'देशभर के 1 लाख जगहों पर 4जी तकनीक वाले टॉवर लगाने के लिए प्रति टॉवर औसतन 11.81 लाख रुपए खर्च होंगे जबकि 2G-4G तकनीक वाले टॉवर लगाने पर प्रति टॉवर 2.54 करोड़ रुपए का खर्च आएगा।'
नई दिल्ली। 2014 में यूपीए के हाथ से सत्ता फिसलने के लिए जिन घोटालों का जिक्र होता है उनमें 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन बड़ा नाम है। अब 2019 में लोकसभा चुनाव है और इस बार मोदी सरकार इसके लपेटे में आती दिख रही है। 2जी स्पेक्ट्रम को लेकर एक और घोटाला होने का शक गहरा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में टेलीकॉम वॉचडॉग नामक एक एनजीओ की याचिका पर मोदी सरकार और सरकारी दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल को कारण बताओ नोटिस दिया है। दूरसंचार विभाग और बीएसएनएल के बीच 16 जनवरी 2018 को हुए समझौते की शर्तों पर सवाल उठ रहे हैं।
...याचिका के मुताबिक ये है पूरा मामला
- मोदी सरकार ने असम के दो जिलों और अरुणाचल प्रदेश में 2जी नेटवर्क मुहैया कराने की प्रक्रिया में दो निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए काफी ज्यादा कीमत चुकाई गई है।
- सस्ती आधुनिक 4जी तकनीक उपलब्ध होने के बावजूद पुरानी हो चुकी 2जी टेक्नोलॉजी खरीदी गई।
- बीएसएनएल ने 2जी नेटवर्क के लिए जरूरी उपकरण खरीदने को लेकर दिल्ली की दो कंपनियों विहान नेटवर्क्स लिमिटेड और हिमाचल फ्यूचरिस्टिक कम्यूनिकेशंस लिमिटेड के साथ करार किया था। इन कंपनियों को 2258 करोड़ रुपए देने की शर्त थी।
- एनजीओ के मुताबिक, बीएसएनएल ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देशभर के 1 लाख जगहों पर 4जी तकनीक वाले टॉवर लगाने के लिए प्रति टॉवर औसतन 11.81 लाख रुपए खर्च होंगे जबकि 2G-4G तकनीक वाले टॉवर लगाने पर प्रति टॉवर 2.54 करोड़ रुपए का खर्च आएगा।
- एनजीओ के मुताबिक, 50 हजार गांवों को कवर करने के लिए 4G स्पेक्ट्रम वाले टॉवर लगाने पर 5,905 करोड़ रुपए का खर्च आएगा, जबकि 2G-कम-4G टॉवर लगाने पर 1.27 लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे।