
Maharashtra Marathi Language Row: महाराष्ट्र में ऑटो, टैक्सी और कैब चालकों के लिए मराठी सीखने का मुद्दा अब भाषा से आगे बढ़कर राजनीति का सवाल बन गया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने चालकों को मराठी सीखने के लिए एक साल का अतिरिक्त समय दिया है। इस दौरान भाषा को लेकर उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं होगी। सरकार का कहना है कि चालकों को सिर्फ रोजमर्रा की बातचीत लायक मराठी सीखनी है।
फडणवीस का यह फैसला इसलिए चर्चा में है, क्योंकि इसके ठीक एक दिन पहले उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने बोरीवली में करीब 20 हजार चालकों को मराठी कोर्स पूरा करने के प्रमाण पत्र बांटे थे। शिंदे की शिवसेना लंबे समय से गैर-मराठी भाषी चालकों को मराठी सिखाने का अभियान चला रही है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार हिंदी भाषी चालकों को मराठी का विशेषज्ञ बनाने की कोशिश नहीं कर रही। उन्हें बस इतनी भाषा सीखनी है, जिससे वे यात्रियों से आसानी से बात कर सकें और जरूरत पड़ने पर उनकी मदद कर सकें।
फडणवीस ने कहा कि मराठी सीखने की समयसीमा पहले भी तीन बार बढ़ाई जा चुकी है। अब सरकार एक साल का और समय दे रही है। चालकों के लिए कक्षाएं और आसान पढ़ाई की सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी। उन्होंने साफ कहा कि महायुति सरकार भाषा के आधार पर किसी के साथ अन्याय नहीं होने देगी।
शिंदे ने अपने कार्यक्रम में कहा था कि मराठी किसी को बांटने वाली भाषा नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने वाली भाषा है। उनका कहना था कि महाराष्ट्र में काम करने वाले ऑटो-टैक्सी चालकों को यात्रियों से बातचीत के लिए मराठी आनी चाहिए।
शिवसेना प्रवक्ता शाइना एनसी ने भी कहा कि मराठी भाषा और मराठी अस्मिता से समझौता नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, सेवा देने वाले चालकों को यात्रियों से मराठी में बात करने में सक्षम होना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि शिवसेना ने करीब डेढ़ लाख टैक्सी चालकों को मुफ्त मराठी सिखाई और उन्हें प्रमाण पत्र भी दिए।
परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक मराठी सीखने की शर्त लागू करने के पक्ष में रहे हैं। हालांकि मुख्यमंत्री के फैसले के बाद उन्होंने इसका विरोध नहीं किया।
सरनाईक ने कहा कि 1989 के नियम को लागू करने में 36 साल लग गए, तो एक साल और इंतजार किया जा सकता है। लेकिन इसके बाद समय बढ़ाने की मांग नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार किसी चालक का लाइसेंस या बैज छीनकर उसकी रोजी-रोटी बंद नहीं करना चाहती।
MNS नेता अमित ठाकरे ने फडणवीस के फैसले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए सरकार ने चालकों को एक साल की मोहलत दी है।
उन्होंने कहा कि देश के दूसरे राज्यों में लोग अपनी स्थानीय भाषा से जुड़े रहते हैं, तो महाराष्ट्र में मराठी के मामले में पीछे हटने की जरूरत क्यों पड़ी। हालांकि उनके बयान के उस हिस्से को लेकर विवाद हुआ, जिसमें उन्होंने हिंदी बोलने वाले ऑटो चालकों के खिलाफ बल प्रयोग की बात कही।
शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने फडणवीस के फैसले को सही बताया। उन्होंने कहा कि जिन चालकों ने अभी तक मराठी नहीं सीखी है, उन्हें एक साल का अतिरिक्त समय मिलना अच्छा फैसला है।
यानी महायुति में इस मुद्दे पर एक जैसी राय नहीं दिख रही। शिंदे सेना मराठी भाषा और अस्मिता पर जोर दे रही है, जबकि फडणवीस ने फिलहाल सख्ती के बजाय समय देने का रास्ता चुना है।
BJP के लिए यह मुद्दा दोहरी चुनौती वाला है। महाराष्ट्र में मराठी भावना को नजरअंदाज करना मुश्किल है, लेकिन विवाद अगर हिंदी बनाम मराठी की लड़ाई में बदलता है तो इसका असर राज्य से बाहर भी जा सकता है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव भी इस मुद्दे पर सवाल उठा चुके हैं।
ऐसे में फडणवीस का फैसला तत्काल विवाद को शांत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। मराठी सीखने की शर्त खत्म नहीं हुई है, सिर्फ कार्रवाई से पहले समय दिया गया है।
राजनीतिक तौर पर असली सवाल यही है कि मराठी अस्मिता की राजनीति का नेतृत्व कौन करेगा और इस मुद्दे का राजनीतिक फायदा किसे मिलेगा? फडणवीस ने फिलहाल टकराव को टाल दिया है, लेकिन यह मामला महायुति के भीतर BJP और शिंदे सेना के रिश्तों की परीक्षा आगे भी ले सकता है।