
नई दिल्ली। विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस प्रत्येक वर्ष 3 मई को मनाया जाता है। इस दिन को प्रेस स्वतंत्रता दिवस के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 1993 में यूनेस्को की एक सिफारिश पर घोषित किया गया था। प्रेस स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों को मनाने के लिए दिन का विशेष महत्व है। आज के दिन का मीडिया कर्मियों के लिए विशेष महत्व है। आइए आज हम दुनिया भर में प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति का आकलन करें और उन पत्रकारों को श्रद्धांजलि दें जो कर्तव्य पूरा करने के क्रम में अपनी जान गंवा चुके हैं। हम इस बात पर भी विचार करने की कोशिश करेंगे कि अपनी स्वतंत्रता पर हो रहे लगातर हमलों से मीडिया अपना बचाव कैसे करे।
मीडिया को बचाने की चुनौती
आज लोकतंत्र में स्वतंत्र, बहुलवादी और सुरक्षित पत्रकारिता का योगदान अभूतपूर्व है। लेकिन बीते एक दशक से अभूतपूर्व भूमिका निभाने वाला यह लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ बेहद तनाव और चुनौतियों के डर में है। मीडिया इन दिनों कई बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। मीडिया पर चुनाव नतीजों को प्रभावित करने गलत राजनीतिक बहस को प्रोत्साहित करने का आरोप लगाया गया है। बीते कई सालों से लग रहे इन आरोपों के चलते मीडिया की छवि बेहद धूमिल हो रही है लेकिन अब भी समाज के कई गुटों और स्थापित राजनीतिक दलों और को अपडेट्स के लिए समाचार आउटलेट्स पर ही भरोसा है। 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा निर्धारित सतत विकास लक्ष्यों की चर्चा करते हुए मीडिया के बारे में कहा गया था कि 'जब तक पत्रकारों की अभिव्यक्ति और जीवन सुरक्षा की रक्षा की जाएगी, मीडिया वर्ग संघर्ष को रोकने और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का समर्थन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।" इसी प्रस्ताव में राज्यों से आग्रह किया गया है कि "दुनिया के सभी देश सूचना की सार्वजनिक पहुंच सुनिश्चित करें और मीडिया की मौलिक स्वतंत्रता की रक्षा करें।”
बढ़ रहे हैं पत्रकारों पर हमले
यूएन के अनुसार पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उनकी आवाज बचाने का सबसे आसान तरीका है। इसी कदम के जरिये हम लोकतंत्र की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता को बढ़ावा दे सकते हैं। सूचना तक सार्वजनिक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए ऐसा लक्ष्य महत्वपूर्ण है। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स के अनुसार, 2018 में कम से कम 94 पत्रकार मारे गए थे। 2018 के आंकड़ों में पिछले वर्ष की तुलना में वृद्धि दर्ज की गई है। 2017 में पत्रकारों के साथ 82 घातक घटनाएं हुईं। 2018 में पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक देश थे अफगानिस्तान और मैक्सिको। उसके बाद यमन, सीरिया और भारत का नंबर आता है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़े बताते हैं कि 2018 में कम से कम 80 पत्रकार मारे गए थे।
कई तरह के हैं खतरे
आंकड़े बताते हैं कि 49 पत्रकार अपनी ड्यूटी निभाने के क्रम में मार डाले गए जबकि 31 लोगों की मौत रिपोर्टिंग के दौरान हुई। इस दौरान तीन पत्रकार लापता हुए 60 को बंधक बनाया गया और 348 को हिरासत में लिया गया था। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स अफगानिस्तान पत्रकारों के लिए को सबसे खतरनाक जगह के रूप में नामित करता है, इसके बाद सीरिया, मैक्सिको, यमन, अमरीका और भारत का नंबर आता है। यहां यह देखना जरूरी है कि यूएन और रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के आंकड़ों में अंतर के बावजूद दोनों रिपोर्ट्स इस बात पर सहमत हैं कि कि 2018 में पत्रकारों के लिए खतरे के स्तर में वृद्धि देखी गई। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा संघर्ष क्षेत्रों की विशेषता है। हाल के वर्षों ने दिखाया है कि मजबूत और स्थिर यूरोपीय देश भी पत्रकारों के खिलाफ हिंसा से अछूते नहीं हैं। अक्टूबर 2017 में माल्टा के राजनेताओं और पनामा पेपर्स द्वारा सरकारी भ्रष्टाचार और कदाचार का पर्दाफाश करने वाले एक माल्टीज पत्रकार डैफने कारुआना गैलिज़िया की हत्या एक कार बम हमले में की गई थी। यह वह जगह है जो पत्रकारों के लिए दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह मानी जाती है। पत्रकारों को कई देशों में अवैध हिरासत का सामना करना पड़ रहा है। आरएसएफ के अनुसार 2017 में दुनिया के आधे से अधिक कैद पत्रकारों सिर्फ पांच देशों में हिरासत का सामना करना पड़ा था। चीन में 60 पत्रकार कैद थे। मिस्र में 38, तुर्की में 33, सऊदी अरब में 28 पत्रकारों को हिरासत में लिया गया था।
उपरोक्त अवलोकन हमें इस बात का पता चलता है कि दुनिया भर में पत्रकारों को दैनिक आधार पर कई तरह के खतरों का सामना करना पड़ रहा है। जरुरत है समाचार देने वालों की स्थिति के बारे में दुनिया भर में जनता को सूचित करने की कोशिश की जाए। इस मुद्दे को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाने का समय आ गया है।
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