
महाराष्ट्र के अंबरनाथ नगर परिषद (Ambernath Municipal Council) की सत्ता के लिए महायुति में पिछले पांच महीनों से चल रहे संघर्ष में अब एक बड़ा राजनीतिक मोड़ आ गया है। उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने भाजपा (BJP) को गठबंधन का प्रस्ताव देकर स्थानीय राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। खास बात यह है कि यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब हाल ही में जिला कलेक्टर ने चल रहे सत्ता संघर्ष में शिवसेना-एनसीपी गुट के पक्ष में फैसला सुनाया, जिससे भाजपा को बड़ा झटका लगा था।
शिवसेना नेताओं ने कहा कि अंबरनाथ शहर के विकास को प्राथमिकता देते हुए वे राजनीतिक मतभेद भुलाने को तैयार हैं। सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूर्व नगर परिषद अध्यक्ष सुनील चौधरी, पूर्व उपाध्यक्ष अब्दुल शेख और अन्य शिवसेना नगरसेवकों (पार्षद) ने औपचारिक रूप से भाजपा को गठबंधन का प्रस्ताव दिया।
इस दौरान शिवसेना नेताओं ने कहा कि अंबरनाथ शहर के विकास काम लंबे समय से राजनीतिक खींचतान की वजह से प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में स्थिर प्रशासन और नागरिक सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए सभी दलों को साथ आना चाहिए।
वहीं, भाजपा नेता गुलाब करंजुले पाटिल ने भी इस प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पार्टी इस पर गंभीरता से विचार करेगी। उन्होंने बताया कि जल्द ही इस मुद्दे पर बैठक की जाएगी और चर्चा के बाद उचित निर्णय लिया जाएगा।
गौरतलब है कि पिछले पांच महीनों से अंबरनाथ नगर परिषद में शिवसेना और भाजपा के बीच नगर परिषद की सत्ता को लेकर लगातार संघर्ष चल रहा था। नगर परिषद चुनाव के बाद बहुमत जुटाने की कोशिशों के बीच एनसीपी के विभिन्न गुटों और कांग्रेस की भूमिका भी अहम रही। राजनीतिक उठापटक के कारण नगर परिषद का प्रशासनिक कामकाज बुरी तरह प्रभावित होने के आरोप भी लग रहे हैं।
अब शिवसेना के साथ आने के प्रस्ताव के बाद अंबरनाथ की राजनीति में आगे क्या समीकरण बनते हैं, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। गठबंधन होता है या नहीं, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट हो जाएगा।
पिछले साल 20 दिसंबर को हुए अंबरनाथ नगर परिषद चुनाव के परिणामों ने सबको चौंका दिया था। 60 सीटों वाली परिषद में, शिंदे सेना बहुमत से मात्र 4 कम 27 सीटें, बीजेपी 14 सीटें, कांग्रेस 12 सीटें, एनसीपी (अजित पवार) 4 सीटें और निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो सीटें जीतीं।
दिलचस्प बात यह है कि सत्तारूढ़ गठबंधन महायुति में साथ होने बावजूद शिंदे की शिवसेना को सत्ता से बाहर रखने के लिए भाजपा ने धुर विरोधी कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिला लिया और 'अंबरनाथ विकास आघाडी' बनाई, जिसे एक निर्दलीय का समर्थन मिलने पर संख्या बल 32 हो गया। जिसके बाद भाजपा की तेजश्री करंजुले पाटिल अंबरनाथ नगर परिषद की अध्यक्ष चुनी गईं।
उधर, इस गठबंधन के बाद कांग्रेस की राज्य इकाई ने कड़ा रुख अपनाते हुए अपने सभी 12 नवनिर्वाचित नगरसेवकों और ब्लॉक अध्यक्ष को निलंबित कर दिया। लेकिन कुछ ही घंटों बाद निलंबित पार्षदों ने भाजपा का दामन थाम लिया, जिससे अंबरनाथ की राजनीति पूरी तरह बदल गई है। यह मामला बॉम्बे हाई कोर्ट में गया। हालांकि, इसके बाद तेजी से बदले राजनीतिक समीकरणों के कारण आखिर में सत्ता शिंदे सेना के हाथों में आ गई।
शिवसेना प्रमुख एकनाथ शिंदे ने इस पर खुलकर नाराजगी जताई थी और अंबरनाथ में भाजपा और कांग्रेस के बीच हुए गठबंधन को विचारधारा के खिलाफ बताया था। शिंदे ने इस मुद्दे को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस व भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के सामने भी उठाया था।