
Dermatologists: आमतौर पर स्किन एक्सपर्ट (Dermatologists) सूरज की हानिकारक अल्ट्रावायलेट (UV) किरणों से बचने के लिए रोजाना सनस्क्रीन लगाने की सलाह देते हैं। सूरज की ये किरणें स्किन कैंसर की मुख्य वजह बनती हैं। इन खतरों के बावजूद, बहुत से लोग सनस्क्रीन का इस्तेमाल नहीं करते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि बाजार में मिलने वाले जिंक ऑक्साइड युक्त मिनरल सनस्क्रीन को लगाने के बाद स्किन पर एक सफेद या ग्रे रंग की परत (White Cast) जम जाती है, जो देखने में चॉक जैसी लगती है। इस समस्या को दूर करने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया - लॉस एंजिल्स (UCLA) के वैज्ञानिकों ने एक अनोखा तरीका खोजा है। उन्होंने सनस्क्रीन में कोई नया कैमिकल मिलाने के बजाय, पहले से इस्तेमाल हो रहे जिंक ऑक्साइड के कणों (Particles) के भौतिक आकार (Physical Shape) को ही बदल दिया।
आमतौर पर सनस्क्रीन में इस्तेमाल होने वाला जिंक ऑक्साइड गोल और बहुत छोटे नैनोकणों के रूप में होता है। ये छोटे कण त्वचा पर लगाने के बाद आपस में जुड़ कर गुच्छे बना लेते हैं, जिससे रोशनी उनसे टकराकर बिखरती है और स्किन पर सफेद परत दिखाई देने लगती है। गहरे रंग की स्किन (Dark Skin Tone) पर यह सफेदी बहुत ज्यादा साफ और खराब दिखती है।UCLA के रिसर्चर्स ने इस समस्या को हल करने के लिए जिंक ऑक्साइड को सूक्ष्म चार भुजाओं वाली संरचना (Microscopic Four-Armed Structure) में बदल दिया, जिसे 'टेट्रापॉड' कहा जाता है।
ब्यूटीफुल स्किन के लिए हुई नई ब्यूटी रिसर्च को ऐसे समझें। (विजुअल : ChatGPT)
रिसर्च के अनुसार अपनी चार भुजाओं वाली बनावट के कारण, टेट्रापॉड के आकार वाले ये कण आपस में चिपक कर गुच्छे नहीं बनाते। इसके बजाय, ये एक-दूसरे से निश्चित दूरी बनाए रखते हैं और एक जालीदार (Porous) नेटवर्क बनाते हैं। इससे सनस्क्रीन त्वचा पर समान रूप से फैल जाती है और रोशनी को उस तरह नहीं बिखेरती जिससे सफेदी दिखे।
इस रिसर्च की मुख्य लेखिका ए.जे. अड्डाए (AJ Addae) हैं, जो UCLA में कैमिकल बायोलॉजी की डॉक्टरेट स्टूडेंट और कॉस्मेटिक साइंस इंडस्ट्रियलिस्ट हैं। उन्होंने यह रिसर्च अपने खुद के बुरे अनुभव से प्रेरित होकर शुरू की। अड्डाए ने बताया कि वे खुद अपनी स्किन पर मिनरल सनस्क्रीन से होने वाली सफेदी और खराब लुक से परेशान थीं, जिसके कारण उन्होंने सनस्क्रीन लगाना ही बंद कर दिया था। इसी परेशानी ने उन्हें इस तकनीक पर काम करने के लिए प्रेरित किया।
यह नई खोज गहरे रंग की स्किन (Skin of Color) वाले लोगों के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकती है। आंकड़ों के अनुसार, गहरे रंग की स्किन वाले लोगों में स्किन कैंसर का सबसे खतरनाक रूप, मेलानोमा (Melanoma), वैसे तो कम देखा जाता है, लेकिन इसके कारण होने वाली मृत्यु दर बहुत अधिक होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सही सनस्क्रीन न मिलने के कारण वे इसका इस्तेमाल कम करते हैं, जिससे बीमारी का पता बहुत देर से चलता है और इलाज मुश्किल हो जाता है।
