AAP Splits: आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा है, जब राज्यसभा सांसद संदीप पाठक ने पार्टी छोड़कर भाजपा जॉइन कर ली। उन्हें केजरीवाल का ‘सीक्रेट वेपन’ और AAP का ‘बैकएंड ब्रेन’ माना जाता था।
किसी भी पार्टी के लिए सबसे बड़ा खतरा तब होता है जब वो नेता चला जाए जो चुनाव में जीत की पटकथा पीछे बैठकर लिखता हो। आम आदमी पार्टी (AAP) के साथ आज कुछ ऐसा ही हुआ है। राज्यसभा सांसद संदीप पाठक (Sandeep Pathak In BJP) ने 'आप' का साथ छोड़कर भाजपा का हाथ थाम लिया है।
संदीप के जाने से दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और 'आम आदमी पार्टी' के अरविंद केजरीवाल को बड़ा झटका लगा है। ऐसा माना जा रहा है कि 'आप' में कोई भी नेता इस नुकसान की भरवाई नहीं कर सकता। संदीप को केजरीवाल का 'सीक्रेट वेपन' (Arvind Kejriwal Secret Weapon) और 'आप' का 'बैकएंड ब्रेन' माना जाता था।
आम आदमी पार्टी में संदीप पाठक वो शख्स थे, जो टीवी स्क्रीन पर कम और चुनावी जमीन पर ज्यादा दिखते थे। AAP की रैलियों में भले ही केजरीवाल का चेहरा होता था, लेकिन पर्दे के पीछे की पूरी मशीनरी संदीप पाठक चलाते थे।
बूथ मैनेजमेंट, उम्मीदवार चयन, डेटा की समझ और ग्राउंड पर काम करने का तरीका, इन सब में वे माहिर माने जाते थे। यही वजह थी कि पार्टी के अंदर उन्हें 'बैकएंड ब्रेन' कहा जाता था, यानी वो दिमाग जो दिखता नहीं लेकिन सब कुछ चलाता है।
2022 का पंजाब चुनाव AAP के लिए इतिहास बनाने वाला था। कांग्रेस जो वर्षों से पंजाब पर राज करती आई थी, वो इस बार बुरी तरह हार गई। इस जीत के पीछे जो रणनीति थी, उसे तैयार करने में संदीप पाठक की सबसे बड़ी भूमिका बताई जाती है।
उन्होंने हर विधानसभा सीट के स्थानीय समीकरणों को समझा, बूथ स्तर तक नेटवर्क खड़ा किया और कांग्रेस की कमजोरियों को पहचानकर उसी के हिसाब से चुनाव लड़ा। नतीजा सबके सामने था। इसके बाद गुजरात, गोवा और दूसरे राज्यों में भी पार्टी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर रही।
संदीप पाठक का पार्टी से दूर होना सिर्फ एक नेता का जाना नहीं होगा, यह पूरे संगठन की रीढ़ पर चोट होगी। पहली बात, पार्टी के पास उन जैसा कोई दूसरा रणनीतिकार अभी नजर नहीं आता।
दूसरी बात, जिन राज्यों में AAP अभी पांव जमाने की कोशिश कर रही है, वहां ग्राउंड नेटवर्क कमजोर पड़ सकता है। तीसरी बात, आने वाले चुनावों में टिकट बंटवारे से लेकर कैंपेन तक हर चीज पर इसका असर दिख सकता है।
अरविंद केजरीवाल की पार्टी हमेशा से अपनी रणनीतिक सोच और जमीनी काम के दम पर खड़ी रही है। अगर यही नींव हिलने लगे तो पार्टी को अगले चुनावों में मुश्किलें आ सकती हैं।
केजरीवाल के लिए अब जरूरी यह है कि वे नए रणनीतिकार तैयार करें और संगठन को फिर से मजबूत जमीन पर खड़ा करें। वरना सिर्फ एक चेहरे के दम पर चुनाव जीतना इस दौर में आसान नहीं रहा।