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तावड़े का यूपी मिशन शुरू, होर्डिंग नहीं बूथ पर जोर, 2027 में भाजपा की हैट्रिक की तैयारी

BJP in-charge Vinod Tawde: भाजपा के नए यूपी प्रभारी विनोद तावड़े ने लखनऊ दौरे में भव्य स्वागत से दूरी बनाकर बूथ संगठन मजबूत करने पर जोर दिया, जिससे 2027 की रणनीति को लेकर चर्चा तेज हुई।
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लखनऊ

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Ritesh Singh

Sep 06, 2026

तावड़े जी, 2027 में हैट्रिक लगानी है तो बूथ कार्यकर्ताओं को प्यार से टच करो (फोटो सोर्स : बीजेपी News Group)

तावड़े जी, 2027 में हैट्रिक लगानी है तो बूथ कार्यकर्ताओं को प्यार से टच करो (फोटो सोर्स : बीजेपी News Group)

UP Assembly elections 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने संगठन को मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। इसी क्रम में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तर प्रदेश के नवनियुक्त प्रभारी विनोद तावड़े का लखनऊ दौरा राजनीतिक रूप से खास चर्चा में रहा। 5 सितंबर को दो दिवसीय दौरे पर राजधानी पहुंचे तावड़े के स्वागत में लगाए गए बड़े-बड़े होर्डिंग हटाए जाने को पार्टी के भीतर एक अलग संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। चर्चा है कि तावड़े ने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट संकेत दिया कि स्वागत में खर्च करने के बजाय वही संसाधन बूथ को मजबूत करने में लगाए जाएं।

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राजनीतिक राज्य में जहां चुनावी मुकाबला अक्सर बूथ स्तर की मजबूती पर तय होता है, वहां नए प्रभारी की प्राथमिकता का केंद्र बूथ संगठन बनना अपने आप में महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है। सवाल यह है कि क्या केवल होर्डिंग हटाने से संगठन मजबूत होगा या फिर बूथ स्तर के उस कार्यकर्ता तक पहुंचना होगा, जो चुनाव के समय पार्टी का सबसे बड़ा आधार बनता है?

होर्डिंग से ज्यादा बूथ पर जोर

तावड़े के लखनऊ आगमन के दौरान स्वागत में लगी होर्डिंग्स हटाने की चर्चा ने भाजपा के भीतर संगठनात्मक संस्कृति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या अब पार्टी में दिखावे की राजनीति के बजाय जमीनी संगठन को प्राथमिकता मिलेगी। 

पार्टी कार्यकर्ताओं का एक वर्ग लंबे समय से यह मानता रहा है कि चुनावी राजनीति में मंच, पोस्टर और बड़े आयोजनों से अधिक महत्वपूर्ण बूथ स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ता होता है। बूथ अध्यक्ष से लेकर पन्ना प्रमुख तक की सक्रियता ही किसी राजनीतिक दल की वास्तविक चुनावी ताकत मानी जाती है। ऐसे में यदि स्वागत के खर्च को बूथ प्रबंधन की ओर मोड़ने का संदेश दिया गया है तो इसे संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण पहल माना जा सकता है।

बिहार का अनुभव, यूपी में बड़ी चुनौती

विनोद तावड़े इससे पहले बिहार भाजपा के प्रभारी रह चुके हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सफलता के बाद संगठनात्मक रणनीति और बूथ प्रबंधन को लेकर उनके काम की चर्चा हुई। यही अनुभव अब उत्तर प्रदेश में उनके सामने सबसे बड़ी पूंजी माना जा रहा है। लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीतिक जमीन बिहार से अलग है। यहां 403 विधानसभा सीटें हैं, क्षेत्रीय समीकरण बेहद जटिल हैं और जातीय, सामाजिक तथा स्थानीय मुद्दों का चुनावी प्रभाव भी व्यापक है। ऐसे में बिहार में सफल रही संगठनात्मक रणनीति को यूपी में हूबहू लागू करना संभव नहीं होगा। तावड़े को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार संगठन का नया खाका तैयार करना होगा।

बूथ पर फावड़ा चलेगा या सिर्फ नारा 

राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी उठ रहा है कि जिस बूथ मजबूती की बात की जा रही है, उसकी वास्तविक स्थिति क्या है? क्या बूथ कार्यकर्ता केवल चुनाव के दौरान पोस्टर लगाने, भीड़ जुटाने और रैलियों में पहुंचने तक सीमित है, या उसे संगठन में वास्तविक सम्मान और जिम्मेदारी भी मिलती है?

