नागौर

Rajasthan Road Accident: राजस्थान हाईकोर्ट की फटकार के बाद भी नहीं सुधरे हालात, हाईवे पर 5 साल में 1200 लोगों की मौत

राजस्थान में आवारा पशु सड़क हादसों की बड़ी वजह बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, हाइब्रिड नस्ल के काले सांड रात में कम दिखाई देने से दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं। पिछले पांच साल में ऐसे 6000 से अधिक हादसों में 1200 से ज्यादा लोगों की मौत और 4000 से अधिक लोग घायल हुए हैं।
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Jun 23, 2026
Holstein Friesian Bull
खजवाना स्टेट हाइवे पर घूमता होलस्टीन नस्ल का काला सांड (पत्रिका फोटो)

खजवाना (नागौर): राजस्थान के नेशनल और स्टेट हाईवे से लेकर संपर्क सड़कों पर सड़क हादसों से लोग अकाल मौत का ग्रास बन रहे हैं। सड़क पर दौड़ती गाड़ी के आगे कब यमदूत बनकर पशु आ जाए, यह डर हर चालक के मन को कौधता रहता है। एक विश्लेषण में चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि कुछ दशक पहले दूध क्रांति के नाम पर भारत लाई गई विदेशी नस्ल की गायों के सांड सबसे ज्यादा हादसों का कारण बन रहे हैं। इसके तीन कारण हैं, पहला इनका रंग काला होना, दूसरा सांड किसी काम नहीं आने से सबसे ज्यादा बेसहारा यही सड़कों पर घूमते हैं। तीसरा और सबसे अहम, देशी नस्ल के गोधे जहां आबादी क्षेत्र में ही रहते हैं, इस वर्णशंकर नस्ल के सांड सड़कों पर ज्यादा भटकते हैं।

आलम यह है कि पिछले पांच साल में प्रदेश में आवारा पशुओं की वजह से हुए सड़क हादसों से हजारों घर तबाह हो चुके हैं। इस पूरी त्रासदी में सबसे बड़ा कारण हाइब्रिड नस्ल के काले सांड हैं। ऐसे हादसों में मौत का आंकड़ा पांच साल में 1200 के ऊपर जा चुका है।

हाइब्रिड नस्ल बन रही नासूर

राजस्थान थारपारकर, राठी, गिर और कांकरेज जैसी देसी गायों का प्रदेश रहा है। लेकिन देसी गाय की दूध देने की सीमित क्षमता के चलते श्वेत क्रांति के दौरान नीदरलैंड की होल्स्टीन फ्रीजियन और ब्रिटेन की जर्सी नस्ल के सांडों के सीमन से देसी गायों का कृत्रिम गर्भाधान करवाना शुरू किया गया। परिणाम स्वरूप दुग्ध उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन इसका दुष्प्रभाव यह हुआ कि प्रदेश के सांडों की नस्ल बदल गई। जो वर्तमान के सड़क दुर्घटनाओं का सबब बन रही है।

80 फीसदी हादसों की वजह 'काले सांड'

रात के वक्त सफेद रंग का गोवंश हेडलाइट की रोशनी में दूर से दिख जाता है, जिससे वाहन चालक को संभलने का समय मिल जाता है। परंतु काले रंग के हाइब्रिड सांड अंधेरे और सड़क के रंग में घुले-मिले होने से दिखाई नहीं पड़ते। जब तक चालक को ये नजर आते हैं, तब तक देर हो चुकी होती है। इस कारण पशुओं से होनी वाली सड़क दुर्घटनाओं में 80 फीसदी वजह यही बन रहे हैं।

हाइकोर्ट की फटकार के बावजूद नहीं सुधरा ढर्रा

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्य पीठ ने अगस्त 2025 में इस मामले पर स्वतः संज्ञान लेकर साफ कहा कि सड़कों पर आवारा पशुओं की मौजूदगी केवल एक असुविधा नहीं, बल्कि जन सुरक्षा से जुड़ा बेहद गंभीर और आपातकालीन मामला है। खंडपीठ ने एनएचएआई, नगर निकायों सहित स्थानीय प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई। इसके बावजूद यह ढर्रा नहीं सुधरा है। प्रशासन अब तक आवारा पशुओं पर रेडियम लगाने की भी जहमत नहीं उठा पाए हैं।

पिछले 5 साल पर एक नजर

  • सड़क हादसेंः आवारा पशुओं से 6000 से अधिक
  • मौतें: 1200 से अधिक लोगों की
  • घायलः 4000 से अधिक

क्या कहते हैं टॉपिक एक्सपोर्ट

पशुओं के प्रबंधन और उनसे होने वाली विकारों को रोकने की पशुओं की जिम्मेदारी स्वशासित स्थानीय शासन की है। इनके कर्तव्य में लापरवाही से किसी भी नागरिक को बेसहारा पशु या कुत्ते से नुकसान पहुंचता है तो स्थानीय निकाय और सरकार जिम्मेदार है। नागरिकों में अपने अधिकारों के प्रति विधिक चेतना की आवश्यकता है। ऐसी हर घटना के लिए परिमाण का दावा स्थानीय न्यायालय में पेश किया जा सकता है। सरकार को भी बेसहारा गोवंश की समस्या के समाधान पर गाड़ियों से काम करना होगा। अन्यथा इसके सड़क विकारों के अलावा भी कई तरह के दुष्परिणाम समाज बिखर रहा है।
-बलदेवराम चौधरी, पूर्व जिला न्यायाधीश

Updated on:
24 Jun 2026 06:44 am
Published on:
23 Jun 2026 02:50 pm