
SC/ST Act: बॉम्बे हाई कोर्ट की कोल्हापुर पीठ ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 (Atrocities Act) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति इस्लाम धर्म अपना चुका है और उसी धर्म का पालन कर रहा है, तो उसके मामले में एट्रोसिटी एक्ट के प्रावधान लागू नहीं होंगे।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति वृषाली वी. जोशी की एकल पीठ ने की। शिकायतकर्ता महिला मूल रूप से हिंदू महार समुदाय से थी, जिसने वर्ष 2011 में एक मुस्लिम युवक से विवाह किया था। महिला ने अपने बयान में स्वीकार किया कि विवाह के समय उसने इस्लाम धर्म अपना लिया था, अपना नाम भी बदल लिया था और तब से वह मुस्लिम धर्म का पालन कर रही है।
बाद में पारिवारिक संपत्ति को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। वर्ष 2015 में महिला ने अपने पति की बहन और बहनोई के खिलाफ मामला दर्ज कराया। आरोप था कि घर में साफ-सफाई और पानी के इस्तेमाल को लेकर हुए विवाद के दौरान दोनों ने उसके साथ मारपीट की और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया।
आरोपी पक्ष की ओर से अदालत में दलील दी गई कि दोनों पक्ष एक ही परिवार के सदस्य हैं और उनके बीच विवाद पूरी तरह संपत्ति से जुड़ा सिविल विवाद है। उन्होंने कहा कि संपत्ति मामले में अदालत से यथास्थिति का आदेश मिलने के बाद शिकायतकर्ता ने झूठी एफआईआर दर्ज कराई, जबकि इसमें एससी/एसटी एक्ट के तहत कोई अपराध नहीं बनता।
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त लोक अभियोजक एसवी गवंड ने भी सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए माना कि यदि शिकायतकर्ता ने इस्लाम धर्म अपना लिया है और उसी का पालन कर रही है, तो एट्रोसिटी एक्ट के प्रावधान उसके मामले में लागू नहीं हो सकते, भले ही धर्म परिवर्तन से पहले महिला अनुसूचित जाति से रही हो।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इससे भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दर्ज अन्य आरोप भी खुद समाप्त नहीं हो जाते।
हाई कोर्ट ने आरोपी दंपति को एससी/एसटी एक्ट के तहत लगाए गए आरोपों से मुक्त कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि एफआईआर में भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत लगाए गए अन्य आरोपों के संबंध में प्रथम दृष्टया मुकदमा चलाने लायक सामग्री मौजूद है। इसलिए उन मामलों की सुनवाई जारी रहेगी।