मुजफ्फरनगर

Exclusive: शहीद अंकित के पिता बोले, बेटे की शहादत पर है फक्र

पुलिस मुठभेड़ में शहीद हुए कांस्टेबल अंकित तोमर के पिता जयपाल ने पत्रिका संवाददाता से बातचीत करते हुए बताया कि उन्हें अपने बेटे की शहादत पर फक्र है।

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शामली। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सबसे चर्चित जनपद शामली के पलायन प्रकरण को लेकर देशभर में चर्चाओं में रहे कस्बा कैराना के गांव जंधेड़ी में गत 2 दिन पूर्व हुई एक लाख के इनामी कुख्यात बदमाश साबिर जंधेड़ी के मुठभेड़ में मारे जाने के दौरान सर में गोली लगने से गंभीर घायल आरक्षी अंकित तोमर जिंदगी से जंग हारने के बाद उस की शहादत पर अंकित के पिता व चाचा ने फक्र महसूस किया।

अंतिम संस्कार के बाद क्या बोले अंकित के पिता
पुलिस मुठभेड़ में शहीद हुए कांस्टेबल अंकित तोमर के पिता जयपाल ने राजस्थान पत्रिका संवाददाता से बातचीत करते हुए बताया कि उन्हें अपने बेटे की शहादत पर फक्र है। बेटा एक लाख के इनामी बदमाश साबिर से लोहा लेते समय शहीद हुआ है। लेकिन इसी के साथ उन्होंने यह भी कहा कि मुझे पिता होने के नाते यह असहनीय दर्द भी है जिसकी जीवनभर कभी भरपाई नहीं हो सकती। कांस्टेबल अंकित के पिता जयपाल ने बताया कि वह बचपन से ही होनहार और प्रेम-भाव वाला था। वह कभी किसी से नहीं डरता था। हमेशा आगे रहता था। बस इतनी बात कहने के बाद शहीद के पिता की आंखें नम हो गईं।

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चाचा का लाडला था अंकित
अंकित के चाचा समरपाल ने बताया कि हमारा भतीजा अंकित तो बचपन से ही बहादुरी के कार्य करता था और हमेशा पुलिस मुठभेड़ की घटनाओं में अग्रिम पंक्तियों में रहा करता था। जब हम अखबार में उसका फोटो और नाम पढ़ते थे तो हमें बड़ा गर्व महसूस होता था। नौकरी पर आने के बाद अंकित अपने चहेते चाचा के पास ज्यादा समय बिताता था। चाचा के मुताबिक अंकित सच्चा और निडर इंसान था, लेकिन अंत में उन्होंने भी बस एक ही बात कही अंकित की भरपाई कभी कोई नहीं कर सकता।

शहीद अंकित का जीवन परिचय
शहीद अंकित तोमर का जन्म बागपत जिले के बाजिदपुर गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। अंकित तोमर बचपन से ही बहुत होनहार, मेहनती व बहादुर था। अंकित के गांव में बहादुरी और हिम्मत के कई किस्से हैं। पढ़ाई करने के बाद वर्ष 2011 में पुलिस में चुने जाने के बाद अंकित ने 13 जनवरी 2011 को आरटीसी बदायूं में ट्रेनिंग के लिए अपनी आमद कराई। यहां वह टोली नंबर 04 में चुने गए। जिसके पीटीआई सोनू राजौरा थे जो काफी अनुशासन प्रिय थे। अंकित ट्रेनिंग के दौरान मिलने वाली सजा को बहुत पसंद करता था। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद वह वर्ष 2013 तक बदायूं में ही रहा। जिसके बाद पड़ोसी जनपद शामली जिले में ट्रांसफर पर चला गया। कुछ दिन थाने में रहने के बाद उसको डायल-100 की गाड़ी पर ड्यूटी दी गई थी।

अंकित के कंधों पर थी परिवार की जिम्मेदारी
शहीद जवान होना अंकित तोमर पर उसके ऊपर परिवार की पूरी जिम्मेदारी थी। अंकित की एक बहन और एक भाई है इसके अलावा पत्नी, 3 माह का बेटा और 3 साल की बेटी भी परिवार में है। अंकित की शहादत के बाद अब परिवार की पूरी जिम्मेदारी उसके छोटे भाई दानवीर के कंधों पर आ गई है।

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Updated on:
04 Jan 2018 10:03 pm
Published on:
04 Jan 2018 09:51 pm
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