सनस्क्रीन की नई रिसर्च के बाद स्किन को ब्यूटीफुल बनाने का शानदार तरीका मिल गया। (विजुअल : ChatGPT)
जब रिसर्चर्स ने पारंपरिक जिंक ऑक्साइड और नए टेट्रापॉड फॉर्मूले की तुलना की, तो इसके कई शानदार परिणाम सामने आए:
समान सुरक्षा (SPF 30): उतनी ही मात्रा में इस्तेमाल किए जाने पर भी टेट्रापॉड फॉर्मूले ने त्वचा को SPF 30 की मजबूत सुरक्षा दी, जो धूप से बचाने के लिए पूरी तरह असरदार है।
बेहतर स्थिरता (Stability): यह नया लोशन लंबे समय तक खराब नहीं हुआ। इसमें तेल और मटीरियल के अलग होने या लोशन के अजीब तरीके से गाढ़ा होने जैसी समस्याएं नहीं देखी गईं।
कुदरती लुक (Natural Skin Tone): लैब टेस्ट और त्वचा पर किए गए प्रयोगों में पाया गया कि टेट्रापॉड सनस्क्रीन ने त्वचा को एक हल्का गर्म (Warm) और बिल्कुल नेचुरल लुक दिया, जो हर तरह के स्किन टोन के साथ घुल-मिल गया। इसके लिए वैज्ञानिकों को अलग से कोई रंग (Pigment) या कोटिंग भी नहीं मिलानी पड़ी। अपनी स्किन ग्लोइंग और खूबसूरत रखने के लिए आपको खुद अवेयर रहना होगा और अपनी आदत भी बदलनी होगी।
यह रिसर्च जर्नल 'ACS मैटेरियल्स लेटर्स' में प्रकाशित हुई है। इस शोध टीम में जेनिफर उयांगा, प्रोफेसर जस्टिन कारमैन और यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न डेनमार्क के प्रोफेसर योगेंद्र कुमार मिश्रा भी शामिल हैं। इस प्रोजेक्ट को नेशनल साइंस फाउंडेशन और अन्य संस्थाओं से फंडिंग मिली है।
इस स्टडी के सीनियर लेखक प्रोफेसर पॉल एस. वीस (Paul S. Weiss) इस रिसर्च के को-ऑथर प्रोफेसर पॉल एस. वीस ने हैरत के साथ कहा कि आम तौर पर किसी कॉस्मेटिक फॉर्मुलेशन को इस लेवल तक पहुंचाने में कई साल लग जाते हैं, लेकिन टेट्रापॉड की भौतिक बनावट इतनी प्रभावी थी कि इसने पहली बार में ही वाइट कास्ट की समस्या को जड़ से समाप्त कर दिया। उनका कहना है कि यह सिर्फ सुंदरता या कॉस्मेटिक्स का मामला नहीं है। अगर सनस्क्रीन के लुक को बेहतर बनाने से लोग इसका रोजाना इस्तेमाल करने लगेंगे, तो स्किन कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचने में बहुत मदद मिलेगी।
बहरहाल, बाजार में व्यावसायिक रूप से उपलब्ध होने से पहले इस सनस्क्रीन तकनीक के कुछ और टेस्ट किए जाएंगे। वर्तमान में रिसर्चर्स UCLA हेल्थ के 'स्किन ऑफ कलर क्लिनिक' के साथ मिलकर यह जांच रहे हैं कि ये नए टेट्रापॉड कण त्वचा के नेचुरल माइक्रोबायोम (Skin Microbiome) के साथ कैसे काम करते हैं, ताकि जल्द से जल्द इसे आम लोगों के इस्तेमाल के लिए सुरक्षित रूप से लॉन्च किया जा सके।