लखनऊ

उत्तर प्रदेश: बीजेपी विधायकों को सता रहा ‘बिजली के झटके’ का डर!

उत्तर प्रदेश में बिजली कटौती की समस्या (Power Cut) से लोग परेशान हैं। अब बीजेपी नेता भी बिजली कटौती की शिकायत करने लगे हैं। बिजली कटौती की समस्या विपक्ष के लिए बड़ा मुद्दा बन गई है। हालांकि, सरकार बिजली की आपूर्ति (Electricity Supply) के लिए अलग दावे कर रही है।

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Jun 08, 2026
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यूपी में बिजली कटौती की समस्या पर राजनीति तेज (फोटो- पत्रिका)

Politics Over Power Cuts: बिजली की फितरत है झटका देना और इसी झटके की आशंका से यूपी बीजेपी के तमाम विधायक घबराए हुए हैं। दरअसल, भीषण गर्मी के बीच यूपी बिजली संकट का सामना कर रहा है। मनमाने तरीके से हो रही बिजली कटौती ने लोगों को परेशान कर रखा है। स्मार्ट मीटर को लेकर जनता पहले से ही परेशान है। ऐसे में बिजली संकट ने उनकी परेशानी दोगुनी कर दी है।

समाजवादी पार्टी बिजली संकट को मुद्दा बना रही है। पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव लगातार उस पर बयान दे रहे हैं। यूपी को अगले साल चुनाव से गुजरना है, इस वजह से कई भाजपा विधायकों को डर सताने लगा है कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे तो उन्हें अपनी विधानसभा सीट पर नुकसान उठाना पड़ सकता है।

सपा को मिला बड़ा मुद्दा

योगी आदित्यनाथ की भाजपा सरकार बेहतर बिजली व्यवस्था के लिए लगातार अपनी पीठ थपथपाती रही है। सीएम योगी खुद कई बार बोल चुके हैं कि सपा सरकार की तुलना में हालात सुधरे हैं। हालांकि, बीते कुछ समय से जिस तरह से भीषण गर्मी के बीच बिजली की आंख-मिचौली बढ़ी है, उसने योगी सरकार के खिलाफ विपक्ष को बड़ा मुद्दा दे दिया है।

बिजली का मुद्दा जाति, समुदाय और क्षेत्र की सीमाओं से परे है। समाज के कुछ खास वर्गों को प्रभावित करने वाली पोलिटिकल डिबेट के उलट, बिजली की कमी का असर गांवों, कस्बों और शहरों में एक जैसा महसूस किया जाता है। इसलिए सपा बिजली संकट को योगी सरकार की नाकामी के तौर पर प्रचारित कर रही है।

बीजेपी विधायक भी चिंतित

दिलचस्प बात यह है कि भाजपा के कई नेताओं को भी अहसास होने लगा है कि बिजली संकट परेशानी खड़ी कर सकता है। बीजेपी विधायक राजेश्वर सिंह ने बिजली से जुड़ी शिकायतों को जल्द दूर करने के साथ ही बेहतर व्यवस्था की मांग की है। विधायक डॉ. नीरज बोरा ने भी भीषण गर्मी के बीच बिजली कटौती पर चिंता जताई। जबकि, बीजेपी विधायक अशोक कुमार ने आरोप लगाया है कि अधिकारी चुने हुए प्रतिनिधियों की बात भी नहीं सुन रहे हैं। साथ ही उन्होंने चेताया है कि मनमानी बिजली कटौती और सख़्त चेकिंग अभियान से जनता में नाराज़गी बढ़ रही है। जब सत्ताधारी पार्टी के विधायक किसी मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से शिकायत करने लगें, तो स्थिति की गंभीरता को समझा जा सकता है।

सरकार को नहीं परवाह?

हालांकि, सरकार अपने ही विधायकों की इस घबराहट को समझने को तैयार नजर नहीं आती। सरकार का कहना है कि स्थिति को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। गर्मियों में बिजली की अभूतपूर्व मांग के बावजूद सप्लाई रिकॉर्ड स्तर पर रही है। ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा के अनुसार, उत्तर प्रदेश ने 31,824 मेगावाट की पीक सप्लाई हासिल करके इतिहास रचा है, जो राज्य और देश में अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है।

शर्मा ने 'X' पर लिखा, "हमारे बिजली कर्मचारी तकनीकी, प्राकृतिक या मानवीय कारणों से होने वाली स्थानीय स्तर की बिजली कटौती की समस्याओं को दूर करने के लिए दिन-रात पूरी लगन और मेहनत से जुटे हुए हैं। आंकड़ों की बाजीगरी योगी राज में विपक्ष के हाथ अब तक कोई बड़ा मुद्दा नहीं था। लेकिन बिजली संकट बड़ा मुद्दा बन सकता है।

भाजपा आंकड़े सामने रखकर बेहतर स्थिति का हवाला दे रही है। उसका कहना है कि सपा सरकार में महज 13,000 मेगावाट बिजली सप्लाई होती थी, जो वर्तमान में बढ़कर 31,824 मेगावाट तक पहुंच गई है। सपा काल में चुनिंदा वीआईपी जिलों में बिजली आपूर्ति होती थी, जबकि योगी राज में हर घर रोशन है। हालांकि, आंकड़ों के दावे जमीनी असलियत को प्रभावित नहीं कर सकते।

 प्रदेश में बिजली संकट है और लोग परेशान भी हैं। लखनऊ सहित कई जिलों में बिजली कटौती जारी है। बीते दिनों कई इलाकों में 8 से 9 घंटे तक बिजली न आने से लोग सड़कों पर उतर आए थे, विरोध-प्रदर्शन और चक्काजाम की स्थिति बन गई थी। बिजली की आंख-मिचौली से आम जनता के साथ-साथ छोटे कारोबारी भी परेशान हैं। उन्हें बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है।

हालात सुधरे हैं

2012 के मुकाबले यूपी में बिजली व्यवस्था बेहतर हुई है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन योगी सरकार ने जो स्टैन्डर्ड तय किया है, फिलहाल उस स्तर की सुविधा नहीं मिल पा रही है। यही नाराजगी का विषय है। भाजपा को समझना चाहिए कि यूपी की जनता अब सपा काल से तुलना नहीं चाहती, क्योंकि प्रदेश अब उससे काफी आगे निकल आया है।

इसलिए सरकार को बार-बार इतिहास में जाने से बचना चाहिए और व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने पर फोकस करना चाहिए। सरकार विपक्ष की नहीं, तो कम से कम अपने विधायकों की ही सुने। अगर विपक्ष इस मुद्दे को लेकर जनता में सरकार के खिलाफ गुस्सा पैदा करने में सफल राहत है, तो फिर समीकरण गड़बड़ा भी सकते हैं।