
UP Assembly Election 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी समाज को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। स्वामी प्रसाद मौर्य के समर्थकों की ओर से लखनऊ में समाजवादी पार्टी के बहिष्कार वाले पोस्टर लगाए जाने के बाद इस समाज के वोटबैंक पर चर्चा शुरू हो गई है। यादव और कुर्मी के बाद ओबीसी में तीसरा बड़ा वोटबैंक माने जाने वाले इस समाज की आबादी करीब 1.20 से 1.34 करोड़ बताई जाती है। पश्चिमी यूपी से पूर्वांचल तक फैली इसकी मौजूदगी 2027 में भाजपा और सपा, दोनों का चुनावी गणित प्रभावित कर सकती है।
उत्तर प्रदेश में मौर्य, कुशवाहा, शाक्य, सैनी, काछी और माली समुदाय को सामाजिक रूप से एक समूह के तौर पर देखा जाता है। यह समाज अन्य पिछड़ा वर्ग में यादव और कुर्मी के बाद तीसरा बड़ा वोटबैंक माना जाता है। साल 2001 की सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, इन समूहों की आबादी प्रदेश की कुल जनसंख्या का 6.69 फीसदी थी। 2011 की जनगणना के आधार पर यूपी की आबादी करीब 19.98 करोड़ थी। इस हिसाब से इनकी अनुमानित संख्या 1.20 से 1.34 करोड़ के बीच बैठती है।
| समाज की पहचान | प्रमुख जिले |
|---|---|
| मौर्य | गोरखपुर, वाराणसी, देवरिया, कुशीनगर, बरेली, बदायूं |
| कुशवाहा | बांदा, हमीरपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर, चित्रकूट |
| शाक्य | एटा, मैनपुरी, फर्रुखाबाद, इटावा, कन्नौज, आगरा |
| सैनी | मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मुरादाबाद |
मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी समाज का प्रभाव प्रदेश की 100 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर माना जाता है। करीब दो दर्जन सीटों पर इस समाज के नेता विधायक बनते रहे हैं। नकुड़, सहारनपुर नगर, खतौली, बिजनौर, कैराना, भोगांव, किशनी, अलीगंज, कायमगंज, मानीराम और बिधूना में इनकी भूमिका अहम है।
बुंदेलखंड की बांदा, नरैनी, बबेरू, उरई, ललितपुर और राठ सीटों के साथ सिराथू, पडरौना, करछना, फूलपुर, पट्टी, जौनपुर और ऊंचाहार में भी इनका प्रभाव है। कुछ सीटों पर समाज के 40 से 50 हजार तक मतदाता बताए जाते हैं। इसके अलावा सलेमपुर, देवरिया, बदायूं, आंवला, एटा, फर्रुखाबाद, मैनपुरी, मिर्जापुर, संभल, इटावा, चंदौली, झांसी और सहारनपुर लोकसभा सीटों पर भी इनका वोट चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है।
साल 2022 के विधानसभा चुनाव में इस समाज के 13 विधायक चुने जाने का दावा किया गया है। इनमें 11 भाजपा और दो सपा के टिकट पर जीते बताए गए हैं। 2017 और 2012 में इस समाज के 15-15 विधायक चुने गए थे।
साल 2019 में बदायूं से डॉ. संघमित्रा मौर्य और सलेमपुर से रवीन्द्र कुशवाहा भाजपा के सांसद बने थे। दोनों 2024 में चुनाव हार गए। मौजूदा समय में इस समाज से सपा के तीन सांसद हैं। इनमें जौनपुर से बाबू सिंह कुशवाहा, एटा से देवेश शाक्य और आंवला से नीरज मौर्य शामिल हैं। भाजपा से अमरपाल मौर्य राज्यसभा सदस्य हैं। 1996 में मौर्य समाज के चार सांसद चुने गए थे। 1971 के बाद से इस समाज के नेता लगातार लोकसभा पहुंचते रहे हैं।
योगी सरकार में केशव प्रसाद मौर्य उपमुख्यमंत्री और जसवंत सिंह सैनी राज्यमंत्री हैं। भाजपा के लिए केशव प्रसाद मौर्य गैर-यादव ओबीसी राजनीति का प्रमुख चेहरा हैं।
यह समाज किसी एक पार्टी का स्थायी वोटबैंक नहीं रहा है। आजादी के बाद कांग्रेस, फिर लोकदल और जनता दल के साथ रहा। बाद में अलग-अलग क्षेत्रों में सपा और बसपा से जुड़ा। लंबे समय तक बसपा के साथ रहने के बाद भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी को अपने साथ जोड़ने की रणनीति बनाई।
2016 में स्वामी प्रसाद मौर्य के बसपा छोड़कर भाजपा में आने को इसी रणनीति का अहम हिस्सा माना गया। 2017 में भाजपा को मौर्य समाज के 90 फीसदी वोट मिलने का दावा किया गया। 2022 में स्वामी प्रसाद के भाजपा छोड़ने के बाद इस वोट का कुछ हिस्सा सपा की ओर गया। 2024 में समाज के तीन नेता सपा के टिकट पर सांसद बने। हालांकि, इससे यह नहीं कहा जा सकता कि पूरा समाज भाजपा से सपा की ओर चला गया है। पश्चिमी यूपी में सैनी समाज के कुछ हिस्सों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर नाराजगी भी रही है।