Delhi Excise Policy Case: दिल्ली शराब घोटाला मामले में अरविंद केजरीवाल समेत AAP के कई नेताओं पर दिल्ली हाईकोर्ट ने आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू की है। जानिए कोर्ट ने क्या कहा, अब नेताओं के पास क्या विकल्प हैं और अदालत की अवमानना का मतलब क्या होता है।
AAP Leaders Contempt Case: दिल्ली शराब घोटाला मामले में आम आदमी पार्टी के बड़े नेताओं की मुश्किलें बढ़ गई हैं। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल समेत 6 नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया है। दरअसल, केजरीवाल ने पहले जस्टिस शर्मा को केस से अलग करने की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने अपील खारिज कर दी। इसके बाद नेताओं ने बहिष्कार का फैसला लेते हुए कहा कि न तो वे खुद कोर्ट में पेश होंगे और न ही उनकी तरफ से कोई वकील जाएगा। उसके बाद मामले में सीबीआई और ईडी की याचिकाओं का जवाब नहीं देने पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। अदालत का मानना है कि सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और सार्वजनिक बयानों के जरिए न्यायपालिका और जांच एजेंसियों को लेकर गलत माहौल बनाने की कोशिश की गई।
आपको बता दें कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज, दुर्गेश पाठक और विनय मिश्रा को कोर्ट की अवमानना का नोटिस जारी किया है।
अगर कोई व्यक्ति कोर्ट, जज या अदालत की कार्रवाई को लेकर ऐसी बात कहता है या ऐसा काम करता है जिससे अदालत की इज्जत कम हो या कोर्ट के काम पर असर पड़े, तो उसे कोर्ट की अवमानना कहा जाता है।इसके लिए अलग कानून बना हुआ है, जिसे Contempt of Courts Act, 1971 कहा जाता है। अगर कोई कोर्ट के आदेश नहीं मानता या फिर जजों और न्यायपालिका के खिलाफ गलत बातें फैलाता है, तो उस पर अवमानना का मामला चल सकता है। ऐसे मामलों में कोर्ट पहले नोटिस भेजकर जवाब मांगती है। अगर गलती मानकर माफी मांग ली जाए, तो कई बार अदालत मामला खत्म भी कर देती है। लेकिन अगर आरोप साबित हो जाएं, तो कोर्ट जुर्माना लगा सकती है या छह महीने तक की जेल की सजा भी दे सकती है। इसलिए अदालत की अवमानना को बहुत गंभीर मामला माना जाता है।
अवमानना की कार्रवाई शुरू करने के बाद जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने मामले को दूसरी बेंच को ट्रांसफर कर दिया है। उन्होंने यह फैसला लेते हुए साफ किया कि इस फैसले के पीछे किसी के दबाव के चलते नहीं ले रही हैं, बल्कि कोर्ट की प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने के लिए कर रही हैं ताकि आगे जाकर भविष्य में कोई भी पक्ष कोर्ट के फैसलों पर सवाल न उठा सके।