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सबरीमाला फैसले पर बोलीं मेनका गांधी- महिला शक्ति का रूप लेकिन उसी का प्रवेश था मंदिर में वर्जित

'सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साबित होता है कि देश के मंदिरों को क्लब की तरह नहीं चलाया जा सकता'
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Sep 28, 2018
Sabarimala temple
सबरीमाला फैसले पर बोलीं मेनका गांधी- महिला शक्ति का रूप लेकिन उसी का प्रवेश था मंदिर में वर्जित

नई दिल्ली। सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं को प्रवेश देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने खुशी जताई है। धर्म तो सभी को जोड़कर रखता है लेकिन इसके ठेकेदारों ने पाबंदियां लगाकर इसपर कई अंकुश लगा दिए। उन्होंने कहा कि मंदिर में जाति, धर्म और महिलाओं के प्रवेश पर रोक एक तरह की धार्मिक ठेकेदारी ही थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साबित होता है कि देश के मंदिरों को क्लब की तरह नहीं चलाया जा सकता। इससे पहले, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि 10 से 50 साल तक की उम्र की महिलाओं को मंदिर जाने से रोकना उनके मौलिक और संवैधानिक अधिकारों का हनन है।

मंदिर को कोई क्लब नहीं : मेनका गांधी

मेनका गांधी ने कहा कि भगवान तो सबके लिए होते हैं। हिंदू धर्म में तो औरत का शक्ति का स्वरूप माना जाता है। ऐसे में किसकी हिम्मत होगी कि शक्ति को ही मंदिर में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दे। कुछ लोगों ने मंदिरों को क्लब बना दिया है। यह फैसला उन क्लबों को वापस मंदिरों में बदलने वाला है। उन्होंने कहा कि यह हास्यास्पद है कि ईश्वर किसी एक के लिए हैं और दूसरे के लिए नहीं। उन्हें सबके लिए होना चाहिए। यह मंदिर है कोई जिमखाना क्लब नहीं, जो निर्देश देता है कि कौन प्रवेश कर सकता है और कौन नहीं। गांधी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ऐतिहासिक इसलिए है क्योंकि ये हिंदूज्म को विस्तार देता है, उसे आधुनिक बनाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर पर दिया सबसे बड़ा फैसला

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी दे दी। कोर्ट ने कहा कि महिलाओं का मंदिर में प्रवेश न मिलना उनके मौलिक और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट ने अपने फैसले में 10 से 50 वर्ष के हर आयुवर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश को लेकर हरी झंडी दिखा दी है। पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ में एकमात्र महिला जस्टिस ने इंदु मल्होत्रा ने अलग फैसला दिया।

'शरीर के आधार पर महिलाओं के अधिकारों का हनन नहीं'

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने जस्टिस एम.एम. खानविलकर की ओर से फैसला पढ़ते हुए कहा कि शारीरिक संरचना के आधार पर महिलाओं के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। सभी भक्त बराबर हैं और जेंडर के आधार पर कोई भेदभाव नहीं हो सकता। जस्टिस रोहिंटन एफ. नरीमन ने अलग लेकिन समवर्ती फैसला सुनाते हुए कहा कि सभी धर्मो के लोग मंदिर जाते हैं। जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने भी अलग लेकिन समवर्ती फैसले में कहा कि धर्म महिलाओं को उनके पूजा करने के अधिकार से वंचित नहीं रख सकता। कोर्ट ने कहा कि सबरीमाल मंदिर किसी संप्रदाय का मंदिर नहीं है। अयप्पा मंदिर हिंदुओं का है, यह कोई अलग इकाई नहीं है।

Published on:
28 Sept 2018 05:21 pm
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