यही वह सवाल है जिसे अब भाजपा के नए प्रदेश प्रभारी के सामने सबसे गंभीर चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। चुनाव के दौरान बूथ कार्यकर्ता से बड़े लक्ष्य हासिल करने की उम्मीद की जाती है, लेकिन चुनाव के बीच के वर्षों में उसके साथ पार्टी का व्यवहार कैसा रहता है, यह भी संगठन की मजबूती तय करता है।

‘बूथ वाला कार्यकर्ता’ आखिर कितना मजबूत है

भाजपा की चुनावी सफलता का बड़ा आधार उसका मजबूत कैडर और बूथ नेटवर्क माना जाता है। लेकिन पार्टी के भीतर से समय-समय पर यह आवाज भी उठती रही है कि जमीनी कार्यकर्ता और शीर्ष नेतृत्व के बीच दूरी कम होनी चाहिए।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कुछ राजनीतिक सवालों में इसी असंतोष को सामने रखा गया है। गोरखपुर से जुड़े बताए जा रहे जय सिंह नामक व्यक्ति की सोशल मीडिया टिप्पणी में भी यह सवाल उठाया गया कि यदि लंबे समय तक बूथ कार्यकर्ताओं को पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं किया गया तो 2027 के चुनाव में उनसे मजबूत संगठन की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।

हालांकि सोशल मीडिया पर कही गई ऐसी बातों को आधिकारिक पार्टी मत नहीं माना जा सकता, लेकिन ये टिप्पणियां कार्यकर्ताओं के बीच मौजूद संभावित असंतोष की ओर संकेत जरूर करती हैं। भाजपा नेतृत्व के लिए चुनौती यही है कि सोशल मीडिया की शिकायतों को संगठन के भीतर संवाद के माध्यम में बदला जाए।

राज्यमंत्री दर्जे के पदों को लेकर भी सवाल

उत्तर प्रदेश में विभिन्न निगमों, आयोगों, बोर्डों और समितियों में राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर भी लंबे समय से चर्चा होती रही है। इन पदों के माध्यम से पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को सरकार तथा संगठन से जोड़ने की व्यवस्था बनाई जाती है। कुछ पदों के साथ राज्यमंत्री या अन्य स्तर का दर्जा और सुविधाएं भी जुड़ी होती हैं।

सोशल मीडिया पर सामने आई टिप्पणी में दावा किया गया है कि बड़ी संख्या में ऐसे पद लंबे समय से खाली हैं और इससे पार्टी के कार्यकर्ताओं में निराशा पैदा होती है। आरोप यह भी लगाया गया है कि राजनीतिक नियुक्तियों में संगठन के सक्रिय कार्यकर्ताओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है।

इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और सरकार की ओर से ऐसी सभी नियुक्तियों या रिक्तियों को लेकर कोई समग्र आधिकारिक आंकड़ा सामने आए बिना इसे अंतिम तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह सवाल महत्वपूर्ण है कि सत्ता में लंबे समय तक रहने वाली पार्टी अपने जमीनी कार्यकर्ताओं को किस तरह राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियों में भागीदार बनाती है।

कार्यकर्ता सम्मान बनाम अफसरशाही की बहस

भाजपा के भीतर कार्यकर्ता सम्मान का मुद्दा नया नहीं है। हर राजनीतिक दल में सत्ता और संगठन के बीच संतुलन सबसे बड़ी चुनौती होती है। सरकार चलाने में नौकरशाही की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन राजनीतिक संगठन की ताकत कार्यकर्ताओं से आती है।

यही वजह है कि यदि कोई कार्यकर्ता यह महसूस करता है कि अधिकारियों को अधिक महत्व मिल रहा है और पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता की भूमिका केवल चुनावी समय तक सीमित है, तो यह संगठन के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
तावड़े के सामने इसलिए केवल बूथ समितियां बनाने की चुनौती नहीं है। उन्हें कार्यकर्ता और सरकार के बीच संवाद की दूरी भी कम करनी होगी। कार्यकर्ता को यह भरोसा दिलाना होगा कि उसकी मेहनत केवल चुनाव जिताने के लिए नहीं, बल्कि संगठन की स्थायी ताकत के रूप में महत्वपूर्ण है।

