर काम करने वाला संगठनकर्ता माना जाता है। बताया जा रहा है कि उनकी विशेष नजर उन विधानसभा सीटों पर है, जहां भाजपा 2022 के चुनाव में बेहद कम अंतर से हार गई थी। इन सीटों पर संगठनात्मक कमजोरी, स्थानीय समीकरण और संभावित उम्मीदवारों की स्थिति का लगातार आकलन किया जा रहा है।
पार्टी के आंतरिक सर्वे में कुछ मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन को लेकर भी सवाल उठे हैं। सूत्रों के अनुसार, ऐसे विधायकों की संख्या कम नहीं है जिनके टिकट बदलने की सिफारिश नेतृत्व तक पहुंच चुकी है। संगठन और सरकार के स्तर पर लगातार फीडबैक जुटाया जा रहा है और माना जा रहा है कि चुनाव के करीब आते-आते उम्मीदवार चयन में यह रिपोर्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल संतोष का आगामी उत्तर प्रदेश दौरा संगठन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि 10 और 11 सितंबर के आसपास वह प्रदेश भाजपा के संगठनात्मक ढांचे, चुनावी तैयारियों और कमजोर सीटों की स्थिति का विस्तृत आंकड़ा लेकर समीक्षा करेंगे।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बीएल संतोष विशेष रूप से यह जानना चाहते हैं कि प्रदेश में लगातार दस वर्ष तक सरकार चलाने के बावजूद भाजपा उन 57 सीटों पर अपनी स्थिति क्यों मजबूत नहीं कर पा रही है, जहां उसे लगातार चुनौती मिल रही है। पार्टी नेतृत्व इस सवाल का जवाब तलाश रहा है कि इन सीटों पर संगठन को मजबूत करके, सहयोगी दलों के समीकरण साधकर अथवा दूसरे दलों के प्रभावशाली और जिताऊ चेहरों को साथ लाकर जीत की संभावनाएं कैसे बढ़ाई जा सकती हैं।
2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 312 सीटें जीतकर ऐतिहासिक सफलता हासिल कीथी, जबकि 2022 में पार्टी की सीटों की संख्या घटकर 255 रह गई। यही कारण है कि 2027 के चुनाव को लेकर पार्टी अभी से हर सीट का अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक गणित तैयार कर रही है।
पार्टी की रणनीति केवल अपनी मजबूत सीटों को बचाने तक सीमित नहीं है। बताया जाता है कि भाजपा उन सीटों पर भी विशेष तैयारी कर रही है, जहां जीत का अंतर पांच हजार से कम रहा है। इसके साथ ही विपक्ष के कब्जे वाली करीब 130 ऐसी सीटों पर भी पार्टी विशेष रणनीति बना रही है, जहां राजनीतिक परिस्थितियां भाजपा के अनुकूल मानी जा रही हैं।
भाजपा की प्रदेश राजनीति में दिल्ली से सक्रिय रहने वाले नेताओं की संख्या भी बढ़ी है। इनमें से कई नेता खुद को राजनीतिक जोड़-तोड़ का माहिर मानते हैं और संगठन में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि प्रदेश संगठन में अब पुराने तरीके से काम करना आसान नहीं रह गया है।
क्षेत्र प्रचारक अनिल जी और प्रदेश महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह के प्रभावी संगठनात्मक ढांचे के कारण कई नेताओं को नए समीकरणों के साथ तालमेल बैठाने में कठिनाई महसूस हो रही है। राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के साथ संगठनात्मक अनुशासन का दबाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
बीएल संतोष के दौरे से पहले भाजपा के सामने मीडिया, युवा, महिला, किसान, अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी मोर्चों की प्रदेश टीमों का गठन भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। विभिन्न प्रकोष्ठों के संयोजकों की घोषणा को लेकर भी संगठन में मंथन जारी है।
क्षेत्रीय अध्यक्षों द्वारा भेजी गई सूचियों को लेकर भी अंदरखाने चर्चा है। आरोप है कि कुछ जिलों को अपेक्षा से अधिक प्रतिनिधित्व मिल गया, जबकि कई जिलों को पर्याप्त स्थान नहीं मिल सका। प्रदेश और क्षेत्रीय स्तर की टीमों में गोरखपुर, बाराबंकी, गाजीपुर और लखनऊ जैसे जिलों का प्रभाव अधिक दिखाई देने की चर्चा है।
खास बात यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के गृह जिलों में भी प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठने की बातें सामने आ रही हैं। संगठनात्मक संतुलन बिगड़ने की शिकायतें केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचने की चर्चा है।
भाजपा के राजनीतिक और संगठनात्मक गलियारों में इन दिनों एक ही बात सबसे ज्यादा सुनाई दे रही है,विनोद तावड़े की सख्ती के बाद अब बीएल संतोष के अनुशासन का दौर शुरू होने वाला है। पार्टी के पदाधिकारी जानते हैं कि संगठनात्मक जिम्मेदारी मिलने के बाद निष्क्रियता, अनुशासनहीनता और व्यक्तिगत राजनीति को नेतृत्व गंभीरता से ले सकता है।
चर्चा है कि बीएल संतोष के ‘सोंटे’ यानी संगठनात्मक अनुशासन की हनक पहले ही पदाधिकारियों के सिर चढ़कर बोल रही है। कोई भी नेता उनकी कार्रवाई की चपेट में नहीं आना चाहता। ऐसे में आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश भाजपा में सक्रियता बढ़ने के साथ-साथ संगठनात्मक अनुशासन और कड़ा होने की संभावना है।
2027 की चुनावी जंग अभी दूर जरूर है, लेकिन भाजपा ने अपनी तैयारी का बिगुल बजा दिया है। अब देखना यह होगा कि संगठन की इस सख्ती के बाद कौन नेता पार्टी की कसौटी पर खरा उतरता है और किसकी राजनीतिक उड़ान को नेतृत्व सुरक्षित लैंडिंग से पहले ही रोक देता है।