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गांधी परिवार का वह जश्न जिसमें इंदिरा के पति फिरोज गांधी को टेंट में रहना पड़ा था

यह जश्न संजय गांधी के जन्म का था। साथ ही, जानिए नेहरू खानदान की उस शादी का किस्सा जिसमें खूब जश्न मना था और शाही खर्च हुआ था।
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Updated: 14 Oct 2026, 5:00 PM IST
Gandhi family history, Feroze Gandhi
एक समय फिरोज और इंदिरा गांधी के रिश्ते खराब हो गए थे। (फोटो एआई से)

नेहरू-गांधी परिवार में एक बार फिर शादी की शहनाई बजने का इंतजार है। यह शादी प्रियंका गांधी वाड्रा और रॉबर्ट वाड्रा के बेटे रेहान की अवीवा बेग से होगी। दिसंबर 2025 में इनकी सगाई की खबर आई थी। सगाई बिना किसी तड़क-भड़क के हुई थी। इसमें चुनिंदा लोग ही पहुंचे थे। अब शादी का समारोह कैसा होगा, यह देखने वाली बात होगी। गांधी परिवार में कई शादियां ऐसी हुई हैं, जो सादगी और केवल करीबी लोगों की भागीदारी के लिए चर्चित रही हैं, लेकिन कई मौके ऐसे भी आए जब अच्छी ख़ासी भीड़ जुटी और शाही अंदाज में जश्न भी मना।

Sanjay Gandhi Birth Story: संजय गांधी के जन्म पर फिरोज गांधी को टेंट में मिली जगह

संजय गांधी का जन्म 14 दिसंबर, 1946 को हुआ था। तब इंदिरा गांधी 17, यॉर्क रोड, दिल्ली में रहती थीं। वह यहां अप्रैल में आ गई थीं। यही वह बंगला था जहां पंडित जवाहर लाल नेहरू बतौर अंतरिम प्रधानमंत्री रहे थे।

संजय को जन्म देने में इंदिरा बड़े कष्ट से गुजरी थीं। उनका जन्म समय से पहले हो गया था। इस दौरान इंदिरा का काफी खून बहा था। उनकी हालत ऐसी थी कि बच्चे के जन्म के बाद इंदिरा को उनकी बुआ ने पहली बार देखा तो लगा वह मर चुकी हैं। ऐसे में बच्चे के जन्म पर जश्न का मौका तो था, लेकिन इंदिरा की सेहत को लेकर चिंता भी थी।

जड एडम्स अपनी किताब The Dynasty: The Nehru-Gandhi Story में लिखते हैं कि 17, यॉर्क रोड में नेहरू के बंगले पर भारी भीड़ थी। बड़ी संख्या में परिवार के लोग, रिश्तेदार, दोस्त आ गए थे। हालत यह थी कि संजय के पिता फिरोज गांधी के लिए भी बंगले में जगह नहीं थी। उन्हें गार्डन में लगाए गए टेंट में मेहमानों के बीच रहना पड़ा।

Jawaharlal Nehru Wedding: कई दिन चला था जवाहरलाल नेहरू की शादी का जश्न

संजय के जन्म से 30 साल पहले उनके नाना जवाहरलाल नेहरू की शादी पर भी खूब भीड़ जुटी थी और जश्न मना था। नेहरू की शादी 8 फरवरी, 1916 को कमला कौल से हुई थी। दिल्ली में दोनों की शादी बड़ी धूमधाम से हुई थी। इसकी तैयारी कई महीने चली थी। आनंद भवन का एक कमरा सजावट की तैयारियों के लिए अलग कर दिया गया था। कमला के लिए मोती जड़ी साड़ी बनाने के लिए कई कलाकार कई दिन तक काम करते रहे। जवाहरलाल ने गुलाबी पगड़ी और शेरवानी पहन रखी थी।

कमला के परिवार वालों ने पुरानी दिल्ली में अपने एक पड़ोसी की तीन मंज़िला हवेली में अपने सारे मेहमान रुकवाए थे। जवाहरलाल के पिता मोतीलाल नेहरू ने 300 मेहमानों को इलाहाबाद से दिल्ली लाने के लिए ट्रेन बुक की थी। दिल्ली से भी बड़ी संख्या में मेहमान आए। दिल्ली से सटे बाहरी इलाके में एक अस्थाई शहर-सा बसा दिया गया था और फूलों से 'नेहरू वेडिंग कैंप' लिखवा दिया गया था। ऐसा लगता था जैसे सफ़ेद तंबुओं का शहर बसा दिया गया हो। सात दिन तक रस्म और जश्न चलते रहे। परिवार इलाहाबाद लौट गया तो वहां भी कई दिन भोज और तरह-तरह के आयोजन चलते रहे।

Motilal Nehru Lifestyle & Wealth: जब तक हो, मौज करो के सिद्धांत पर चलते थे मोतीलाल नेहरू

जवाहरलाल के पिता मोतीलाल नेहरू के पास अगाध पैसा था। पैसे को लेकर मोतीलाल नेहरू का फलसफा बड़ा सीधा था, 'मुझे पैसा चाहिए। मैं इसके लिए काम करता हूं और कमाता हूं। अनेक लोग हैं जिन्हें पैसों की चाहत मुझसे ज्यादा है, पर वे उतना काम नहीं करते और नहीं कमा पाते।'

मोतीलाल नेहरू उस दर्जे के बैरिस्टर थे कि 1896 में उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट के रॉल ऑफ एडवोकेट्स में शामिल किया गया था। उस साल केवल चार वकीलों को यह मौका मिला था। 1909 में उन्हें ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लड़ने का मौका मिला था। मोतीलाल जब 40 साल के भी नहीं थे तब 2000 रुपये महीना कमाते थे। 1990 के दशक के हिसाब से देखा जाए तो यह रकम करीब दस लाख रुपये बनती है। 40 पार करने के बाद उनकी मासिक कमाई का आंकड़ा पांच अंकों में पहुंच चुका था। तब एक शिक्षक की तनख्वाह दस रुपये महीना हुआ करती थी।

निजी ज़िंदगी में लगे सदमे का था असर?

जवाहरलाल नेहरू बताते थे कि उनके पिता को पैसे जमा करने का शौक नहीं था। उनका मानना था कि पैसे जमा करने से जरूरत के वक्त आदमी कमाने से पीछे भागता है। लेकिन, शायद इस सोच के पीछे वह चोट भी थी जो मोतीलाल ने निजी ज़िंदगी में खाई थी। उनके पिता, भाई, पत्नी और बेटे की मौत कम उम्र में ही हो गई थी। सो, उनका सोचना था कि जिंदगी छोटी है, इसलिए इसका जितना मजा लिया जा सकता है, ले लिया जाए।

मदद में भी रहते थे आगे, गरीब ब्राह्मण को दी एक दिन की फीस

मोतीलाल खुद आलीशान ज़िंदगी तो जीते थे, लेकिन दूसरों की मदद करने में भी आगे रहते थे। उन्होंने अपने भतीजों के विदेश में पढ़ने का खर्च भी उठाया। एक बार ऐसा हुआ कि कोर्ट जाते हुए एक गरीब ब्राह्मण मोतीलाल के रास्ते में आ गया और बेटी की शादी के लिए पैसे मांगने लगा। उन्होंने पूछा- कितना खर्च आएगा? ब्राह्मण ने कहा- 300 रुपये। मोतीलाल ने अपने स्टाफ से कहा कि आज की पूरी फीस इनको दे दी जाए। ब्राह्मण को 1300 रुपये मिल गए।

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14 Oct 2026, 5:00 PM IST
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