मेरठ

इन कारणों से पुरुषों में हो रहा बांझपन, खराब हो रही शुक्राणुओं की गुणवत्ता

मधु जिंदल मेमोरियल टेस्ट ट्यूब बेबी सेंटर के एमडी डॉक्टर सुनील जिंदल कहते हैं कि बांझपन केवल महिलाओं में ही नहीं बल्कि पुरूषों में भी होता है।

3 min read
Sep 13, 2021

मेरठ. अगर आप मोबाइल, लैपटॉप और प्लास्टिक की चीजों का अधिक प्रयोग करते हैं तो सावधान हो जाएं। इनके अधिक प्रयोग से और गलत खानपान से पुरुषों में बांझपन और उनके शुक्राणुओं की गुणवत्ता खराब हो सकती है। ऐसा हम नहीं बल्कि मेरठ के चिकित्सक कह रहे हैं।

महिलाओं और पुरुषों दोनों में होता है बांझपन

मधु जिंदल मेमोरियल टेस्ट ट्यूब बेबी सेंटर के एमडी डॉक्टर सुनील जिंदल कहते हैं कि बांझपन केवल महिलाओं में ही नहीं बल्कि पुरूषों में भी होता है। इन दिनों ये युवाओं में तेजी से फैल रहा है। उन्होंने बताया कि एक मेडिकल शोध में ये बात सामने आई है कि इस समय हर 10 में से एक व्यक्ति कहीं न कहीं बांझपन का शिकार हो रहा है। उन्होंने बताया कि हालांकि ये संख्या अपने देश में कम है। लेकिन विदेश की जीवनशैली के चलते वहां पर बांझपन के शिकार युवाओं की संख्या तेजी से बढ रही है।

ज्यादातर बिना टेस्ट महिलाओं को मानते हैं जिम्मेदार

डॉक्टर जिंदल बताते है कि आमतौर पर टेस्ट से पहले ज्यादातर मामलों में बांझपन के लिए महिलाओं को जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन कई मामलों में पुरुष भी जिम्मेदार होते हैं। ज्यादातर पुरुषों में बांझपन कम शुक्राणुओं की संख्या या खराब गुणवत्ता के कारण होता है।

खराब गुणवत्ता का मुख्य कारण आधुनिक जीवनशैली

डॉक्टर जिंदल बताते हैं कि पुरूषों के शुक्राणु की खराब गुणवत्ता का मुख्य कारण आधुनिक जीवनशैली है। जिसमें प्रदूषण और गलत खाने की आदतें सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। सेल फोन, लैपटॉप, प्लास्टिक आदि शुक्राणु के दुश्मन हैं। इसके अलावा हवा में जितने ज्यादा टॉक्सिन बढ़ते हैं, पुरुषों की फर्टिलिटी उतनी ही ज्यादा प्रभावित होती है।

पर्यावरण में प्रदूषण से पुरुषों में प्रजनन क्षमता पर असर

डॉक्टर जिंदल बताते हैं कि पर्यावरण में बढ़ते प्रदूषण के कारण पुरुषों में प्रजनन क्षमता कम होने लगी है। पर्यावरण में बढते प्रदूषण के कारण वातावरण में टॉक्सिन या जहरीले रसायन की मात्रा अधिक होती है। जो कि पुरुषों में बांझपन का कारण बनती है। उन्होंने कहा कि विदेश में एक मेडिकल जर्नल में छपे शोघ से पता चलता है कि पिछले 60 सालों में पुरुषों में स्पर्म काउंट में 50 प्रतिशत की गिरावट आई है।

2017 में एक रिपोर्ट भी आई थी जिसमें कहा गया था कि 1973 से 2011 के बीच पुरुषों की स्पर्म कंसंट्रेशन में भी 50 से 60 प्रतिशत की कमी आई है। एक सामान्य आदमी में मिलीलीटर प्रति शुक्राणुओं की शुक्राणु 15 मिलियन से 200 मिलियन होनी चाहिए।

स्पर्म की क्वालिटी खराब करने के लिए वायु प्रदूषण भी जिम्मेदार

वायु प्रदूषण के कारण सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और अन्य हानिकारक विषाक्त पदार्थ शुक्राणु की गुणवत्ता को खराब करने के लिए जिम्मेदार हैं। इसके अलावा स्पर्म की क्वालिटी खराब करने के लिए लैपटॉप, सेल फोन, मॉडम भी जिम्मेदार हैं। उनसे निकलने वाले रेडिएशन से स्पर्म की स्पीड और शेप खराब हो जाती है। खाद्य पदार्थों में मौजूद हैवी मेटल कैल्शियम, लेड, आर्सेनिक, कॉस्मेटिक आदि शुक्राणु के स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होते हैं।

प्लास्टिक प्रभावित करता है एंडोक्राइन ग्रंथि

उन्होंने मेडिकल रिचर्स का हवाला देते हुए बताया कि पुरुषों में एंडोक्राइन ग्रंथि प्रभावित हो रही है, जिसकी वजह से प्रजनन क्षमता को संतुलित करने वाला हार्मोन खराब हो रहा है। इसका मुख्य कारण प्लास्टिक से छोड़े जाने वाले हानिकारक केमिकल प्लास्टिकाइजर हैं। यानी प्लास्टिक प्रजनन क्षमता को काफी प्रभावित कर रहा है। जिस तरह शाकनाशी कीटनाशक होते हैं, उसी तरह प्लास्टिक से छोड़े जाने वाले हानिकारक रसायनों को प्लास्टिकाइजर कहा जाता है।

हर महीने आ रहे 5-6 केस
डॉक्टर जिंदल बताते हैं कि इस तरह के हर महीने 5-6 केस आ रहे है। जिसमें मरीज खुद ही अपने में कमी की परेशानी बता रहा है। उन्होंने कहा कि अगर उचित खान पान रखा जाए तो इस तरह की समस्या से निजात पाई जा सकती है।ये कोई लाइलाज बीमारी नहीं है।

BY : KP Tripathi

Published on:
13 Sept 2021 12:22 pm
Also Read
View All