
Uddhav ThackerayVs Eknath Shinde: शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को अहम सुनवाई हुई। उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की दलीलों के बाद अब एकनाथ शिंदे गुट की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कोर्ट में पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान उन्होंने 2018 में शिवसेना के संगठनात्मक ढांचे और पार्टी संविधान में हुए बदलावों को लेकर ठाकरे गुट पर कई सवाल उठाए। कौल के जोरदार बहस के बाद उद्धव गुट की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं।
शिंदे गुट के वकील कौल ने दावा किया कि 2018 में पार्टी संगठन में जिन लोगों की नियुक्तियां की गई थीं, उनमें से कई लोग चुनाव के जरिए निर्वाचित होकर नहीं आए थे। उन्होंने पार्टी के संविधान में उस दौरान किए गए बदलावों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण दस्तावेज अदालत के सामने रखे जाने हैं।
सुप्रीम कोर्ट में दलील के दौरान कौल ने ठाकरे गुट के वकील कपिल सिब्बल की दलीलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर चुनाव में पैसों का इस्तेमाल होता है, तो क्या पार्टी के भीतर पद हासिल करने के लिए भी इसका इस्तेमाल नहीं हो सकता?
कौल ने दावा किया कि पार्टी में एकाधिकारशाही का माहौल था और इसी वजह से कई लोग अपनी आवाज नहीं उठा पा रहे थे। उन्होंने कहा कि इसी परिस्थिति में कई लोग एकजुट हुए। जिसके बाद शिंदे की अगुवाई में बगावत हुई।
शिंदे गुट के वकील ने शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चुनाव आयोग के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि आयोग ने किसी जल्दबाजी में एक रात में फैसला नहीं लिया था। बल्कि फैसला लेने से पहले चुनाव आयोग ने बैठकें कीं और संबंधित पक्षों की दलीलें सुनीं। उन्होंने कहा कि उस दौरान उद्धव ठाकरे भी अलग-अलग मौकों पर अदालत और चुनाव आयोग के सामने गए थे तथा शिंदे गुट की ओर से उठाए गए मुद्दों को भी सुना गया था।
कौल ने ठाकरे गुट की उस दलील पर भी सवाल उठाया, जिसमें चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी जा रही है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को इस मामले में फैसला लेने का अधिकार है और सुप्रीम कोर्ट भी पहले इस अधिकार को मान्यता दे चुका है।
शिंदे गुट के वकील ने अदालत में कहा कि शिवसेना की स्थापना 1966 में हुई थी और बाद में पार्टी को चुनाव चिन्ह मिला। उनके मुताबिक, किसी भी राजनीतिक दल का संविधान लोकतांत्रिक होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि 2018 में शिवसेना के पार्टी संविधान में अचानक बदलाव किए गए। अब सवाल यह है कि चुनाव आयोग इन बदलावों को किस आधार पर मान्यता देगा।
कौल ने अदालत को बताया कि शिंदे गुट कुछ दस्तावेज भी पेश करना चाहता है। इन दस्तावेजों के जरिए वह 2018 में पार्टी संगठन और संविधान में हुए बदलावों से जुड़े अपने दावों को अदालत के सामने रखना चाहता है।
सुप्रीम कोर्ट में चल रही इस सुनवाई को शिवसेना के दोनों गुटों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शिंदे गुट की ओर से 2018 के पार्टी संविधान और संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर उठाए गए सवाल अब मामले की सुनवाई में अहम भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है और फिलहाल अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जा रही हैं।
बता दें कि 2022 में शिवसेना में दो गुट होने के बाद चुनाव आयोग ने फरवरी 2023 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को शिवसेना का नाम और धनुष-बाण चुनाव चिन्ह देने का फैसला सुनाया था। उद्धव ठाकरे गुट ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि आयोग ने पार्टी के भीतर वास्तविक बहुमत की सही तरीके से जांच नहीं की। आयोग ने निर्वाचित विधायकों के बीच शिंदे गुट की संख्या को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई लंबित रहने तक उद्धव ठाकरे गुट को शिवसेना (यूबीटी) नाम और जलती मशाल चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल जारी रखने की अनुमति दी है। साथ ही चुनाव आयोग को आदेश दिया है कि वह इसे किसी और को आवंटित न करे।