मेरठ

मेरठ कांड पर राजनीति: मायावती फिर शांत, अखिलेश एक्टिव, क्या चंद्रशेखर पड़ेंगे सब पर भारी

मेरठ के कपसड़ गांव में दलित महिला की हत्या और बेटी के अपहरण के बाद राजनीति तेज हो गई है। मायावती ने सोशल मीडिया तक सीमित प्रतिक्रिया दी, अखिलेश यादव सक्रिय दिखे, जबकि चंद्रशेखर आजाद खुद पीड़ित परिवार से मिलने पहुंच रहे हैं।

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Jan 10, 2026
क्या चंद्रशेखर पड़ेंगे सब पर भारी? Source- X (@BhimArmyChief)

UP Politics: मेरठ के कपसड़ गांव में में हुए दलित महिला हत्याकांड ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश में दलित महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक 50 वर्षीय दलित महिला सुनीता की कथित तौर पर हत्या कर दी गई और उसकी 20 वर्षीय बेटी को अगवा कर लिया गया। इस घटना के बाद तनाव का माहौल है और विभिन्न राजनीतिक दल परिवार से मिलने पहुंच रहे हैं। आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद भी पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे हैं। उन्होंने पहले ही परिवार से फोन पर बात की और आश्वासन दिया कि कपसड़ को 'हाथरस' नहीं बनने दिया जाएगा। यह दौरा उनके लिए न सिर्फ सामाजिक न्याय की लड़ाई का हिस्सा है, बल्कि दलित समुदाय में उनकी बढ़ती पैठ को भी दिखाता है, लेकिन चंद्रशेखर आजाद का सफर हमेशा से सही नहीं रहा। विवादों से नाता रखने वाले चंद्रशेखर का राजनीतिक और निजी जीवन आज भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

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शुरुआती संघर्ष और भीम आर्मी का उदय

5 दिसंबर 1987 एक साधारण दलित परिवार में जन्म लेने वाले चंद्रशेखर आजाद जिन्हें 'रावण' के नाम से भी जाना जाता है। कानून की पढ़ाई करते-करते चंद्रशेखर जल्द ही सामाजिक न्याय की लड़ाई में कूद पड़े। यूपी के सहारनपुर से आने वाले आजाद ने 2015 में भीम आर्मी की स्थापना की, जिसका मकसद दलित युवाओं को शिक्षा के माध्यम से सशक्त बनाना और जातीय अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाना था। उन्होंने खुद को दलितों का नेता बनाया। यूपी जैसे राज्य में खुद को और पार्टी को दलितों की पार्टी का नारा देने वाले चंद्रशेखर के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी यूपी की पूर्व सीएम मायावती, जो यूपी की सबसे बड़ी दलित नेता मानी जाती हैं। उनके सामने दलितों को साधना आजाद के लिए सबसे मुश्किल था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई घटनाओं- जैसे सहारनपुर में ठाकुर-दलित टकराव, घड़कोली गांव में अम्बेडकर से जुड़े बोर्ड पर विवाद और रविदास मंदिर पर हमले ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया और यूपी में उन्हें दलित नेता की पहचान दिलाई।

मुस्लिमों में बनाई अलग पहचान

2017 में सहारनपुर दंगों के बाद पुलिस ने उन पर कई गंभीर आरोप लगाए, जिसमें हत्या, दंगा भड़काने और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) तक शामिल था। वह करीब 15 महीने जेल में रहे, लेकिन बाहर आने के बाद उनका प्रभाव और बढ़ा। भीम आर्मी ने सीएए-एनआरसी विरोध, शाहीन बाग आंदोलन और किसान आंदोलन में भी हिस्सा लिया, जिससे उनकी पहुंच दलितों से आगे मुस्लिमों और अन्य पिछड़े वर्गों तक पहुंची। इस समय मायावती से बड़े दलित नेता के रूप में इन्हें देखा जा रहा है।

राजनीतिक एंट्री और आजाद समाज पार्टी

चंद्रशेखर ने 2020 में आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) बनाई। इसका उद्देश्य बहुजन समाज पार्टी (BSP) के कमजोर होते आधार को भरना था। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को ज्यादा सफलता नहीं मिली, लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में नगीना सीट से उनकी जीत ने सबको चौंका दिया। उन्होंने 50% से ज्यादा वोट हासिल किए, जिसमें दलित और मुस्लिम वोटों की बड़ी भूमिका थी। यह जीत मायावती के बाद दलित राजनीति में नए चेहरे के रूप में उन्हें स्थापित की।

पुराने और नए विवादों की छाया

चंद्रशेखर का नाम हमेशा विवादों से जुड़ा रहा है। 2017 के सहारनपुर मामले में उन पर 24 से ज्यादा FIR दर्ज हुईं, जिनमें से कुछ आज भी कोर्ट में चल रहे हैं। हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहारनपुर हिंसा से जुड़े कुछ मामलों में उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया। 2025 में सबसे बड़ा विवाद तब सामने आया जब इंदौर की PHD स्कॉलर डॉ. रोहिणी घावरी ने उन पर यौन शोषण का आरोप लगाया। उन्होंने सोशल मीडिया पर दावा किया कि चंद्रशेखर ने उन्हें राजनीतिक के लिए इस्तेमाल किया और बाद में रिश्ते तोड़ दिए। रोहिणी ने इसे 'पीड़िता नंबर 3' बताया, जिससे कई अन्य आरोपों की चर्चा हुई। चंद्रशेखर ने इसे राजनीतिक साजिश करार दिया और मानहानि का केस दायर किया। कोर्ट ने कुछ याचिकाओं को खारिज किया, लेकिन मामला अभी भी अदालत में है। इसके अलावा चंद्रशेखर पर हत्या की धमकी, अम्बेडकर अपमान पर भड़काऊ बयान और हिंदुत्व से जुड़े सवालों में फंसने जैसे विवाद भी लगातार सुर्खियां बटोरते रहे। कुछ लोग उन्हें आक्रामक बताते हैं, तो कुछ दलित युवाओं के लिए प्रेरणा।

2027 को लेकर रास्ता

मेरठ मामले में मयावती ने एक्स के जरिए विरोध किया और कार्रवाई की मांग की। अखिलेश यादव ने भी इसका विरोध किया और उनका नेता परिवार जनों से मिलने भी पहुंचे, लेकिन बसपा से अभी तक कोई भी परिवार के लोगों से नहीं मिला। मेरठ में होने वाला चंद्रशेखर का दौरा, उन्हें दलितों के लिए सड़क पर उतरकर न्याय की लड़ाई लड़ते हुए देखा जा रहा है, लेकिन विवादों की इस छाया में उनकी छवि दोहरी बनी हुई है। एक तरफ दलितों की आवाज, दूसरी तरफ कानूनी और व्यक्तिगत आरोपों का सामना। क्या वे इन विवादों से उबरकर दलित राजनीति में मायावती जैसी जगह बना पाएंगे? यह तो यूपी में होने वाले 2027 का विधानसभा चुनाव बताएगा। फिलहाल, कपसड़ गांव में न्याय की उम्मीद के साथ चंद्रशेखर आजाद का काफिला पहुंच रहा है, जो उनकी राजनीतिक यात्रा का एक और अध्याय लिखेगा।

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Published on:
10 Jan 2026 03:06 pm
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