मुजफ्फरपुर की विशेष एनडीपीएस कोर्ट ने साढ़े चार साल से गवाही दर्ज नहीं कराने वाले 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया है। इनमें रक्षित डीएसपी, तत्कालीन थानाध्यक्ष और कई जांच अधिकारी शामिल हैं।
Bihar News: बिहार में अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजने वाली पुलिस के कई अधिकारी अब खुद कानून के शिकंजे में है। मुजफ्फरपुर की विशेष एनडीपीएस कोर्ट संख्या-दो ने पुलिस की लापरवाही पर एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाते हुए डीएसपी (DSP), थानाध्यक्ष (SHO) और जांच अधिकारियों (IO) समेत कुल 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया है।
यह मामला NDPS एक्ट के तहत दर्ज दो मामलों से जुड़ा है, जिसमें स्मैक और हशीश की जब्ती शामिल है। कोर्ट ने पाया कि इन मामलों में पुलिस अधिकारी लगातार कोर्ट में गवाही देने से बचते रहे, जिससे ट्रायल प्रोसेस में देरी हुई। इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए कोर्ट ने यह बड़ा कदम उठाया। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि खाकी वर्दी की आड़ में कोर्ट के आदेशों की अवहेलना अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
जानकारी के मुताबिक, यह पूरा मामला स्मैक और हशीश जैसे नशीले पदार्थों की बरामदगी से जुड़ा है। NDPS एक्ट के तहत दर्ज इन गंभीर मामलों में पुलिस अधिकारियों ने चार्जशीट तो दाखिल कर दी, लेकिन जब कोर्ट में गवाही देने की बारी आई, तो वे साढ़े चार साल तक लुका-छिपी खेलते रहे। बार-बार समन और नोटिस के बावजूद ये अधिकारी कोर्ट में पेश नहीं हुए। नतीजतन, केस की सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी और ट्रायल रुका रहा।
स्पेशल जज नरेंद्र पाल सिंह ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि पुलिस अधिकारियों की इस लापरवाही से न सिर्फ ट्रायल में देरी हो रही है, बल्कि इससे अपराधियों को भी फायदा हो सकता है। नरेंद्र पाल सिंह ने इस स्थिति को गंभीर मानते हुए कार्रवाई का आदेश दिया।
पहला मामला मुजफ्फरपुर जिले के कुढ़नी थाना इलाके के गढ़ुआ चौक का है। सितंबर 2021 में पुलिस ने रोशन कुमार को स्मैक और लोडेड पिस्टल के साथ गिरफ्तार किया था। इस मामले में छह पुलिस अधिकारियों को गवाह बनाया गया था।
इस केस में कुढ़नी के उस समय के स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) अरविंद पासवान, DSP विपिन नारायण शर्मा और इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर विवेकानंद सिंह समेत कुल छह पुलिस अधिकारियों को गवाही देनी थी। लेकिन, चार्जशीट फाइल होने के बाद भी ये अधिकारी अभी तक अपना बयान दर्ज कराने के लिए कोर्ट में पेश नहीं हुए हैं। इसके बाद कोर्ट ने उनके खिलाफ नॉन-बेलेबल वारंट जारी किया है।
दूसरा केस मुजफ्फरपुर के सदर थाना इलाके के खबरा भेल कॉलोनी का है। अगस्त 2020 में पुलिस ने ATM फ्रॉड के छह आरोपियों को एक किलो हशीश के साथ गिरफ्तार किया था। इस हाई-प्रोफाइल केस में पुलिस का बर्ताव भी बेहद निराशाजनक रहा।
इस मामले में भी सूचक रघुवीर सिंह और जांच अधिकारी राजेश कुमार यादव समेत छह पुलिस अधिकारियों को कोर्ट में गवाही देनी थी। लेकिन करीब साढ़े पांच साल बीत जाने के बावजूद ये पुलिस अधिकारी गवाही देने के लिए कोर्ट में पेश नहीं हुए हैं, जिससे ट्रायल पर असर पड़ रहा है।
अपने ऑर्डर में कोर्ट ने कहा कि NDPS एक्ट जैसे सेंसिटिव मामलों में जांच अधिकारी (IO) और सूचक (Informant) की गवाही सबसे जरूरी सबूत होती है। पुलिस अधिकारियों का जानबूझकर गैरहाजिर रहना न सिर्फ अनुशासनहीनता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया से भी छेड़छाड़ है।
कोर्ट ने अब सीनियर डिस्ट्रिक्ट पुलिस अधिकारियों को इन 12 अधिकारियों की गिरफ्तारी पक्का करने और उन्हें कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया है। इन मामलों में अगली सुनवाई भी तय कर दी गई है और कोर्ट को उम्मीद है कि संबंधित अधिकारी कोर्ट में पेश होंगे।