पंकज चौधरी की टीम पर भी निगाहें

प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के नेतृत्व में प्रदेश और क्षेत्रीय स्तर पर संगठनात्मक टीम गठित हो चुकी है। अब इस टीम की वास्तविक परीक्षा 2027 के विधानसभा चुनाव में होगी। संगठन में नियुक्तियां हो चुकी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह टीम बूथ स्तर तक उसी प्रभावशीलता से पहुंच पाएगी, जिसकी अपेक्षा पार्टी नेतृत्व कर रहा है। उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने केवल विपक्षी दलों की चुनौती नहीं है। पार्टी को अपने संगठन को लगातार सक्रिय बनाए रखने, पुराने कार्यकर्ताओं को जोड़कर रखने और नए सामाजिक समूहों में विस्तार करने की चुनौती भी है।

तावड़े के सामने ‘हैट्रिक’ का लक्ष्य

2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा। पार्टी लगातार तीसरी बार उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने की कोशिश करेगी। ऐसे में तावड़े की भूमिका केवल प्रभारी की औपचारिक भूमिका तक सीमित नहीं रहेगी। उन्हें संगठन, सरकार और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय स्थापित करने वाले प्रमुख रणनीतिकार के रूप में काम करना होगा।

उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या भाजपा अपने मजबूत माने जाने वाले बूथ नेटवर्क को नए सिरे से सक्रिय कर पाएगी? क्या पुराने कार्यकर्ता फिर से उसी ऊर्जा के साथ मैदान में उतरेंगे। क्या नए सामाजिक समीकरणों को बूथ स्तर पर संगठन में बदला जा सकेगा? और क्या पार्टी में ऊपर से नीचे तक संवाद की व्यवस्था मजबूत होगी। 

‘नवरत्नों’ से ज्यादा जमीन के कार्यकर्ता जरूरी

उत्तर प्रदेश भाजपा में प्रभावशाली नेताओं का एक बड़ा समूह है। संगठन और सरकार के शीर्ष स्तर पर सक्रिय इन नेताओं की अपनी राजनीतिक भूमिका है। लेकिन चुनावी राजनीति का अंतिम फैसला अक्सर उस कार्यकर्ता की मेहनत से होता है, जो बूथ पर मतदाताओं के बीच रहता है।

इसलिए तावड़े के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे राजधानी की बैठकों और बड़े नेताओं के साथ संवाद से आगे निकलकर सीधे बूथ कार्यकर्ताओं तक पहुंचें। कार्यकर्ताओं की शिकायतें सुनें, उनकी समस्याओं को समझें और उन्हें संगठन में सम्मान का अहसास कराएं।

2027 की राह लखनऊ से नहीं, बूथ से निकलेगी

भाजपा के लिए 2027 की राह आसान नहीं होगी। सत्ता में रहने के कारण सरकार के कामकाज का मूल्यांकन होगा और संगठन की भी परीक्षा होगी। ऐसे में होर्डिंग, मंच और बड़े कार्यक्रम जितने महत्वपूर्ण दिखाई देते हैं, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण वह बूथ है जहां चुनाव के दिन मतदाता पहुंचता है।

विनोद तावड़े ने यदि वास्तव में होर्डिंग संस्कृति से ज्यादा बूथ संस्कृति को प्राथमिकता देने का संदेश दिया है तो यह बदलाव भाजपा के लिए सकारात्मक साबित हो सकता है। लेकिन इसके लिए केवल स्वागत के पोस्टर हटाना पर्याप्त नहीं होगा। असली बदलाव तब माना जाएगा जब बूथ कार्यकर्ता की सुनवाई बढ़ेगी, संगठन में उसकी भूमिका मजबूत होगी और सत्ता के गलियारों तक उसकी आवाज पहुंचेगी।

2027 की हैट्रिक का रास्ता बड़े नेताओं के मंच से होकर जरूर जाता है, लेकिन उसकी असली नींव बूथ पर पड़ती है। अब देखना यही है कि नए प्रभारी विनोद तावड़े इस नींव को कितना मजबूत कर पाते हैं और उत्तर प्रदेश भाजपा को चुनावी मशीन से आगे एक जीवंत, सक्रिय और कार्यकर्ता-केंद्रित संगठन में कितना बदल पाते हैं।