लखनऊ

कांशीराम की जयंती को लेकर यूपी में सियासी हलचल, दलित वोटबैंक साधने में जुटे सपा-बसपा और कांग्रेस

उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांशीराम जयंती को लेकर सियासी हलचल बढ़ गई है। बसपा, सपा और कांग्रेस सभी दलित वोटबैंक को साधने के लिए कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं।

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Mar 14, 2026
दलित वोट के लिए BSP-SP-Congress का बड़ा दांव!

UP Politics: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही सभी राजनीतिक दल बसपा संस्थापक कांशीराम को याद करने में लग गए हैं। यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि इसके पीछे दलित वोटबैंक को साधने की बड़ी रणनीति है। कांशीराम की जयंती 15 मार्च को है, और इससे पहले ही बसपा, सपा और कांग्रेस ने अपने-अपने कार्यक्रमों का ऐलान कर दिया है। यहां तक कि भाजपा भी इस मुद्दे पर नरम रुख अपनाए हुए है। दलित समुदाय की आबादी प्रदेश में करीब 21 प्रतिशत है, जो चुनावी नतीजों को बदल सकती है। 85 विधानसभा सीटें दलितों के लिए आरक्षित हैं, लेकिन अन्य सीटों पर भी उनका वोट निर्णायक साबित होता है। इसी वजह से दल अब कांशीराम के नाम पर दलितों को लुभाने का मास्टर प्लान चला रहे हैं।

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बसपा का पारंपरिक दावा और कार्यक्रम

बसपा तो कांशीराम की विरासत पर ही खड़ी है, इसलिए उसका उन्हें याद करना स्वाभाविक है। लेकिन 2027 चुनाव से पहले बसपा ने कांशीराम जयंती को बड़े स्तर पर मनाने का फैसला किया है। लखनऊ में मुख्य जनसभा होगी, जहां पार्टी कार्यकर्ता और समर्थक जुटेंगे। साथ ही देश के अलग-अलग राज्यों में भी कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती इस मौके पर दलितों की एकजुटता पर जोर देंगी। पार्टी का मानना है कि कांशीराम के सिद्धांतों को अपनाकर ही दलितों का उत्थान संभव है। यह प्लान दलित वोटबैंक को मजबूत करने का है, ताकि चुनाव में बसपा फिर से मजबूत हो सके। पिछले चुनावों में बसपा का प्रदर्शन कमजोर रहा था, इसलिए अब कांशीराम की जयंती को हथियार बनाया जा रहा है।

सपा की रणनीति: जिलों में जयंती मनाना

समाजवादी पार्टी (सपा) भी पीछे नहीं है। अखिलेश यादव की अगुवाई वाली सपा ने सभी जिलों में कांशीराम जयंती मनाने का ऐलान किया है। यह कदम दलितों को सपा की ओर खींचने का हिस्सा है। सपा पहले से ही पिछड़ों और मुसलमानों पर फोकस करती रही है, लेकिन अब दलित वोटबैंक को साधने के लिए कांशीराम को अपना बनाने की कोशिश कर रही है। पार्टी नेता कहते हैं कि कांशीराम के संघर्ष से प्रेरणा लेकर सपा दलितों के हक के लिए लड़ रही है। 2027 चुनाव में सपा को मजबूत गठबंधन बनाने की जरूरत है, और दलित वोट इसमें अहम भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए जिला स्तर पर कार्यक्रमों से सपा सीधे दलित समुदाय तक पहुंचने का प्लान चला रही है।

कांग्रेस का मास्टर स्ट्रोक: राहुल गांधी का समारोह

कांग्रेस ने तो कांशीराम जयंती को और भी जोर-शोर से मनाया। शुक्रवार को आयोजित जयंती समारोह और दलित संवाद में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी खुद पहुंचे। उन्होंने जेब से पेन निकालकर कांशीराम की हूबहू नकल की, जो काफी चर्चा में रही। कार्यक्रम में कांशीराम को भारत रत्न देने का प्रस्ताव पास किया गया। राहुल ने कहा कि अगर जवाहरलाल नेहरू होते, तो कांशीराम मुख्यमंत्री बनते। यह बयान सियासी रणनीति का हिस्सा है, जो दलितों को कांग्रेस की ओर आकर्षित करने के लिए दिया गया। कांग्रेस लंबे समय से दलित वोटबैंक से दूर रही है, लेकिन 2027 चुनाव से पहले यह प्लान उन्हें वापस जोड़ने का है।

चुनावी गणित और दलित वोट की अहमियत

सभी दलों का कांशीराम के प्रति यह अचानक प्रेम दलित वोटबैंक के कारण है, जो इन दिनों किसी चौराहे पर खड़ा है। कोई भी दल उसे अपनी ओर खींचना चाहता है। उत्तर प्रदेश में दलित आबादी का असर हर चुनाव में दिखता है। 21 प्रतिशत वोटर्स चुनावी नतीजे पलट सकते हैं। आरक्षित 85 सीटों के अलावा सामान्य सीटों पर भी दलित वोट निर्णायक होते हैं। 2027 चुनाव में भाजपा की चुनौती को देखते हुए विपक्षी दल बसपा, सपा और कांग्रेस मिलकर दलितों को साधने का मास्टर प्लान चला रहे हैं। कांशीराम का नाम लेकर वे दलितों की भावनाओं से जुड़ना चाहते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह रणनीति कामयाब होगी, या सिर्फ चुनावी जुमला साबित होगी?

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Updated on:
14 Mar 2026 09:43 am
Published on:
14 Mar 2026 09:37 am
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