लखनऊ

UP Election 2027: UP में भाजपा के वोट बैंक पर विपक्ष की नजर, 43 सीटों की जीत के बाद अब नया दांव, क्या बदलेंगे जातीय समीकरण

Uttar Pradesh Politics: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण और जातीय जनगणना का मुद्दा गरमा रहा है। सपा-कांग्रेस भाजपा के OBC और गैर-जाटव दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर सकती हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में 43 सीटों की जीत के बाद विपक्ष इसे नए सियासी दांव के रूप में देख रहा है।
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Aug 26, 2026
Samajwadi Party
सीएम योगी और अखिलेश यादव (AI Photo)

Uttar Pradesh Election 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण और जातीय जनगणना का मुद्दा फिर सियासत के केंद्र में आता दिख रहा है। बृजेश पाठक की आरक्षण हटाओ आंदोलन के हर्ष दुबे से मुलाकात के बाद शुरू हुई चर्चा को अखिलेश यादव ने सरकार पर आरक्षण खत्म करने के आरोप से जोड़ दिया। अब सपा-कांग्रेस की नजर भाजपा के मजबूत OBC और गैर-जाटव दलित वोट बैंक पर मानी जा रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में 43 सीटों पर जीत के बाद विपक्ष इस मुद्दे को फिर बड़े चुनावी दांव के तौर पर आजमा सकता है।

43 सीटों की जीत से बढ़ा विपक्ष का भरोसा

आरक्षण का मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया नहीं है। पिछले लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने संविधान बचाने के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था। यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से 43 सीटों पर सपा और कांग्रेस का कब्जा है। ऐसे में विपक्ष के लिए संविधान और आरक्षण से जुड़ा मुद्दा एक आजमाया हुआ चुनावी तरीका माना जा रहा है।

अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण और OBC की हिस्सेदारी की चर्चा फिर तेज होती है तो सपा और कांग्रेस इसे भाजपा के खिलाफ बड़े चुनावी मुद्दे में बदलने की कोशिश कर सकती हैं।

जातियों की गिनती सही तरीके से नहीं हो रही

इसी बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को साझा चिट्ठी लिखकर जनगणना में OBC जातियों की सही गिनती नहीं होने पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि पिछड़ी जातियों के लिए अलग से पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।

खरगे का कहना है कि जातियों की गिनती सही तरीके से नहीं हो रही है। एक ही जाति अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों और उपजातियों से जानी जाती है। एक ही जाति के लोग जनगणना में अलग-अलग नामों में दर्ज होंगे। इसलिए जो प्रक्रिया अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए अपनाई जाती है, वही प्रक्रिया ओबीसी के लिए अपनाई जाए।

1931 के आंकड़ों से समझिए यूपी का जातीय गणित

उत्तर प्रदेश में जातियों की आबादी के आंकड़ों की चर्चा के दौरान 1931 की जनगणना का हवाला दिया जाता है। इसके बाद देश में जाति के आधार पर पूरी जनगणना नहीं हुई। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की गिनती जरूर होती रही है।

1931 के आंकड़ों के आधार पर यूपी की आबादी में पिछड़ी जातियों की हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी बताई जाती है। अनुसूचित जाति करीब 21 फीसदी, मुस्लिम करीब 19 फीसदी और अगड़ी जातियां करीब 15 फीसदी मानी जाती हैं। पिछड़ी जातियों में यादवों की आबादी करीब 10 फीसदी बताई जाती है। अनुसूचित जातियों में जाटव करीब 12 फीसदी हैं। वहीं अगड़ी जातियों में ब्राह्मण और राजपूत करीब 10-10 फीसदी बताए जाते हैं।

भाजपा के वोट बैंक में सेंध की कोशिश?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में OBC वोट हमेशा से निर्णायक रहा है। पिछले चुनावों तक पिछड़ी जातियों के बड़े हिस्से ने भाजपा का साथ दिया। गैर-यादव OBC के अलावा गैर-जाटव दलितों के बीच भी भाजपा को समर्थन मिला। जाटव वोट परंपरागत तौर पर अलग राजनीतिक रुझान रखता रहा है। अब आरक्षण, जातीय जनगणना और जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी भागीदारी जैसे मुद्दे सामने आने से विपक्ष के लिए भाजपा के इसी मजबूत वोट बैंक को साधने का मौका बन सकता है।

सपा और कांग्रेस की कोशिश होगी कि OBC और दलितों के बीच हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व का सवाल बड़ा बने। अगर यह मुद्दा चुनावी बहस में जगह बनाता है तो इसका असर यूपी के जातीय समीकरण पर पड़ सकता है।



Updated on:
26 Aug 2026 09:15 am
Published on:
26 Aug 2026 09:15 am