प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन कृषि कानून वापसी की घोषणा कर मास्टर स्ट्रोक चला है। राजनीति में कहा जाता है कि चाल तो सभी सही चलते हैं, लेकिन ये चाल अगर सही समय पर चली जाए तो इसके परिणाम भी अच्छे होते हैं। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वही काम किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज एक तीर से कई निशाने साधे हैं।

मेरठ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन कृषि कानून वापसी की घोषणा कर मास्टर स्ट्रोक चला है। राजनीति में कहा जाता है कि चाल तो सभी सही चलते हैं, लेकिन ये चाल अगर सही समय पर चली जाए तो इसके परिणाम भी अच्छे होते हैं। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वही काम किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज एक तीर से कई निशाने साधे हैं।
दिल्ली की सीमा पर पिछले एक साल से कृषि कानून के विरोध में पश्चिम यूपी, हरियाणा और पंजाब के किसान धरनारत थे। यूपी में आने वाले कुछ महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं और किसान आंदोलन के चलते गांवों में भाजपा के खिलाफ एक बड़ा माहौल बन रहा था। पश्चिमी यूपी में रालोद मजबूत हो रही थी और विपक्ष को भाजपा सरकार के खिलाफ एक बड़ा मुददा मिला हुआ था। लेकिन, केंद्र की बीजेपी सरकार ने कानून वापसी का ऐलान कर जाटलैंड में विपक्ष की राजनीति को बड़ा झटका दिया है।
तीन चुनावों में भाजपा को मिली थी बड़ी जीत
प्रदेश में पिछले तीन चुनाव की बात करें तो देश और प्रदेश में भाजपा की सरकान बनवाने में वेस्ट की बड़ी भूमिका रही है। दो आम चुनाव 2014 और 2019 में तो भाजपा ने इस पूरे क्षेत्र से विपक्ष का सूपड़ा ही साफ कर दिया था। वहीं, विधानसभा चुनाव 2017 में भी यही स्थिति रही। इन तीनों चुनाव में पश्चिम उत्तर प्रदेश में हुए ध्रुवीकरण का एक बड़ा लाभ वोटों के रूप में भाजपा की झोली में गया।
किसान आंदोलन से भाजपा के खिलाफ बनने लगा माहौल
केंद्र सरकार द्वारा तीन कृषि कानून लागू करने के बाद प्रदेश में किसान आंदोलनरत हुए तो भाजपा के पक्ष में बनने वाला माहौल पूरी तरह से खिलाफ हो गया। किसानों के आंदोलरत होने से पश्चिमी उप्र में राजनीतिक परिस्थितियां और स्थितियां काफी कुछ बदल रही थीं। बताया जाता है कि भाजपा ने एक प्राइवेट कंपनी से इस बारे में सर्वे भी कराया था। जिसमें भाजपा के खिलाफ माहौल बनता नजर आ रहा था। खासकर ग्रामीण इलाकों में। वहीं, दूसरी ओर विपक्ष ने विधानसभा चुनाव 2022 में तीन कृषि बिल के विरोध में किसान आंदोलन को पश्चिम यूपी में बड़ा मुद्दा बनाकर लोगों के सामने रखना शुरू कर दिया था। किसान आंदोलन का राजनीतिक लाभ लेने के लिए कांग्रेस, सपा और रालोद ने पिछले दिनों कई जनसभाएं की। जिसमें किसानों की भारी भीड़ जुटी। बस यहीं से भाजपा के नीति नियंताओं ने नरम रुख अपनाया और एक सधी रणनीति के तहत मौके का इंतजार करते हुए आज कृषि कानूनों को वापस ले लिया गया।
किसान महापंचायत से बढ़ने लगी थी भाजपा की मुश्किल
गत 5 सितंबर को मुजफ्फरनगर में किसान संयुक्त मोर्चा के नेतृत्व में मुजफ्फरनगर में महापंचायत के दौरान उमड़ी किसानों की भारी भीड़ ने भाजपा को परेशानी में डाल दिया था। उसके बाद से लगातार भाजपा की परेशानी झलक रही थी। कई जगह भाजपा जनप्रतिनिधियों पर हमले और नेताओं का विरोध होने के बाद भाजपा नेताओं ने भी बिल वापसी की मांग गुपचुप तरीके से उठानी शुरू कर दी थी। भाजपा को अपने नेताओं से ही चुनौती मिलती और चुनाव पूर्व के आंकलन में किसान आंदोलन के चलते पश्चिम यूपी में पार्टी को हो रहे नुकसान को देखते हुए ही बिल वापस लिया गया।
136 में से 109 सीटों पर खिला था कमल
विधानसभा के चुनाव के दौरान 2017 में पश्चिमी यूपी के 136 विधानसभा सीटों में से 109 सीटों पर कमल खिला था। जबकि 2012 के चुनाव में भाजपा को मात्र 38 सीटें मिली थीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में 2014 की तुलना में उसे 5 सीटों का घाटा उठाना पड़ा। इसके पीछे सपा-बीएसपी और आरएलडी का गठजोड़ मुख्य वजह थी। दरअसल, पश्चिम यूपी में किसान आंदोलन के असर की कई वजहें हैं। एक तो इस इलाके में गन्ना किसानों की संख्या अधिक है, जो तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन में शुरुआत से शामिल थे। दूसरे, आंदोलन का नेतृत्व करने वाली भारतीय किसान यूनियन और इसके नेता इसी इलाके में अधिक प्रभावी हैं।
By- KP Tripathi